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शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

तुम कहो

तुम कहो
इसलिए नहीं कि
कोई सुनेगा.
तुम कहो इसलिए
कि कहना जरूरी है.
मुझे लगता है कि
कही कभी गुम नहीं होती.
वह तैरती रहती है हवाओं में और
घुलती रहती है सांसों में.

नीरज कुमार झा

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

कहीं नहीं से आना

अनादि ही आदि का उद्गम है,
अनन्त ही अंत का तल है,
अज्ञेय ही ज्ञेय का आधार है,
अर्थहीनता ही अर्थ की भूमि है.

नीरज कुमार झा

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

मैं क्या चाहता हूँ?

मैं चाहता हूँ कि
सवालों के जवाब दिए जाएँ,
और जवाबों पर सवाल किए जाएँ.
ये खुद के हों और या किसी और के,
और के हों तो किसके,
को लेकर कभी फ़र्क नहीं किया जाए.
मैं और कुछ नहीं,
सिर्फ़ गुलामी की काट चाहता हूँ.

नीरज कुमार झा

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

ठोस कालिमा

दीप अनेक जल रहे; 
अंधेरा ज्यों का त्यों है। 
यह अंधकार कुछ अलग है; 
ठोस इसकी कालिमा  है। 

नीरज कुमार झा 

रविवार, 6 मार्च 2016

आओ, हम उस तरुवर की उपासना करें!


जो नहीं है,
आओ, हम उसकी उपासना करें !
जो है,
वह उत्पन्न हुआ है उससे,
आओ, हम उसकी उपासना करें !  
है का भूलभुलैया है,
ऊपर नहीं का आकाश है।
नहीं है का निस्तार है,
है नहीं का विस्तार है,
एक चक्षु है,
दूसरी दृष्टि है,
आओ हम जटिलताओं के पार देखें!
नहीं जड़ है,
है जीवन है,
आओ, हम उस महातरु की उपासना करें!

नीरज कुमार झा

शनिवार, 29 अगस्त 2015

अबंध


सबसे पहले तुम व्यक्ति हो

सबसे पहले
तुम व्यक्ति हो,
तुम मानवता हो,
बाद में हो तुम और कुछ,
जैसे हैं सभी.
तुम्हें नहीं जरूरत रक्षा की
या रक्षकों की.
तुम हो ही नहीं कमज़ोर.
तुम्हें सिर्फ़ ऐसा बताया गया है.
यह एक षड्यंत्र है
तुम्हें सरपरस्ती में रखने के लिए,
तुम्हें तुम्हारी मानवीयता से वंचित करने के लिए.
वे तुम्हें हर कुछ के रूप में रखना चाहते हैं,
सिवाय उसके जो तुम हो,
एक व्यक्ति, एक मानव.
तुम भी हो वही गीता वाली आत्मा,
जिसका कुछ नहीं हो सकता.
शरीर संरचना भी अलग नहीं,
यह है मात्र परस्पर पूरकता.
कलंक से इसका कोई सम्बन्ध नहीं.
समझो,
वैसा कुछ भी नहीं है,
जैसा तुम्हें महसूस होता है.
ये बनाए गए साचें हैं सिर्फ़.  
तुम फोड़ सकती हो सारे  साचों  को.
प्रार्थना है तुमसे.
मत बने रहो तुम रणक्षेत्र.
उठो मिट्टी से.
बनो तुम अग्रिम योद्धा.
अनीति-अन्याय के विरूद्ध
चल रहा आदिम संघर्ष
कर रहा है इंतजार तुम्हारा
युगों से.

