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गुरुवार, 26 मार्च 2026

ज्ञान : कतिपय स्पष्टीकरण

ज्ञान तभी ज्ञान है, जब उसे धारण किया जाए; यह भंडारण हेतु मात्र वस्तु नहीं है। ज्ञान आचरण में परिलक्षित प्रवृत्तियाँ हैं; सम्प्रेषण की निपुणता ज्ञान-अज्ञान से निरपेक्ष एक कौशल है। ज्ञान संवेदना और सौंदर्यबोध है; यह प्रभुता, धन या यश की प्राप्ति की युक्ति नहीं है। ज्ञान पीड़ा, वंचना, निरर्थकता, नीरसता, अन्याय और संघर्षों के शमन हेतु विज्ञान का संधान है; यह अन्यीकरण की योजना के द्वारा शोषण, दोहन और परपीड़न का उपक्रम नहीं है। ज्ञान, सहानुभूति और स्वानुभूति की क्षमता है; नाटकीय प्रदर्शन या मंचन में दक्षता इसके इतर एक कला है।

नीरज कुमार झा

रविवार, 17 नवंबर 2024

ज्ञान

ज्ञान की पारिभाषिक प्रकृति पारमार्थिक है। यह अहं की पुष्टि का माध्यम अथवा स्वार्थ सिद्धि का आवरण नहीं हो सकता है।
 
यह भी सत्य है कि परमार्थ स्वार्थ से अभिन्न है। सर्वहित में ही स्वहित की सर्वोत्तम उपलब्धि सम्भव है।

व्यावहारिकता मध्यममार्ग है। सबके भले के साथ अपनी भलाई का उपक्रम उचित है। इसकी सीमा है किसी को हानि पहुँचाए लाभ हेतु प्रयास। इससे निम्न कर्म समाज के विरूद्ध है और किसी के हित में नहीं है।

नीरज कुमार झा

सोमवार, 17 जून 2024

ज्ञान, बुद्धि, कौशल, और चतुराई

ज्ञान, बुद्धि, और कौशल पृथक् विशिष्टताएँ हैं। यह बात अटपटी लग सकती है, लेकिन ज्ञानी व्यक्ति बुद्धिमान हो, जरूरी नहीं है, और कार्यकुशल हो, यह तो बिल्कुल जरूरी नहीं है। एक व्यक्ति का इन सभी गुणों से युक्त होना दुर्लभ है। एक व्यक्ति जो कार्यकरण में निष्णात है, हो सकता है कि ज्ञान से बिल्कुल रहित हो।

मेरे उक्त अभिव्यक्ति का उद्देश्य यह रेखांकित करना है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का आकलन संदर्भ के अनुसार ही होना चाहिए।

ज्ञानी व्यक्ति का बुद्धिमान नहीं होना एक व्यापक त्रासदी है। ऐसे व्यक्तियों के पास ज्ञान का विपुल भंडार होता है, लेकिन हो सकता है कि वह ज्ञान के ध्येय और प्रभाव से अनभिज्ञ हो। उसके द्वारा ज्ञान का सम्प्रेषण वास्तविकता से असंपृक्त अथवा लोकहित का प्रतिगामी हो सकता है।

ज्ञानी और मूर्ख में भेद कर पाना भी एक कठिन चुनौती है। लोग इसके लिए व्यक्ति को प्राप्त उपाधियों अथवा पद के आधार पर उसका मूल्यांकन करते हैं, जो प्रायः भ्रामक होता है।

ज्ञान का एक प्रबल पक्ष ज्ञानी व्यक्ति का सर्वहित की व्यवस्थागत विचारों से अवगत होने की स्थिति और उसके विस्तार करने की क्षमता है। मेरे विचार से ज्ञानी व्यक्ति की प्रकृति की विशिष्टता वैचारिक संवेदना है। यदि विद्वान कर्मणा भी सज्जन और जनहितैषी है, तो वही मेरे लिए महान है।

जनहितैषी विचारों में जन की प्रभुसत्ता रहे, विचारों की नहीं, यह भी जरूरी है। विचारों की आग पर लोगों का पकाया जाना ज्ञान और बुद्धि की विकृति है; और विडंबना यही है कि यही विद्वता का सर्वाधिक क्रियाशील स्वरूप है।

ज्ञान, बुद्धि, और कौशल, अथवा कौशल से युक्त होने मात्र से जीवन में सफलता मिले, यह तो लगभग एक संयोग ही है। इसके लिए एक अलग विशिष्टता की आवश्यकता पड़ती है, वह है चतुराई। यह बुद्धि का स्वहित में लक्ष्यबेधी संधान है। यह अन्य का स्रोतीकरण है। ऐसे जन स्वयं को स्वाभाविक रूप से साध्य और अन्य को साधन के रूप में प्रयोग करते हैं। उनके लिए ज्ञान भी स्वहित हेतु एक संसाधन मात्र है।

नीरज कुमार झा

रविवार, 26 मई 2024

ज्ञानदंभ

मानवीयता का सार और स्वरूप, दोनों ही, ज्ञान है। किसी में ज्ञानग्राह्यता की क्षमता का अभाव उसमें मानवीय गुणों का अविकसित रह जाना है (यहाँ ज्ञान का अभिप्राय आदमियों के निर्धारित कार्य में मशीनी प्रवीणता से नहीं है।)। प्रत्येक सभ्य समाज में प्रारम्भिक औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था इसी उद्देश्य से की जाती है कि बच्चों में ज्ञानग्राह्यता की क्षमता जगायी जा सके। औपनिवेशिक शिक्षाप्रणाली इसका अपवाद है (यहाँ औपनिवेशविक शासनप्रणाली से अभिप्रयाय उस शासनप्रणाली है से जिसमें शासनकर्मियों के लिए उनके द्वारा शासित/सेवित जन का हित उनका प्रधान सरोकार नहीं हो पाता है।)। ऐसी व्यवस्थाओं में बच्चों और लोगों की औपचारिक रूप से शिक्षित तो किया जाता है लेकिन व्यवस्था-नियोजन इस तरह से होता है कि उसके प्रभावस्वरूप शिक्षार्थियों की ज्ञानग्राह्यता की क्षमता प्रभावी रूप से कुंठित हो जाती है। आज की प्रौद्योगिकी की भाषा में कहें तो उनकी प्रोग्रामिंग की जाती है। ऐसी निष्प्रभावी शिक्षा का प्रभाव किसी व्यक्ति में स्पष्ट दिखता है। वह है उनका तथाकथित ज्ञान को लेकर दंभ। ऐसे व्यक्तिअक्सर मिल जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों के कर्ण मात्र स्वयं के मस्तिष्क की प्रतिध्वनि का श्रवण करते हैं।

नीरज कुमार झा