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शनिवार, 11 दिसंबर 2010

भारती का भविष्य (११ व अंतिम)


यहाँ यह भी स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जब भी हिन्दी के प्रसार का प्रयास हो तो उसमें किसी तरह के वर्चस्व की भावना बिलकुल नहीं होनी चाहिए. हिन्दी का प्रत्येक भारतीय भाषा से सहयोगात्मक रवैया होना चाहिये तथा नीति सहविकास की होनी चाहिये. यहाँ तक कि हिन्दी भाषी क्षेत्र में भी हिन्दी को शिक्षण संस्थानों पर थोपना भी अनुचित होगा. यह हर सामान्य शिक्षण संस्थान का - विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक - अधिकार होना चाहिए कि वह आवश्यकतानुसार अपने शोध तथा शिक्षण के माध्यम का चयन करे. आज अँगरेज़ी का विरोध वास्तव में अप्रासंगिक हो चुका है। इस भाषा में भारतीयों की प्रवीणता देश के लिये लाभदायक सिद्ध हो रही है. आज देश में जरूरत है कि ज्यादा लोग अच्छी अँगरेज़ी सीखें.यह देश की आर्थिक प्रगति के लिये आवश्यक है. लेकिन यह ध्यान रखना नितांत आवश्यक है कि अँगरेज़ी एक साधन है न कि साध्य. अँगरेज़ी सीखना चाहिए लेकिन एक उपकरण के रूप में. सीखना गलत नहीं है, गलत है अँगरेज़ी के प्रति समर्पण, उसकी अराधना. गलत है भारती का तिरस्कार, उसकी अवमानना.

जहाँ तक विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बात है उसमें भी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति लेशमात्र नहीं होनी चाहिए. इसके विपरीत भारती के प्रसार का उद्देश्य भाषाई साम्राज्यवाद, जो वृहत्तर साम्राज्यवाद का ही हिस्सा है, का प्रतिकार होना चाहिए. साम्राज्यवाद का प्रतिकार वैकल्पिक साम्राज्यवाद नहीं वरन्‌ अन्य भाषाओं का संरक्षण है. आज यदि विश्व की पारिस्थितिकी की आवश्यकता जैव विविधता है तो विश्व समाज की जरूरत इसकी सांस्कृतिक विविधता की रक्षा है. भारती के प्रसार का प्रयास परस्पर आदान प्रदान के आधार पर हो. हिन्दी भाषी विश्व के तमाम संस्कृतियों से उनकी भाषा सीखकर सीधा सम्पर्क कायम करें तथा उसके साथ ही भारती के प्रसार का प्रयास करें, यही उचित होगा.

भारती के सशक्त बनाने के लिये आधारभूत आवश्यकता है कि हिन्दी भाषी क्षेत्र का आर्थिक विकास तीव्र गति से हो. भाषा की प्रतिष्ठा के लिये मात्र यह आवश्यक नहीं है कि वह भाषा कितने बड़ी संख्या में लोगों के द्वारा बोली जाती है. महत्वपूर्ण यह है कि भाषियों की आर्थिक स्थिति क्या है? आर्थिक विकास के लिये राजनीति तथा प्रशासन को इस दिशा में प्रवृत्त करने की आवश्यकता है. प्रवृत्त करने से अभिप्राय है कि राजनीतिक तथा मेजतंत्री स्वयं को आर्थिक विकास को बाधित करने से रोकें.

उपर्युक्त तथ्य तो मूलभूत है लेकिन जो विषय प्राथमिक तथा ज्वलंत है, वह इस क्षेत्र में शिक्षा की खासकर उच्च शिक्षा की त्रासद स्थिति है. आज इस क्षेत्र में निम्न स्तरीय राजनीति के कारण शिक्षा व्यवस्था पतन के गर्त में है. इस क्षेत्र में शिक्षा का विश्वस्तरीय उन्नयन भारती के विकास में भी सहायक होगा. भाषा के उपादेयता तथा प्रतिष्ठा के लिये नितांत आवश्यक शर्त है कि किसी भाषा में किस तरह का ज्ञान सृजित, किस तरह का ज्ञान संग्रहित तथा किस तरह का ज्ञान प्रसारित हो रहा है? ऊपर जैसा कि लिखा गया है कि हर विश्वविद्यालय को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने यहाँ शोध, अध्यापन तथा प्रशासन के लिये आवश्यकतानुसार अपनी इच्छा से माध्यम का चयन करे लेकिन साथ ही जरूरी है कि प्रत्येक हिन्दी भाषी राज्य में कम से कम एक उत्कृष्ट विश्वविद्यालय ऐसा जरूर हो जहॉ ज्ञान के हर विधा का स्थान हो तथा वहाँ अध्यापन तथा शोध की आधार भाषा मात्र हिन्दी हो. इस तरह के विद्यापीठ हिन्दी में ज्ञान के उद्‌गम स्थल होंगे.