नीरज कुमार झा

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

तुम ही ज्ञान हो तुम ही अंधकार हो

कोई इतना भी बड़ा नहीं हो सकता
कि तुमसे बड़ा हो जाए
कोई इतना भी छोटा नहीं हो सकता
कि तुमसे छोटा हो जाए
तुम नहीं जानते कि तुम क्या हो
तुम सब कुछ हो
और तुम कुछ भी नहीं हो
तुम ही ब्रह्माण्ड हो
तुम ही हो कण लघु
तुम ही आदि हो
तुम ही अनादि हो
तुम अंत हो
तुम ही अनंत हो
तुम ही सीमा तुम ही असीम हो
तुम ही आकार तुम ही निराकार हो
तुम ही भंगुर तुम ही सनातन हो
अस्तित्व का यह अगम अगोचर अज्ञेय विस्तार
है तुम्हारा ही विराट रूप
यह सृष्टि भी तुम ही हो
तुम्हारे ही साथ यह उत्पन्न
और तुम्हारे साथ ही हो जाएगी यह नष्ट
तुम नष्ट भी नहीं होते
तुम अजन्मा भी हो
इसलिए यह सब कुछ भी वैसा ही है
नश्वर ही शाश्वत है
शाश्वत ही नश्वर है
तुम नश्वरता में हो शाश्वत
और हो शाश्वत नश्वर भी
तुम सब कुछ समझते भी हो
और कुछ भी नहीं समझते
तुम ही ज्ञान हो तुम ही अंधकार हो

- नीरज कुमार झा

सोमवार, 13 अगस्त 2012

उम्मीद की पतली डोर

उम्मीद की पतली डोर है
परखो इसे मत इतना कि
रेशा-रेशा इसका उधड़ जाए
तुम चिंता क्यों नहीं करते
दल-दल की जिसमें हो
तुम बुरी तरह फँसे
निष्क्रिय शरीर और
चोंचलेबाजी में तुम्हारी महारत
हैरत की बात है
ऐसा तो नहीं है कि
तुम्हारे खुले मुंह में
कोई  कुछ डाल जाता है
और तुम उसी की टर्राने लगते हो


- नीरज कुमार झा





मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

क्यों ?

सच को क्यों देनी होती है
परीक्षा बार-बार
क्यों रहता है सच हमेशा
संदेह के घेरे में
क्यों सहना पड़ता है शरीफों को
तकाजा शराफत का बार-बार
ईमान क्यों गला रहा कोढ़ की तरह
ईमानदार के ही जिस्म को
पढ़े-लिखों के लिये क्यों बन गयी है
पढाई बोझ की तरह
हयादारों के लिए क्यों
हया बनी हैं बेड़ियाँ
यह कैसी हवा चली है उलटी
कि आदमीयत ही खड़ी है कटघरे में
आदमी के क़त्ल के आरोप में

- नीरज कुमार झा

बुधवार, 11 जनवरी 2012

समय लगेगा इस संकट को दूर करने में

फूहड़पन को फूहड़ता से लेना 
नहीं है बुद्धिमानी 
नहीं रह गयी यह पहचान ओछेपन की
यही है अब मुख्यधारा 
इसकी अवहेलना है घाटे का सौदा 
विरोध इसका नहीं खतरे से खाली 


मसखरे, मवाली और शातिर अपराधी
इन्हें इन नामों से अब  नहीं जाना जाता
वे हैं अब कर्णधार 
समाज के अभिभावक  
सामूहिक मामलों के मालिक 


फूहड़ता और उद्दंडता ही खरा है 
बाँकी  के आचार और व्यवहार  
नहीं चलते अब खोटे  सिक्कों की तरह 
यही है  नियति अब
लोगों और समाज की 


उपेक्षा 
साहित्य की 
संस्कृति की 
कला की 
उदासीनता 
निःस्वार्थ सरोकारों के प्रति
अनधीनता के मानदण्डो के प्रति 
समुचित शिक्षा के प्रसार के प्रति 
बौद्धिकता  के  प्रति  
अब भारी  पड़ रही है


तैयार हो चुका है ऐसा बहुसंख्य 
जो है 
मानसिक रूप से विकृत
नैतिक रूप से भ्रष्ट 
और बौद्धिक रूप से दिवालिया 
यह समय है गंभीर संकट का 
समाज की समस्त सकारात्मक ऊर्जा 
लगे तब भी 
समय लगेगा इस संकट को दूर करने में


