पृष्ठ

आलेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आलेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 1 मई 2016

सभ्यता के शत्रु


नई दिल्ली स्थित भारत के लब्धप्रतिष्ठ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आयोजित या प्रायोजित एक कार्यक्रम के द्वारा राष्ट्रद्रोह की भावना  को फ़ैलाने की कोशिश की व्यापक  निंदा हुई है, जो नितांत स्वाभाविक है। कुछ दिनों के बाद इस इस घटना का भी पटाक्षेप हो जाएगा लेकिन जो बात सामान्यतः अनदेखी की जा रही है वह इस घटना की पृष्ठभूमि और प्रकृति है, जिनके  गहन विश्लेषण की आवश्यकता है।  

उक्त घटना वास्तव में देशव्यापी घटनाक्रम की एक कड़ी है जिसका उद्देश्य देश में अस्थिरता उत्पन्न करना है और देश की छवि को हानि पहुँचाना है। इस तरह के विवादों को  जानबूझ कर निर्मित किया जाता है जिनसे लोगों की भावनाएँ भड़के और आरोप तथा प्रत्यारोप का लम्बा दौर चले। इनसे निश्चित रूप से  समाज में वैमनस्य का वातावरण निर्मित होता  है और कलह फैलता है। जवाहरलाल नेहरू नेहरू विश्वविद्यालय की घटना भी इसी कुत्सित प्रयास का हिस्सा है। साथ ही देश के कुछ वामपंथी समूह अपने नष्ट हो चुके मायाजाल को फिर से बहाल करने की कोशिश में हैं। वे समाज के सापेक्षिक कमज़ोर और अल्पसंख्यक वर्गों में अपनी पैठ बनाना  चाहते हैं। हालाँकि इस तरह के गठबन्धन का प्रयास एक दिवास्वप्न ही है।  इसका कारण है कि पंथ, जाति तथा वर्ग आधारित विचारधाराओं  में मौलिक विरोधाभास हैं।     

इस घटना के पीछे की रणनीति क्या है? वैश्विक इतिहास को देखने से यह साफ़ हो जाता है कि मानवता के शत्रुओं ने सदैव फसाद और भ्रम के द्वारा ही स्वयं को स्थापित किया है। वामपंथी इस मामले में माहिर हैं। इस देश ने वामपंथ को विनाश का तांडव करने का ज़्यादा मौका तो नहीं दिया लेकिन देश इसके विघटनकारी प्रभाव से स्वयं की रक्षा भी नहीं कर पाया। यह वामपंथी विचारधारा का ही प्रभाव है कि आज़ादी के सात दशक के बाद भी भारत की लगभग एक चौथाई आबादी आज भी मानवोचित जीवन-यापन करने में अक्षम है। भारत तथा भारत के विचार से शत्रुता रखने वाले मात्र वामपंथी नहीं हैं। विदेशों के अनेक साधनसम्पन्न संगठन देश को जाति  तथा क्षेत्रीयता के आधार पर  भी तोड़ना चाहते हैं और कमज़ोर वर्गों के बीच द्रोह की भावना निर्मित करना चाहते हैं (इस तरह के अंतरराष्ट्रीय तंत्र को राजीव मल्होत्रा और अरविंदन नीलकंदन ने अपनी  पुस्तक ‘ब्रेकिंग इंडिया’ में बेनक़ाब किया है।) तीसरी, जिहादी ताकतें तो हैं ही।  

वैश्विक स्तर पर भारत अनेक संगठनों और लोगों के आँखों की किरकिरी क्यों है? वास्तव में  भारत एक अनन्य राष्ट्र है। यह राष्ट्र एक महान सभ्यता की राजनीतिक अभिव्यक्ति है। प्राचीन काल से ही इस सभ्यता का प्रभाव भारत वर्ष के भौगोलिक सीमाओं के परे अत्यन्त व्यापक रहा है। चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक, निबंधकार तथा राजनयिक हु शिह (1891 – 1962) के अनुसार ‘भारत ने सीमा पार बिना एक भी सैनिक  भेजे चीन को सांस्कृतिक रूप से विजित कर उस पर बीस सदियों तक राज किया है।’ प्राचीन काल में भारत का सांस्कृतिक प्रभाव इतना व्यापक था कि दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया और चीन के विशाल भूभाग को बृहत्तर भारत कहा गया है। यह महान सभ्यता लगभग अपनी सम्पूर्णता में आधुनिक युग में राजनीतिक रूप से राष्ट्र-राज्य में परिवर्तित हो गयी है। यह तथ्य उल्लेखनीय है क्योंकि यूरोप में राष्ट्र-राज्यों का उदय ईसाई सभ्यता के विखण्डन के परिणामस्वरूप हुआ है जिसका आधार जातीय तथा भाषाई है जबकि भारतीय राष्ट्र-राज्य सभ्यतामूलक है।

