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रविवार, 12 सितंबर 2010

देवी हिन्दी की जय हो

हिन्दी देवी हैं 
हिन्दी के पुजारी हैं 
विशेष पुरोहित हैं
वर्ष में निर्दिष्ट समय पर 
जैसी जिसकी श्रद्धा हो 
दिवस, सप्ताह या पखवाड़े भर की 
देवी की पूजा रखते हैं 
पुरोहित देवी का आह्वान करते हैं 
देवी की महिमा में कथाएँ दुहराई जाती हैं
कविताओं की आरती होती है 
चुटकुलों की बजती हैं घंटियाँ 
भाषणों के शंख बजाए जाते हैं 
देवी के नाम पर चढ़ाए  जाते है चढ़ावे  
एक-एक कर सारे अनुष्ठानों के बाद 
देवी को स्वस्थान गच्छ कह विदा दी जाती है
पुरोहित दक्षिणा पाते हैं 
दर्शकों को प्रसाद मिलता है
सभी प्रसन्न मन घर जाते हैं
देवी हिन्दी की जय हो 

- नीरज कुमार झा 


रविवार, 29 अगस्त 2010

ताबूत में पड़े मुर्दे की तरह

अकारण ही मुझे मिला है बहुत सारा
मेरी प्रतिभा और प्रयासों से  कहीं बहुत ज़्यादा
 अपने-आप जो आया 
डरता हूँ कहीं चला न  जाए ऐसे ही 
आँखें रखता हूँ  नीची
चलता हूँ धीमा
बोलता बिलकुल कम
साँस भी लेता धीरे-धीरे
कहीं कुछ ऐसा ना हो  जाए
कि खो जाए सब कुछ अकारण
जीता हूँ लेकिन
ताबूत में पड़े मुर्दे की तरह

- नीरज कुमार झा

अब आप क्या कहेंगे?

देश की अर्थव्यवस्था के जानकारों के बीच आम राय है कि देश में विकास सरकार की वजह से नहीं  बल्कि सरकार के बावजूद हो रहा है. अब इस धारणा को पुष्ट करने के लिये सरकार स्वयं ही  राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के द्वारा प्रमाण दे  रही है. जो उनकी वजह से ही है, जिसमें और किसी का योगदान नहीं है. वह है यह. अब आप क्या कहेंगे?

गालियों का समाजशास्त्र

नारी मुक्ति के सरोकारी समाज में स्त्रियों के प्रति व्याप्त भेदभाव के उदहारण के रूप में इस बात का बहुधा उल्लेख करते हैं कि पुरुषों को दी जाने वाली तमाम गालियाँ स्त्रियों को लेकर दी जाती हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि समाज में, दुनियाँ के लगभग हर समुदाय में, बिरले अपवादों को छोड़कर, पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की स्थिति कमतर है लेकिन उक्त दृष्टान्त से यह  तथ्य कतई अभिप्रमाणित नहीं होता है.  समस्या की ग़लत समझ और समझ के नाम पर निरर्थक और भ्रामक जुमलेबाजियाँ समस्या को सुलझाने के बजाय उलझाती हैं.

व्याप्त धारणाओं के विपरीत सामजशास्त्रीय समझ हमें सूचित करती है कि गालियों का समाज की  कार्यशीलता में वस्तुतः सकारात्मक योगदान है. समाजशास्त्र हमें सिखाता है कि प्रत्येक सामाजिक प्रक्रिया या तथ्य के प्रकट प्रकार्य (समाज के सातत्य में योगदान की क्रिया)  के इतर उसका अप्रत्यक्ष प्रकार्य भी होता है. यह आधारभूत समाजशास्त्रीयता तत्क्षण गालियों के अप्रत्यक्ष प्रकार्य स्पष्ट कर देती है. 