- नीरज कुमार झा 









रविवार, 8 जनवरी 2012

यह कौन है

मौन 
अतिघनीभूत मौन 
आत्मा को जड़ करता मौन 
वाचलता
खोखली वाचालता
मस्तिष्क को भन्नाती  वाचालता 
जम चुकी है चेतना
तन में घुसा है उन्माद 
लोग हैं पड़े सडकों के किनारे  
दुःख का अंत नहीं 
लेकिन भर नहीं रहा कोई आहें 
घोर पीड़ा में भी न कोई कराह रहा 
दिल भरा है  
लेकिन आँखे हैं बिलकुल सूखी 
देख रहे वे 
वाचालता के झंझावात में उड़ते
संवेदना के सूखे पत्ते
सड़को पर 
अट्टहास करते 
इठलाते मचलते लोग 
उन्मत्त नृत्य कर रहे हैं 
किनारे चीथड़ों में लिपटी 
सूनी आँखों को सड़क पर टिकाये 
यह कौन है

- नीरज कुमार झा 

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

हममें पनपी ही नहीं भावना खुद्दारी की

वे लड़ रहे हमारी बेहतरी के लिए
हमारी गैरत के लिए
फिर भी हम हैं कि
हमें सारा दोष नज़र आता है उनमें ही
हमने खर्च कर दी सारी ऊर्जा 
उनका दोष  ढूढने में 
खुद तो कभी कुछ किया नहीं 
लेकिन सारा दिमाग लगा दिया 
उनको गलत-सही बताने में 
हमें नहीं दिखता दोष उनमें 
जिनके कारण हम नहीं रहे दो कौड़ी के 
और होते  रहे बेइज्जत बात-बेबात के
असल यह है कि 
हममें पनपी ही नहीं 
भावना खुद्दारी की 
कैसे हमें अच्छी लगे 
बातें आत्म सम्मान की 
या परस्पर मान की

- नीरज कुमार झा 


उपलब्धियाँ

मित्र नहीं कहूंगा
मेरे एक परिचित हैं
मिलने पर बताया कि
उन्होंने कार खरीद ली है और 
यह उनके  जीवन की उपलब्धि है
मुझे उपलब्धि वाली बात 
थोड़ी नहीं 
पूरी की पूरी अटपटी लगी
मेरी शिक्षा और संस्कार के अनुसार
घर या कार 
या ऐसी ही किसी भौतिक वस्तु का क्रय करना 
उपलब्धि की श्रेणी में तो कतई नहीं आता है
उपलब्धि का पैमाना
उपभोग की सामग्रियां जुटाना है 
यह समझ 
मुझे अपनी तमाम वंचनाओं के बावजूद 
बेढंगी लगती  है
हँसना चाहता हूँ 
लेकिन ऐसी उपलब्धियों की खोज में 
उन्मत्त भारी भीड़ को देखकर 
खामोश रह जाता हूँ

- नीरज कुमार झा 

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

अमीरी के कटीले झाड़

बेमुरुव्वत  मरुस्थल में 
अमीरी के कटीले झाड़ 
उग रहे तेजी से चारों ओर
चोरी-चकारी
लूट-खसोट 
ठगी और बेईमानी 
का ही जोर 
हर ओर
हैं नखलिस्तान ईमान के भी 
लेकिन दीवारें खड़ी 
उनके चारों ओर 
जमीन होती यदि सही
लगते बाग एक पर एक 
एक से एक
मेहनत के फूल खिलते
उद्यम के वृक्ष उगते
साहस के तरूवर छूते आकाश 
छाया होती घनी 
सुगन्धित होती हवा 
होती खुशी
संतुष्टि 
शांति 
चारों ओर   