भारतीय राष्ट्र-राज्य सनातन धर्म जनित सभ्यता का आधुनिक रूप है, जिसका मूल तत्त्व अद्यतन अक्षुण्ण है। यह मूल तत्त्व है सर्वहित की भावना जो मानवों, चराचर तथा लोक-परलोक को अविभाज्य देखता है। उदात्तता की पराकाष्ठा प्राप्त करने के बाद भी यह सभ्यता हर तरह के विचारों का सम्मान करती रही है। सभी मत-मतान्तरों के प्रति  सम्मान  रखते हुए यह परम्परा वर्चस्व की प्रवृत्ति  से हीन है और मानव समाज को परस्पर कुटुंब मानती है। नैसर्गिकता के इस सभ्यता का मतारोपण के वादों के अनुयायियों और वर्चस्ववादियों का कोपभाजन होना स्वाभाविक है। सनातन सभ्यता सृष्टि की सभ्यता है, प्रकृति की सभ्यता है, मानवीयता की सभ्यता है।   

वैश्विक स्तर पर वर्चस्व के कामी भारत के उदय से कष्ट में हैं और इस सभ्यता को नष्ट होते देखना चाहते हैं और उनका सबसे बड़ा हथियार रहा है भारतीयों को विभाजित कर आपस में लड़ाना, जो दुर्भाग्य से अक्सर कारगर रहता है। इस विषम परिस्थिति में भारत को अपनी सभ्यता की उज्जवल परम्परा को त्यागने की आवश्यकता नहीं है बल्कि मानवहित  में उसको और सबल करने की जरूरत है। साथ ही हालाँकि इससे भी जरूरी है कि भारत अपनी  रक्षा के लिए रणनीतिक सोच विकसित करे। भारतवासियों को  एकजुट होकर देश को सशक्त, सम्पन्न  और प्रभावशाली बनाना है। हमें कभी नहीं भूलना है कि  हमारा दायित्व वैश्विक है और उस अनुरूप हमें क्षमता प्राप्त करनी है। ऐसा तो बिलकुल नहीं होना चाहिए कि कुछ दुर्जन कुचक्र चलाकर हमें बार-बार दिग्भ्रमित करते रहें। हमें इस तथ्य को कभी नहीं भूलना चाहिए कि गुप्तवंश के शासन काल के बाद से इस देश के निवासी सम्मान और सम्पन्नता के जीवन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। 

समस्त देशवासियों को इस बात को समझना होगा कि स्वतंत्रता, स्वराज और सुराज का एक ही सूत्र है - वह संविधानवाद है (संविधानवाद को मैं धर्मसत्ता के रूप में परिभाषित करता हूँ)। संविधानवाद से ही स्वतंत्रता का रक्षण और संवर्द्धन सम्भव है। उपद्रव और उत्तेजना फ़ैलाने से संविधान सबल नहीं होता है बल्कि निर्बल होता है। यदि भारत एक कार्यशील जनतंत्र है तो उसकी आधारभूमि हमारी स्वतंत्रता संग्राम की विरासतें हैं। इस संग्राम में भारतीयों के तरफ़ से सभ्य संवाद को सदैव वरीयता दी गयी थी। हमें आज परस्पर विमर्श और समझ की प्रक्रियाओं को सघन बनाने की जरूरत है। हम एक बौद्धिक समाज बनकर ही अन्तरराष्ट्रीय चक्रव्यूह को तोड़ सकते हैं। अभी तमाम फसादों का एक दुष्परिणाम तो एकदम साफ़ है। आज देश में आर्थिक सुधारों की जरूरत सबसे ज़्यादा है लेकिन इन उपद्रवों की वजह से यह प्रक्रिया अपेक्षित गति को प्राप्त नहीं कर पा रही है। भारत की जय हो, यह मानवता की जय की अपरिहार्य शर्त है।  

नीरज कुमार झा
***



बुधवार, 30 दिसंबर 2015

समकालीन परिदृश्य में शिक्षा एवं शिक्षक : विचारार्थ कतिपय बिंदु



प्राचीन भारत निश्चित रूप से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में समकालीन विश्व में अग्रणी था। मानव सभ्यता के विकास में भारतीय मनीषा का आधारभूत योगदान है। आज स्थिति हालांकि भिन्न है। भारत स्वतंत्रता के लगभग सात दशकों के बाद भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में अपना अभीष्ट स्थान सुनिश्चित नहीं कर पाया है। आज तक, स्वतंत्रता के लगभग सात दशक के बाद भी, विश्व के शीर्ष विश्वविद्यालयों के गुणानुक्रम में भारतीय विश्वविद्यालय स्थान नहीं पा सके हैं। यह स्थिति विडंबनात्मक है क्योंकि भारतीय मेधा का लोहा दुनियाँ मानती है। इस विडंबना की जड़ें गहरी हैं। बाह्य आक्रान्ताओं से पराजय और तत्पश्चात् अधीनता की लम्बी कालावधि में भारत में शिक्षा का पराभव होना तय था और वैसा हुआ भी। पराभव के दौर में ही, ऐसा रेखांकित करना सर्वथा प्रासंगिक है कि, उस प्राच्य शिक्षा परम्परा की अदम्य शक्ति भी सिद्ध हुई। लगभग एक सहस्राब्दी की दासता और दमन के बावजूद भारतीय संस्कृति और सभ्यता की अस्मिता अक्षुण्ण रही। ऐसा पूरे विश्व में कहीं संभव नहीं हुआ था। आज वैश्विक महाक्रांति के इस दौर में चुनौती यह नहीं है कि भारत विश्व के समक्ष अपनी शिक्षा व्यवस्था की स्तरीयता सिद्ध करे बल्कि यह है कि यह स्वयं सहित पूरे विश्व को संक्रमण के इस दौर में मार्गदर्शन करे। यह तय है कि इस लक्ष्य के निमित्त प्रयास को सफल बनाने में शिक्षा की भूमिका आधारभूत होगी। आलेख में समकालीन परिदृश्य को दृष्टिगत करते हुए भारतीय शिक्षा और शिक्षक की स्थिति को लेकर विचारार्थ कतिपय बिंदु प्रस्तावित हैं। 