समाज के स्वस्थ अस्तित्व के लिए व्यक्तियों के मध्य यौनिक संबंधों का नियमन और सीमाकरण आधारभूत है. पाशविक यौनिकता के विपरीत मानव मध्य शारीरिक संपर्क निषिद्ध, निंदनीय, वैधता आदि की श्रेणियों में विभाजित हैं. दूसरे शब्दों में, समाज ने उक्त संपर्कों का  कठोर नियमन किया हुआ है. 

इस संबंधों की सीमाओं के उल्लंघन को लेकर क़ानून के द्वारा दंड का भी प्रावधान है लेकिन उन अल्पज्ञात कानूनों से अलग सामाजिक नियमन के इस प्राथमिक व्यवस्था का ज्ञान व्यक्तियों को कैसे होता है? यहाँ यह बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि यह महत्वपूर्ण भूमिका तथाकथित और उचित रूप से कथित असभ्य जन द्वारा उच्चरित इन अपशब्दों के  द्वारा ही निष्पादित होती  हैं. दूसरी तरफ़ इस प्रकार्य की प्रभावशीलता इसके इसी स्वरूप पर निर्भर करती है. 

बात यहीं समाप्त नहीं होती है. गालियों  का  प्रकट उद्देश्य संबोधित व्यक्ति को अपमानित, आहत या उसके  पौरूष को ललकारना  होता है. साथ ही, जैसा कि स्पष्ट किया जा चुका है कि  अप्रकट रूप से इनका उद्देश्य  पुरुषत्व को सीमाबद्ध भी करना है.  गालियों के इस अप्रकट प्रकार्य की पुष्टि  दूसरे तथ्य से भी होती है. हमारे यहाँ एक परम्परा है कि संभ्रांत परिवारों की महिलाएँ भी विवाह संस्कार के दौरान उपस्थित मेहमानों को इन आपत्तिजनक शब्दों से संबोधित करती हैं. इस परम्परा का उद्देश्य भी निस्संदेह व्यक्तियों को निषिद्ध संबंधों से  अवगत कराना है. इस तरह से व्यक्ति के समाजीकरण और समाज की व्यवस्था में गालियों का योगदान आधारभूत है और इस  तथ्य को लैंगिक असमानता से जोड़ना किसी भी तरह से हमारी मदद नहीं करता है. 
- नीरज कुमार झा 

शनिवार, 28 अगस्त 2010

आखेटक

मेरी ज़ेहन की तरकश में 
तराशे जुमलों के तीर भरे हैं 
ज़बाँ की  कमान से 
बेधने लक्ष्य का कोई मौक़ा
करता नहीं  जाया 
होता हूँ खुश पा निशाने पर 
झूठ, छल,  छद्म के आवरण से हीन सहजता
परहेज़ है मुझे  बख्तरबंद  लड़ाकों से
बनावटी चरित्र के लौह कवचों पर बेकाम जाते हैं तीर
ऊपर से ज़ोखिम जवाबी हमले का  
निश्शंक साधता तीर
साधुता के खुले तन पर 
धंसते तीर के ध्वनि की तीक्ष्णता 
तीर के धंसने की गहराई
पतली रक्तधारा की सघनता 
करती हैं मुझे तुष्ट
बींधे लक्ष्य की असह्य वेदना
निर्दोष मन की मर्मान्तक छटपटाहट  
करती नहीं मुझे विकल 
आखेटक हूँ पक्का 
पालन-प्रशिक्षण ही ऐसा मेरा 
होने के लिए  ऐसा ही 
किया गया है तैयार मुझे 

-  नीरज कुमार झा 


सोमवार, 9 अगस्त 2010

संगति स्वार्थ की

मैंने अनुभवों से सीखा है.
दुर्जनों का साथ,
उनसे सहयोग,
उनका समर्थन, 
भले ही लाभदायक हो,
लेकिन क्लेश ही देता है.
सज्जन का साथ,
उनकी सहायता, 
भले ही घाटे का सौदा हो, 
लेकिन सुखद होता है.
संगति स्वार्थ की 
त्रास ही देती है. 
मुश्किल है हालांकि दुष्टों से बचना. 
हर तरफ़  हैं वे ही हावी.
फ़िर भी बचता हूँ उनसे 
जितना हो सके. 