- नीरज कुमार झा 

सोमवार, 12 सितंबर 2011

अभी भी दूर है सभ्यता हमसे

तय है 
भविष्य की पीढ़ियाँ
जब लिखेंगी इतिहास 
हमें रखेंगी बर्बरों की श्रेणी में
हमारी तथाकथित सभ्यता 
खर्चती है
सबसे ज़्यादा  संसाधन 
ध्वंस के उद्योगों पर
और हिंसा के प्रशिक्षण पर
मानवता की प्रगति बौनी है 
इसकी अदमित दानवता के आगे
हमारे पंथ और तंत्र के मूल में 
है अभी भी सिर्फ हिंसा
अभी भी उपेक्षित है
भारत का वसुधैव कुटुम्बकम का  सन्देश 
और अहिंसा का दर्शन 
हमारी सभ्यता अभी भी दूर है
सत्य, अहिंसा और अनुराग के
जीवन दर्शन और शैली से 
अभी भी दूर है सभ्यता
हमसे

- नीरज कुमार झा 






गुरुवार, 21 जुलाई 2011

मैं कवि नहीं कौआ हूँ

मैं कवि नहीं कौआ हूँ
जब भी मौका मिले 
कांव-कांव करने लगता हूँ  
वैसे मारा-मारा फिरता हूँ 
कुछ भी खा लेता हूँ 
जूठा-कूठा
सामिष-निरामिष 
मुर्दा-ज़िंदा
सड़ी-गली लाशें 
गिद्धों-कुत्तों से लड़कर खाता हूँ 
अंडे, छोटे पंछी और चूहे
भी डकार जाता हूँ 
जिन इंसानों के मारे भगता हूँ 
मरा या मरणासन्न भी मिले 
उसे भी नहीं बख्शता हूँ 
कुछ भी खा लेता हूँ 
विष्ठा भी नहीं छोड़ता हूँ 
कुछ भी खाता हूँ 
कैसे भी खाता हूँ 
चालाकी से 
चोरी से
डरकर 
या कभी साहस भी दिखाकर 
कोंई जुगत नहीं छोड़ता हूँ 
क्योंकि मैं कौआ हूँ
और कांव-कांव करने से भी 
कभी बाज नहीं आता हूँ 
एक से अधिक हो तो 
कांव-कांव की समा बंधती है 
दुनियाँ जाए भाड़ में 
मैं तो रहता अपनी ताक़ में 
और मौक़ा मिलते ही 
कांव-कांव करने लगता हूँ 

- नीरज कुमार झा 






रविवार, 10 अक्टूबर 2010

क्यों नहीं ....



कर्ज है हमारे  ऊपर
पुरानी पीढ़ियों का। 
अधिकतर पीढ़ियों ने
दी है बेहतर दुनियाँ
आने वाली पीढ़ियों को। 
गौर करें हम भी
अपनी विरासतों पर। 
वैसे यह बात नहीं है
सिर्फ़ नैतिकता की;
है यह बात
स्वार्थ की भी। 
अधिकतर लोग जोड़ते  हैं
ज़मीन और ज़ायदाद
औलादों के लिये।  
वे नहीं सोचते कि
आखिर वे रहेंगे कहाँ। 
समाज में ही तो !
क्यों नहीं वे कोशिश करते
उसी शिद्दत से
छोड़ने को एक बेहतर समाज
अपने बच्चों के लिये?

- नीरज कुमार झा

रविवार, 12 सितंबर 2010

देवी हिन्दी की जय हो

हिन्दी देवी हैं 
हिन्दी के पुजारी हैं 
विशेष पुरोहित हैं
वर्ष में निर्दिष्ट समय पर 
जैसी जिसकी श्रद्धा हो 
दिवस, सप्ताह या पखवाड़े भर की 
देवी की पूजा रखते हैं 
पुरोहित देवी का आह्वान करते हैं 
देवी की महिमा में कथाएँ दुहराई जाती हैं
कविताओं की आरती होती है 
चुटकुलों की बजती हैं घंटियाँ 
भाषणों के शंख बजाए जाते हैं 
देवी के नाम पर चढ़ाए  जाते है चढ़ावे  
एक-एक कर सारे अनुष्ठानों के बाद 
देवी को स्वस्थान गच्छ कह विदा दी जाती है
पुरोहित दक्षिणा पाते हैं 
दर्शकों को प्रसाद मिलता है
सभी प्रसन्न मन घर जाते हैं
देवी हिन्दी की जय हो 