आज भारत को विश्व की जरूरत से ज़्यादा विश्व को भारत की जरूरत है। भारत का दर्शन ही विश्व को सभ्यताओं के संघर्ष, जातीय विद्वेष, पारिस्थीतिकीय असंतुलन, आसुरी रक्तपात तथा आत्मघाती संताप के प्रकोप से बचा सकता है। यह भी तय है कि भारत विश्व के बौद्धिक नेतृत्व की अपनी स्वाभाविक भूमिका के सम्यक् निर्वहन के द्वारा ही अंतरराष्ट्रीय जगत में भारतीय सभ्यता को चुनौती देने वाली ताक़तों को परास्त कर सकेगा। वैश्विक नेतृत्व के स्वाभाविक और नैतिक दायित्व के निर्वहन हेतु भारत को पहले स्वयं तैयार होना होगा। भौतिक विपन्नता, सांस्कृतिक क्षरण तथा बौद्धिक विकलता के साथ इस तरह की भूमिका के प्रयास हास्यास्पद ही होंगे। ऐसी स्थिति स्वतः सिद्ध होगी यदि राष्ट्र संपत्ति, संस्कृति और बौद्धिक रूप से उत्कृष्टता के शिखर पर हो। यहाँ यह तथ्य रेखांकित करना आवश्यक है कि भारत का उत्थान सभ्यता का उत्थान है न कि बर्बरता का परिमार्जन है। भारत को अपना वैश्विक नेतृत्व सुनिश्चित करने के लिए आतंरिक तौर से सुसंगठित होना होगा। भारत को शक्ति, संपत्ति और संस्कृति के दृष्टिकोण से वैश्विक धुरी बनना होगा। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था ही आधार हो सकती है। ज्ञान किसी भी योजना का आधार है। ज्ञान ही श्रेष्ठता का साधन है और साध्य भी। मानव प्रकृति की विशिष्टता उसके ज्ञान बोध की क्षमता है।

राष्ट्र पुनरुत्थान के अभियान की सफलता शिक्षा के साथ ही शिक्षकों को केंद्र में रखे बिना संभव नहीं है। उत्कृष्टता की सामाजिकता राष्ट्रोद्भव की आधाररभूमि है और ऐसी सामाजिकता शिक्षकों के नेतृत्व की मांग करती है। गुरुओं की प्रभुता ने ही प्राचीन भारत को विश्वगुरु बनाया था। यदि भारत अपनी पुरातन सभ्यता के बल, वैभव और गौरव के अनुरूप पुनर्स्थापित होना चाहता है तो उसे निश्चित रूप से शिक्षा और शिक्षकों को इस अभियान के केंद्र में लाना होगा। आज स्थिति यह है कि भारत में शिक्षा और शिक्षक परिस्थितियों को प्रभावित करने के स्थान पर स्वयं परिस्थितियों के दास बने हुए हैं। शिक्षा व्यवस्था की स्थिति राजनैतिक और आर्थिक तंत्र के संयंत्र की तरह है। परिणामतः विडम्बना यह उत्पन्न हो रही है कि आज सभी शिक्षकों को ही शिक्षित करने में लगे हुए हैं। इस विडम्बना की जड़ें भारत के दासता के इतिहास में है। विदेशी दासता के दौर में भारतीय सभ्यता की प्रभुसत्ता विच्छिन्न हो गयी, जिसका अति नकारात्मक प्रभाव यहाँ की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ा। समस्त गुरुकुल हीनता के भाव से ग्रस्त हो गए। आंग्ल शासन के दौर में उस पुरातन व्यवस्था को समूल ही नष्ट कर दिया गया और आधुनिक शिक्षा के नाम पर समस्त शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों को उपनिवेश के औचित्य सिद्धि का उपकरण बना दिया गया। स्वतंत्रता अभियान के दौर से ही अपना प्रभाव प्रबल कर रहे वामपंथ ने बाकी कसर पूरी कर दी। इसकी छाया में शिक्षकों समेत पूरी शिक्षा व्यवस्था ही भ्रमजाल में फंस गयी और शिक्षाजगत राष्ट्रोत्थान के अभियान को तिलांजलि देकर एक घातक निरर्थकता में लिप्त हो गया। इस स्थिति का परिणाम स्पष्ट दृष्टिगोचर है। भारत अपनी सभ्यता में अन्तर्निहित उत्कृष्टता को जीवंत करने के बजाय भौतिक और बौद्धिक विपन्नता के साथ आतंरिक कलहों में ही उलझा रहा है और साथ ही देश वैश्विक सभ्यता को नेतृत्व प्रदान करने के स्थान पर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के कुचक्र में फंसा रहा है। 