- नीरज कुमार झा 
  

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

बिना सिर-पैर की कुछ बेतरतीब पंक्तियाँ


(१)

कब्ज़ा हो चुका हर तरफ़  तमाशाइयों का 
तमाशा बना दिया उन्होंने पूरी दुनियाँ का 

(२)

हम ही तमाशा 
हम ही तमाशबीन 
खुद पर ताली बजा रहे हैं  
मंद-मंद मुस्कुराते तमाशाई 
सिक्के बीन रहे हैं 

(३)

अंधेरे के साये में जीने वाले 
उजियारे में उड़ान भरने लगे हैं 
अंधेरगर्दी मची है ऐसी कि चमगादड़ और उल्लू 
दिन में मँडराने लगे हैं 

(४)

बेशर्म व्यभिचारी और बेरहम हत्यारे 
इज्ज़त और ओहदे से नवाजे जा रहे हैं 
शराफत की शर्मिंदगी का बोझ ढोते
हम मुँह छिपाए फिरते हैं 

(५)

खिलवाड़ी  और नटुए भगवान कहे जा रहे हैं 
अन्नदाता किसान आत्महत्या करने को विवश हो  रहे हैं 

 (६) 

आजकल हम शरबत बहुत पीने लगे हैं 
खून मेरा मीठा नहीं 
शिकायत जोंकों की दूर कर रहे हैं 

(७)

चमड़ी तुम्हारी सख्त
डंक मारकर रेंगने वाले महोदय चिल्लाते हैं 
जहर का कहर झेल रहा मैं कराहता हूँ 
साँपजी आप सही हैं

(८)

पेट में भोजन, तन पर कपड़ा, रहने का ठौर और लुढ़काने को पहिया
हम करें परवाह क्यों कि जमीर हमारा पराया हो गया 

(९)


ख़ुद के बुने जाले में फंसे हैं 
अपना ही हाथ-पैर चबा रहे हैं 
पेट भरने से संतुष्ट भी हैं 
दर्द से बिलबिला भी रहे हैं 
यह अनोखी नस्ल
मकड़ों की नहीं 
हम आदमियों में ही 
पाई जाती है 

(१०)


शहर दर शहर खाक छान रहा कि कहीं पनाह मिले
पनाह कहाँ मुकद्दर में कि शहर के शहर बेपनाह मिले

(११)

चोर उचक्के हुए महंत 
बेपढ़ पढ़े बने जमूरे 
समझदार सर धुने
उठाईगिरे  हुए सिरमौर 
होते आज अगर 
रो रो होते बेहाल कबीर 
(१२)

महफ़िल नहीं यह
वाह वाह कहा और बढ़ गए
सुना है तो कहो भी
बातें बढ़े तो सही

(१३)

ऊँचे झरोखे से झलक दिखा जाते हो
हम भी जयकारे कर रह जाते हैं
यह तो कोई बात नहीं हुई
मेरी भी सुनो, कुछ बातें करो तो कोई बात है

(१४)


दिल की बात कहने का मन नहीं करता
खुद से भी बातें करना अच्छा नहीं लगता
बेमुरव्वत खुदगर्ज़ी और बेइंतहा फरेब के  बीच
कविता लिखना वाजिब नहीं लगता

(१५)

जंज़ीरों से क्यों है तुम्हें मुहब्बत 
रूकावटों पर तुम क्यों करते इतनी मेहनत
वर्जनाओं की कारा में
उच्छृंखलता के सेंध ही सेंध खुदे हैं
हवाओं को बह लेने दो
लोगों को जी लेने दो


- नीरज कुमार झा