- नीरज कुमार झा 


शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

बिना सिर-पैर की कुछ बेतरतीब पंक्तियाँ


(१)

कब्ज़ा हो चुका हर तरफ़  तमाशाइयों का 
तमाशा बना दिया उन्होंने पूरी दुनियाँ का 

(२)

हम ही तमाशा 
हम ही तमाशबीन 
खुद पर ताली बजा रहे हैं  
मंद-मंद मुस्कुराते तमाशाई 
सिक्के बीन रहे हैं 

(३)

अंधेरे के साये में जीने वाले 
उजियारे में उड़ान भरने लगे हैं 
अंधेरगर्दी मची है ऐसी कि चमगादड़ और उल्लू 
दिन में मँडराने लगे हैं 

(४)

बेशर्म व्यभिचारी और बेरहम हत्यारे 
इज्ज़त और ओहदे से नवाजे जा रहे हैं 
शराफत की शर्मिंदगी का बोझ ढोते
हम मुँह छिपाए फिरते हैं 

(५)

खिलवाड़ी  और नटुए भगवान कहे जा रहे हैं 
अन्नदाता किसान आत्महत्या करने को विवश हो  रहे हैं 

 (६) 

आजकल हम शरबत बहुत पीने लगे हैं 
खून मेरा मीठा नहीं 
शिकायत जोंकों की दूर कर रहे हैं 

(७)

चमड़ी तुम्हारी सख्त
डंक मारकर रेंगने वाले महोदय चिल्लाते हैं 
जहर का कहर झेल रहा मैं कराहता हूँ 
साँपजी आप सही हैं

(८)

पेट में भोजन, तन पर कपड़ा, रहने का ठौर और लुढ़काने को पहिया
हम करें परवाह क्यों कि जमीर हमारा पराया हो गया 

(९)


ख़ुद के बुने जाले में फंसे हैं 
अपना ही हाथ-पैर चबा रहे हैं 
पेट भरने से संतुष्ट भी हैं 
दर्द से बिलबिला भी रहे हैं 
यह अनोखी नस्ल
मकड़ों की नहीं 
हम आदमियों में ही 
पाई जाती है 

(१०)


शहर दर शहर खाक छान रहा कि कहीं पनाह मिले
पनाह कहाँ मुकद्दर में कि शहर के शहर बेपनाह मिले

(११)

चोर उचक्के हुए महंत 
बेपढ़ पढ़े बने जमूरे 
समझदार सर धुने
उठाईगिरे  हुए सिरमौर 
होते आज अगर 
रो रो होते बेहाल कबीर 
(१२)

महफ़िल नहीं यह
वाह वाह कहा और बढ़ गए
सुना है तो कहो भी
बातें बढ़े तो सही

(१३)

ऊँचे झरोखे से झलक दिखा जाते हो
हम भी जयकारे कर रह जाते हैं
यह तो कोई बात नहीं हुई
मेरी भी सुनो, कुछ बातें करो तो कोई बात है

(१४)


दिल की बात कहने का मन नहीं करता
खुद से भी बातें करना अच्छा नहीं लगता
बेमुरव्वत खुदगर्ज़ी और बेइंतहा फरेब के  बीच
कविता लिखना वाजिब नहीं लगता

(१५)

जंज़ीरों से क्यों है तुम्हें मुहब्बत 
रूकावटों पर तुम क्यों करते इतनी मेहनत
वर्जनाओं की कारा में
उच्छृंखलता के सेंध ही सेंध खुदे हैं
हवाओं को बह लेने दो
लोगों को जी लेने दो


- नीरज कुमार झा