इस तथ्य को पूरी गंभीरता से समझना होगा कि शिक्षा व्यवस्था पर संकेंद्रण की आवश्यकता विशेषकर समकालीन परिस्थितियों में अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। पहली परिस्थिति देश में जनतंत्र की गहरी होती जड़े हैं। देश में सापेक्षिक विकास तथा जन जागरूकता के कारण राजनीति में रुचि और भागीदारी पूर्व की तुलना में अत्यंत व्यापक हो चुकी है। सोशल मीडिया के द्वारा लोकमत का प्रभाव बहुत ही बढ़ा है। जनतंत्र का निरंतर विस्तार और गहन होते जाना देश की राजनीतिक विकास का प्रमाण है लेकिन यह देश के समक्ष एक बड़ी चुनौती भी है। जनमत की बृहत्तर भूमिका जन संस्कृति की श्रेष्ठता के बिना लोकतंत्र के लिए अनिष्टकर ही सिद्ध होगी। ऐसी स्थिति में देश को एक बौद्धिक समाज में बदलने की आवश्यकता है। लोकमत में अज्ञान और पूर्वग्रह का विलोप एक स्वस्थ और विकासशील जनतंत्र की प्राथमिक आवश्यकता है। 

भारत में व्यापक निरक्षरता तथा निर्धनता के उपरांत भी जनतंत्र की सफलता अधिकतर विशेषज्ञों के लिए एक अबूझ पहेली है। कुछ तथाकथित विद्वान इसका श्रेय ब्रिटिश उपनिवेशवाद को भी देते हैं जो सर्वथा आधारहीन है। यदि ऐसा होता तो पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कॉमनवेल्थ के सभी देश जनतंत्र होते। वास्तव में भारत में जनतंत्र की जड़ें भारत की पुरातन सभ्यता में है। उस प्राचीन सभ्यता में अन्तर्निहित उत्कृष्टता का पूर्ण प्रस्फुटन शिक्षा की सार्वजनीन व्यापकता और श्रेष्ठता के द्वारा ही हो सकता है। यदि यह स्थिति फलीभूत होती है तो एक विकारहीन जनतंत्र भारत में स्थापित होगा जो समस्त मानवता के लिए प्रतिमान होगा। 

जनतंत्र से जुड़ा मुद्दा आर्थिक उन्नति का भी है। स्वशासन विपत्ति का नहीं बल्कि संपत्ति का हेतु है। यदि जनतंत्र आर्थिक उन्नति में बाधक है, विपन्नता की पोषक है, तो यह समझना होगा कि ऐसी व्यवस्था जनतंत्र न होकर जनतंत्र का छद्म है। यह तथ्य रेखांकित करना भी समीचीन होगा कि आर्थिक दृष्टिकोण से सबसे महत्वपूर्ण सम्पदा मानव पूँजी है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति में संस्कार, कौशल और मेधा का निवेश ही आर्थिक उन्नति का आधार है। दूसरे शब्दों में शिक्षा व्यवस्था जनतंत्र का प्राथमिक सरोकार है। 

विशेषकर वर्त्तमान वैश्विक स्थिति में शिक्षा का मुद्दा बेहद नाजुक हो चुका है। संक्रमण के इस दौर में जबकि स्थापित मान्यताएँ टूट रही हैं और मानदंडों को लेकर भारी भ्रम है, उस समय शिक्षा को लेकर किसी तरह की लापरवाही सांस्कृतिक आत्मघात से कम सिद्ध नहीं होगी। यह समय है कि समस्त समाज, विद्वत वर्ग और शिक्षा जगत साथ मिलकर सुसंगठित रूप से शिक्षाव्यवस्था में अभीष्ट परिवर्तन के लिए कार्यशील हो। आज समाज में जीवंत आदर्शों की जरूरत है जो समाज को भटकाव के तमाम राहों से सुरक्षित निकालते हुए एक शिष्ट और सम्यक जीवन प्रणाली की और प्रवृत्त कर सके। ऐसी स्थिति बलपूर्वक नहीं लाई जा सकती है । यह मार्ग शिक्षक वर्ग आपने आचरण से प्रशस्त करेगा। इसके लिए आवश्यक है कि समाज अपना अधिकतम संसाधन शिक्षा में निवेशित करे, श्रेष्ठ प्रतिभाओं को इस क्षेत्र में लाए और पूरी निष्ठा के साथ शिक्षा व्यवस्था के पीछे खड़ा हो। नहीं भूलना चाहिए कि समाज, राष्ट्र और मानवता के मूल्य विद्यापीठों में निर्मित और धारित होते हैं। प्रश्न है कि समाज की मेधा और ऊर्जा को किस तरह से शिक्षा व्यवस्था के परिष्कार हेतु प्रवृत्त किया जाए । कहना अनावश्यक है कि शिक्षा की व्यवस्था सरकार का पारिभाषिक दायित्व है। शासन के स्थानीय, प्रांतीय और केंद्रीय, प्रत्येक स्तर पर इस दायित्व के सम्यक् और उत्कृष्ट निर्वहन हेतु उत्साहपूर्ण निष्ठा होनी चाहिए। यह भी जरूरी है कि प्रत्येक स्तर की सरकार शिक्षा को अपना सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य समझे और इस मद पर राजकोष का सर्वाधिक धन व्यय करे। 

