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सोमवार, 16 जनवरी 2023

स्वतंत्रताओं का सम्मान

मैंने यहाँ स्वतंत्रता को एक अमूर्त धारणा के रूप में नहीं, वरन उन उपलब्ध  प्राप्तियों और विकल्पों के लिए किया है जो हमारी भिन्न क्रिया-कलापों को संभव बनाते  हैं। सामान्य जन के लिए स्वतंत्रता स्थिति भी है, और अभीष्ट भी। आज जो हमें प्राप्त हैं, वे  मानवोचित वांछित  की अपेक्षा न्यून ही हैं। इस संदर्भ में मैं यह रेखांकित करना चाहता हूँ कि एक-एक स्वतंत्रता के लिए विश्व की  विभिन्न समाजों की पीढ़ियों ने संघर्ष किया है, और बलिदान दिया है। जो भी उपलब्ध है, वह विरासत है दुनिया के उन सभी  जनहितैषी सुधीजनोंं के प्रयासों का  जिन्होंने न्याय के लिए  अपना सर्वस्व निछावर कर दिया। जब हम उन स्वतंत्रताओं का दुरुपयोग करते हैं, तो हम उन तमाम ज्ञात और अज्ञात महान लोगों का ही निरादर नहीं करते बल्कि स्वयं की मानवता की भी अवमानना  करते हैं। वास्तव में, स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान का अभाव उन लोगों में होता है, जिन्हें स्वतंत्रताएँ उपहार में मिली है और वे अशिक्षित और संवेदनशून्य होने के उनका महत्व नहीं समझते हैं। यह तथ्य कभी विस्मरणीय नहीं होना चाहिए कि स्वतंत्रता सबसे ऊपर उत्तरदायित्व है। उदाहरण के लिए, यदि हम कुछ बोलते हैं तो हमें उसकी प्रामाणिकता, तार्किकता, तथा प्रभावों के प्रति सजग होना चाहिए। यदि हम अपने उत्तरदायित्व की अवहेलना करते हैं तो हम मात्र स्वयं की  स्वतंत्रताओं को ही नष्ट नहीं करते हैं, बल्कि अपने स्वजनों का भी अपकार करते हैं। 

नीरज कुमार झा 

शनिवार, 4 नवंबर 2017

स्वतंत्रताओं का अर्जन व अवधारण

ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥

स्वतंत्रताओं का उपलब्ध होना स्वाभाविक स्थिति नहीं है. स्वतंत्रताओं के अर्जन, विस्तार, और अवधारण के लिए निरंतर प्रयास करना होता है. इसके लिए आवश्यक है कि नागरिक विज्ञ, सुधी, और सक्रिय हों. सबसे महत्वपूर्ण है आचरण में दायित्व भाव. नितांत निजी जीवन, यहाँ तक कि मनन में भी, से लेकर सार्वजनिक जीवन तक प्रत्येक जन का आचरण दायित्वबोध से पूर्ण और गरिमामय हो. जब स्वतंत्रताओं का दुरुपयोग होता है या स्वतंत्रताओं के प्रति उपेक्षा का भाव प्रबल हो जाता है तो स्वतंत्रताओं का क्षरण रोका जाना संभव नहीं होता है. जीवन में गंभीरता का अभाव, जो विचार और व्यवहार में फूहड़ता और उच्छृंखलता के रूप में परिलक्षित होता है, पराधीनता को स्पष्ट निमंत्रण है.

अनधीनता की स्थिति और प्राप्ति के हेतु की समझ के लिए दृष्टिकोण में वैज्ञानिकता की विद्यमानता अपरिहार्य है. चुनौती और भी विकट हो जाती है जब छद्मज्ञान प्रबल स्थिति में हो. छद्मज्ञान का कुचक्र दुष्टों तथा प्रपंचियों के दुष्प्रचार और हिंसावाद के द्वारा रक्षित होता है. ऐसी स्थिति में लोग ज्ञान से ही भयभीत रहते हैं. ज्ञान की व्यापकता ही अनधीनता का जीवन संभव बनाती है. ज्ञान की व्यापकता के लिए ज्ञान के प्रति हमारी सजगता और इसकी स्थापना के लिए तत्परता में किसी तरह की कमी और या उनको लेकर किसी तरह का प्रमाद या भीरूता हमारे स्वयं और समाज दोनों के लिए ही घातक है.

नीरज कुमार झा