यह तथ्य तो निर्विवाद है कि शिक्षा की व्यवस्था सरकार के अस्तित्व का प्रधान ध्येय है लेकिन इस में भी कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि यह मात्र सरकार का दायित्व नहीं है। नागरिक समाज और निजी प्रयासों की भूमिका इस क्षेत्र में समान रूप से वांछित है। पारमार्थिक संगठन इस क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं और देश की शिक्षा के विकास में महती भूमिका निभा रहे हैं। आज हालांकि विचारणीय प्रश्न यह है कि भारत के निजी उपक्रम, जो वैश्विक स्तर पर भारतीय उद्यम के शक्ति को बहुत थोड़े समय में प्रतिष्ठापित कर चुके हैं, को कैसे शिक्षा के विकास से जोड़ा जाए। यह भी आवश्यक कि शिक्षा संस्थानों को सहकारिता के माध्यम से भी चलाया जाए । दूसरे शब्दों में शिक्षा को सहकारी क्षेत्र में भी लाया जाए।  

समकालीन युग वैश्वीकरण का युग है। विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक तथा विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र और एक प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की विश्व में वृहत्तर भूमिका की आवश्यकता है। यह भारत के शक्ति संवर्द्धन और आर्थिक उन्नति के लिए भी अपरिहार्य है। भारत के इस लक्ष्य की प्राप्ति के निमित्त उच्चतर शिक्षा में गुणात्मक सुधार, विस्तार और इसका अंतरराष्ट्रीयकरण सर्वाधिक प्रभावी माध्यम हो सकता है। उच्चतर शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण से भारतीयों के अंतरराष्ट्रीय समझ और संपर्क में बढ़ोतरी होगी। विश्व के अन्य विकसित देशों के साथ चलने के लिए भी उच्चशिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीयता शिक्षा प्रणाली में सुधार का प्रधान ध्येय होना चाहिए। अत्यंत तोष का विषय है कि भारत सरकार उच्चतर शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की पक्षधर है और इस दिशा में अग्रसर है। सरकार ने नीति आयोग को विदेशी विद्यालयों के द्वारा भारत में परिसर स्थापित करें हेतु दिशानिर्देश तैयार करने को कहा है । 

प्राचीन भारत समकालीन विश्व में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी था। मध्यकालीन विदेशी दासता के दौर में भारत ज्ञान-गवेषणा के क्षेत्र में पिछड़ गया और दासता भारतीय मानस पर प्रभावी होने लगी। आज समय आ गया है कि भारत विश्वगुरु की अपनी भूमिका को पुनर्जीवित करे और विश्व का अपनी समस्याओं से त्राण पाने में मार्गदर्शन करे। इस उद्देश्य से भी भारत की शिक्षा व्यवस्था का अंतरराष्ट्रीयकरण आवश्यक है। यहाँ यह तथ्य उल्लेखनीय है कि यदि भारत सनातन परम्परा में अन्तर्निहित मानवीयता के श्रेष्ठतम मूल्यों को विश्वपटल पर प्रतिष्ठापित करना चाहता है तो उसे स्वयं की उपस्थिति और प्रभाव को विश्वव्यापी बनाना होगा। आज का युग ज्ञान का युग है, व्यापक विचार विनिमय का युग है। इस दौर में भारत के विश्वबंधुत्व का सन्देश सर्वत्र अपनी जगह बना सकता है। भारतीय राष्ट्र की उद्दात्त भावना अन्य जनों को उनकी संकीर्ण राष्ट्रीयता की दायरे से बाहर ला सकती है। 


इस लक्ष्य की व्यापक प्राप्ति के लिए अनेक तरह के उपाय अपनाए जा सकते हैं। पहला यह होना चाहिए कि भारत के सभी विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय हों। भारत के प्रत्येक विश्वविद्यालय की कोशिश होनी चाहिए कि वहाँ हर महाद्वीप और अधिकतम राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व हो। इन विश्वविद्यालयों में ऐसी व्यवस्था हो कि विश्व की श्रेष्ठ प्रतिभाएँ इनमें शिक्षक, शोधार्थी और शिक्षार्थी के रूप में स्थान पाने के लिए प्रतिस्पर्द्धा करें । दूसरा, भारतीय विश्वविद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों को भिन्न देशों में अपनी शाखाएँ, परिसर या स्वतन्त्र विश्वविद्यालय खोलने की स्वतंत्रता और क्षमता होनी चाहिए। तीसरा, अन्य देशों के विश्वविद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों का भी भारत में स्वागत होना चाहिए। चौथा, देश के सभी विश्वविद्यालयों में देश और विदेश के अन्य विश्वविद्यालयों से शिक्षकों और शिक्षार्थियों के आदान-प्रदान की व्यवस्था होनी चाहिए। पाँचवा, देश के शिक्षण संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों को अध्ययन तथा प्रशिक्षण हेतु विदेशी विश्वविद्यालय भेजे जाने चाहिए। इसके साथ ही भारतीय छात्रों को विदेशों में पढ़ने के लिए प्रोत्साहन और सहायता दी जानी चाहिए। 

शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण से भारतीय छात्र सही मायने में राष्ट्रीय और वैश्विक दृष्टिकोण विकसित कर सकेंगे। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीयता समय की आवश्यकता है। वैश्वीकरण के इस युग में अर्थव्यवस्था का अंतर्राष्ट्रीयकरण अनिवार्य है। इस तरह की प्रतियोगिता में बने रहने के लिए उच्च शिक्षा का भी अंतरराष्ट्रीयकरण आवश्यक है। यह विश्व बाज़ार को समझने और वैश्विक संपर्क का आधार होगा। उदाहरण के लिए किसी अंतरराष्ट्रीय प्रबंध संस्थान के स्नातकों का अर्थव्यवस्था का ज्ञान और व्यक्तिगत संपर्क स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय होगा, जो वैश्वीकरण के युग में प्रबंधकों की सफलता का अपरिहार्य सूत्र है। आर्थिक कारणों के इतर भी इस तरह की व्यवस्था की सकारात्मकता व्यापक है। 

पूरी चर्चा का प्रधान ध्येय इस आवश्यकता को इंगित करना है कि शिक्षा और शिक्षक की भूमिका समाज और राष्ट्र के उत्थान में आधारभूत है। शिक्षा और शिक्षकों को दासता के दौर में समाज के अग्रदूत की भूमिका से अलग कर दिया गया था। आज उस स्थिति को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है।

- नीरज कुमार झा 

बुधवार, 5 अगस्त 2015

शिक्षा में स्वायत्तता; स्थापना के उपक्रम

शिक्षा में स्वायत्तता की अभीष्टता स्वयंसिद्ध है। ज्ञान सृजन, संग्रहण और प्रसार का बंधन मुक्त होना ही मूलतया स्वतंत्रता की स्थिति और इसकी निरंतरता की शर्त है।   स्वायत्त ज्ञान विकास का भी हेतु है। ज्ञान के सतत् सृजन तथा आदान-प्रदान से ही समाज आगे बढ़ता है। धर्मसुधार आंदोलन तथा पुनर्जागरण के दौर में यूरोप में उत्पन्न वैचारिक क्रांति ही यूरोप को सभ्यता के शिखर पर ले गयी। समाज में आर्थिक उन्नति, सामाजिक सौहार्द्र तथा सांस्कृतिक उन्नयन के लिए समाज  में ज्ञान की  प्रधानता आवश्यक है।  वैश्विक स्तर पर भी शांति और सहयोग ज्ञान की संप्रभुता के द्वारा ही संभव  है। हालांकि ज्ञान का स्वरूप मानव विरोधी तथा विध्वंसात्मक भी हो सकता है। उदहारण के लिए तमाम विनाशकारी शस्त्रास्त्र विज्ञान की देन हैं लेकिन यहाँ ध्यातव्य है कि  इस तरह का विज्ञान ज्ञान के ऊपर नियंत्रण के कारण  उत्पन्न होता है। स्वायत्त ज्ञान अधिकतर लोकहितकारी ही होता है। प्राचीन भारत की सम्प्रभु ज्ञानगवेषणा अखण्डित  मानववाद की आधारशिला है। इस सन्दर्भ में वसुधैव कुटुम्बकम् (1) जैसे अनेक अवधारणाओं को रखा जा सकता है। ज्ञान की संप्रभुता के लिए शिक्षा की स्वायत्तता अपरिहार्य है।
यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि शिक्षा में स्वायत्तता की स्थापना कैसे हो? स्वायत्तता एकबारगी  मिल भी नहीं सकती। इस कारण से ज़्यादा प्रासंगिक मुद्दा यह है कि  शिक्षा में स्वायत्तता का विस्तार कैसे हो और उपलब्ध स्वायत्तता की रक्षा कैसे हो? शिक्षा की स्वायत्तता की समस्या शासन-प्रशासन तथा बाजार के नियंत्रणकारी प्रभाव से जुड़ी है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सामान्य सुझावों के इतर कतिपय आधारभूत उपायों की चर्चा यहाँ बीजरूप में की गई है। निम्न विमर्श के आधार रूप में द्विपक्षीय मान्यता यह है कि शिक्षा की स्वायत्तता के विस्तार के उपक्रम में प्रथम दायित्व शिक्षक समुदाय का ही है और उसको इसलिए अपनी भूमिका और लक्ष्य का सही संज्ञान होना चाहिए ।


(1) वसुधैव कुटुम्बकम् का प्रथम उल्लेख महोपनिषद में है, जिसका रचनाकाल ईसा पूर्व ३००० वर्ष माना गया है. नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के सामान्य सभा के अपने ऐतिहासिक सम्बोधन में वसुधैव कुटुम्बकम्  को  भारत  का दर्शन होना बताया. द  हिन्दू,  सितम्बर २८, २०१४.

सोमवार, 21 सितंबर 2009

उच्च शिक्षा : सन्दर्भ मध्यप्रदेश

नीरज कुमार झा



         भारत के मध्य में एक विशाल राज्य के रूप में मध्यप्रदेश की स्थापना का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता तथा अखंडता को अक्षुण रखने के लिये एक ठोस केन्द्रीय क्षेत्र का निर्माण करना था. १ नवम्बर २००० को छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने से पूर्व क्षेत्रफल के अनुसार यह भारत का सबसे बड़ा राज्य था. यह अभी भी राजस्थान के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है. इसका क्षेत्रफल ३०८,१४४ वर्ग किलोमीटर है. इसका आकार दुनियाँ में क्षेत्रफल के अनुसार क्रमशः ७१वें तथा ७२वें क्रम के इटली तथा फिलीपिंस जैसे देशों से बड़ा है. आबादी के अनुसार भारत में इसका स्थान ७वां है जो विश्व में आबादी के हिसाब से २२वें क्रम के यूनाइटेड किंगडम तथा २३वें क्रम के इटली के बीच का है. हर दृष्टि से मध्यप्रदेश एक विशाल भूखंड है. सभ्यता तथा संस्कृति के दृष्टिकोण से भी इस प्रदेश में भारतीय सभ्यता के अनेक पुरातन केंद्र स्थित हैं. राष्ट्रनिर्माण तथा भारतीय सभ्यता के उत्थान में इस राज्य की महती भूमिका को रेखांकित करना अनावश्यक है, अर्थात् स्वयंसिद्ध है. इस प्रदेश के नागरिकों ने भी सदैव राष्ट्रीय सोच का ही पोषण किया है. मध्यप्रदेश बिरले राज्यों में है जहाँ आज तक कोई राज्य स्तरीय या क्षेत्रीय दल पनप नहीं पाया है.
         राष्ट्र और सभ्यता के ध्येयों की पूर्ति हालांकि मात्र वृहद् आकार से संभव नहीं है. एक पिछड़े राज्य के रूप में मध्यप्रदेश राष्ट्र का मर्मस्थल कदापि नहीं बन सकता है. राष्ट्रीय एकता तथा प्रतिष्ठा को सुदृढ़ करने के लिये मध्यप्रदेश को शक्ति तथा आकर्षण का पुंज बनना होगा. यह शक्ति तथा आकर्षण प्रदेश के आर्थिक विकास तथा सांस्कृतिक उन्नयन से ही संभव है. उन्नति का मानदंड भी राष्ट्रीय न होकर वैश्विक हो, यही आज के दौर में उचित है. आर्थिक विकास से पर्यावरण का मुद्दा भी जुड़ा है. पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए उच्च स्तरीय प्रबंधन की आवश्यकता होती है. विकास के लिए अन्य प्रमुख आवश्यकताएँ उन्नत अधोसंरचना, प्रभावी कानून-व्यवस्था व न्यायप्रणाली तथा स्वच्छ, सक्षम, एवं मैत्रीपूर्ण प्रशासन है. इन सबके लिए जरूरी है योग्य तथा निष्ठापूर्ण नेतृत्व. मध्यप्रदेश में आज गत्यात्मकता है, यहाँ विकास हो रहा है, तथा प्रदेश में सक्षम नेतृत्व भी है लेकिन वैश्विक स्तर पर स्थान बनाने के लिये आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक स्तर पर बहुत कुछ अपेक्षित है. विश्वस्तरीय मानदंडों के लिये जिस सोच, समझ तथा क्षमता की आवश्यकता है, वह तो राष्ट्रीय स्तर पर भी न्यून ही है. इसके लिये उत्कृष्ट नेतृत्व तथा श्रेष्ठ राजनैतिक संस्कृति का संयोग होना आवश्यक है.
          सारी बात जहाँ आकर ठहरती है वह है शिक्षा. एक बेहतरीन शिक्षा प्रणाली के द्वारा ही प्रदेश प्रगति के आवश्यक शर्तों की पूर्ति के लिये जमीन तैयार कर सकता है. आज प्रदेश में शिक्षा का स्तर राष्ट्रस्तरीय भी नहीं है जबकि आज के दौर में जो विश्वस्तरीय नहीं है वह इस विश्वग्राम में बेमानी है. भारत के उद्योग-धंधे चीख-चीख कर कह रहे हैं कि भारतीय शिक्षाप्रणाली के बहुसंख्य स्नातक उनके किसी काम के नहीं है. हालांकि उच्च स्तरीय शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य मात्र सरकार तथा अर्थव्यवस्था के लिये कामगार उपलब्ध कराना नहीं है. इसका प्रभाव सर्वव्यापी है. उदाहरण के लिये समाज में अपराध का भी प्रमुख कारण शिक्षाव्यवस्था की खामियाँ हैं. अधिकतर अपराध दिमाग में पनपते हैं जिसकी औषधि, जैसा कि प्लैटो ने कहा था, शिक्षा है. प्रशासन तथा प्रबंधन में दक्षता तथा यहाँ तक कि समाज में नैतिकता के लिये भी शिक्षा की गुणवत्ता निर्णायक है लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भारत में दिवास्वप्न की तरह है. यहाँ प्रतियोगिता, प्रशिक्षण तथा दक्षता के नाम पर तोता-रटाई ही चलन में है. यह प्रणाली भारतीयों को पहल, प्रयोग तथा परिवर्तन के दृष्टिकोण से अनुपयुक्त बनाती है.
         शिक्षा को उठाने के लिये पहली चुनौती समुचित रूप से शिक्षितों की उपलब्धता की है तथा दूसरी चुनौती शिक्षा को लेकर सही सोच को विकसित करने की है. इनका समाधान तत्कालीन तौर पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात देशी शिक्षाविदों को तथा विदेशी शिक्षाविदों को भी उनकी शर्तों पर स्वायत्त रूप से शिक्षण संस्थानों के निर्माण तथा विकास करने के लिये आमंत्रित कर किया जा सकता है. यह चीन द्वारा शिक्षा के विकास को लेकर अपनायी रणनीतियों में से एक है. दूसरी आवश्यकता इस क्षेत्र में सरकारी सर्वाधिकार तथा नियंत्रण से मुक्ति पाने की है. ज्ञान आयोग तथा यशपाल समिति की सिफारिशें इस संदर्भ में महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं. यह क्षेत्र वास्तव में सबके लिये खुला होना चाहिए. इसमें सरकार, निजी निकाय, परमार्थिक संस्थाएँ, स्वयंसेवी संगठन, लाभ के सिद्धांत पर कार्यशील कारपोरेट प्रतिष्ठान तथा विदेशी संस्थानों आदि सभी की आवश्यकता इस क्षेत्र में है. भारत में शिक्षा के क्षेत्र में लाभ की अनुमति नहीं है. यह शिक्षा में पाखण्ड तथा भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण है. लाभ बिलकुल वाजिब मंशा है. इसका विकल्प अधिकांशतः कपटियों को खुली छूट देना ही है. प्रणाली, दृष्टिकोण, सोच तथा ध्येय की विविधता तथा प्रतियोगिता ही शिक्षा को उपलब्ध की उँचाइयों तथा संभावनाओं की व्यापकता में ले जा सकती है.
         तीसरी आवश्यकता समाज में उपलब्ध श्रेष्ठ प्रतिभाओं को इस क्षेत्र में लाने की है. आज भी देश की श्रेष्ठ प्रतिभाएँ शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं लेकिन वे इस क्षेत्र में दी जाने वाली सुविधाओं की वजह से नहीं बल्कि तमाम असुविधाओं के बावजूद इसमें आते हैं. उनकी प्रतिबद्धता उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में लाती है. आवश्यकता इस अध्यवसाय को सर्वाधिक आकर्षक बनाने की है ताकि श्रेष्ठतम प्रतिभाएँ बेझिझक मानवहित के सबसे महत्वपूर्ण कार्य में सम्मिलित हो सकें. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रदत्त नवीन वेतनमान इस दिशा में प्रारंभिक चरण है. इसके साथ ही शिक्षकों को अध्ययन, अध्यापन तथा शोध हेतु प्रवृत्त करने के लिये उचित सुविधाओं, प्रशिक्षण तथा वातावरण उपलब्ध करवाने की आवश्यकता है. शिक्षा को लेकर तदर्थवादी सोच तथा लापरवाही समाज के लिये घातक है. यहाँ यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि शिक्षा को निजी निकायों के लिये खोलने का मतलब यह कदापि नहीं है कि सरकार अपनी भूमिका को कम करे. इस क्षेत्र में सरकार की प्रतिबद्धता को सघन तथा आवंटन को बढ़ाने की आवश्यकता है लेकिन साथ ही उसकी भूमिका को पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है, जैसाकि ऊपर स्पष्ट किया गया है. यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा सरकार का प्राथमिक दायित्व है.

         मध्यप्रदेश में शिक्षा का स्तर ऐसा होना चाहिए कि शिक्षा ग्रहण करने के लिये देश के कोने-कोने से ही नहीं बल्कि विकसित देशों से भी छात्र यहाँ पहुँचें. यहाँ के स्नातक ऐसे हों जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय के स्नातकों की तरह वैश्विक नेतृत्व में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने में सक्षम हों. मध्यप्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता जब विश्व के शीर्ष पर होगी तब ही प्रदेश राष्ट्रीय एकता तथा प्रतिष्ठा का भी मजबूत केंद्र बन सकेगा. ऐसा करके यह प्रदेश भारत के सभी हिस्सों के लोगों को अपनी भारतीयता को लेकर गर्वान्वित होने के लिये प्रेरित करेगा. ऐसी व्यवस्था सनातन मूल्यों की गरिमा को मानव कल्याण हेतु विश्वस्तर पर भी प्रतिष्ठापित करने के लिये भी आवश्यक है. यह प्रदेश अपने संसाधनों तथा राष्ट्रवादी सोच में प्रखरता के आधार पर ऐसा कर सकता है.

नीरज कुमार झा, "शिक्षा से मप्र बन सकता है सुदृढ़ राज्य," स्वदेश, २८ अगस्त २००९, पृ. ६.