हिन्दी भाषा में साहित्य तथा ज्ञान-विज्ञान में लेखन को हर स्तर पर प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है. इसके लिये भरपूर संख्या में पुरस्कारों, अनुदानों, कार्यक्रमों तथा परियोजनाओं की व्यवस्था स्थानीय, प्रांतीय, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर होनी चाहिये. विश्व के प्रत्येक देश, बड़े शहरों तथा अधिक से अधिक शिक्षण संस्थानों में हिन्दी के/में अध्यापन तथा शोध की व्यवस्था होनी चाहिये. खासकर अहिन्दीभाषी क्षेत्रों में तथा विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार को अभियान के तहत चलाना चाहिए.

लेखन की मात्रा तथा गुणवत्ता में विस्तार के साथ ही हिन्दी पढ़ने वाले की संख्या तथा पढ़ने वालों के लिये ज्यादा पढ़ने हेतु सुविधाएँ तथा अवसरों को बढ़ाने की आवश्यकता है. इसके लिये सर्वप्रथम आवश्यक है कि हिन्दी भूभाग से निरक्षरता को अविलम्ब मिटाया जाए तथा हिन्दी में प्रकाशन को प्रोत्साहित किया जाय। हिन्दी के पुस्तकों के प्रकाशन पर तथा उस प्रक्रिया में प्रयुक्त हर सामग्री तथा चल-अचल सम्पत्ति कर मुक्त हो तथा यथासम्भव सब्सिडी भी हिन्दी प्रकाशन उद्योग को मिले. भारत तथा समस्त विश्व के कोने-कोने में जितना ज्यादा सम्भव हो हिन्दी पुस्तकालयों की स्थापना की जानी चाहिये. इसके अलावा ऐसे प्रतियोगिताओं का आयोजन हो जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग हिन्दी पढ़ने तथा हिन्दी में पढ़ने को प्रेरित हों. 

हिन्दी भाषी राज्यों के प्रशासन की भाषा हिन्दी मात्र होनी चाहिए. विदेशी आगतों, पर्योटकों तथा निवेशकों से संवाद के लिये दुभाषिये रखे जा सकते हैं. राजकीय सेवाओं में भर्ती के लिये हिन्दी का यथेष्ठ ज्ञान अनिवार्य अर्हता होनी चाहिये. यहॉ यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार की प्राथमिक भूमिका हिन्दी भाषी राज्यों की है न कि केंद्र सरकार की.

उपर्युक्त त्वरित सुझाव तो मूलभूत हैं लेकिन आवश्यकता इस विषय पर घोर चिंतन तथा शोध की है जिससे हिन्दी को विश्वभाषा के रूप में स्थापित किया जा सके. जहॉ तक इस मुद्दे को लेकर व्यय की बात है, जैसा कि ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि भारती का प्रसार मात्र भावनात्मक प्रश्न नहीं है; इसका महत्व आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा अंतर्राष्ट्रीय है. अतएव इसके प्रचार पर खर्च को निवेश तथा सामाजिक कल्याण के तहत अनिवार्य मानना चाहिए.

- नीरज कुमार झा 

(मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका रचना के मई- अगस्त २००६ अंक में प्रकाशित मेरे आलेख का अंश)

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

भारती का भविष्य (भाग १०)

उन्नति का मार्ग

हिन्दी को सशक्त बनाने का उत्तरदायित्व हर हिन्दी भाषी का है. यह उसके लिये मात्र भावनात्मक प्रश्न नहीं है। इससे उसका आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक हित जुड़ा है. साथ ही यह भी समझने की आवश्यकता है कि अँगरेज़ी भाषा का वह कितना गहन अध्ययन  करे, कितना भी  इसका अभ्यास करे, चूँकि  यह एक विदेशी भाषा है और विदेशी संस्कृति की अभिव्यक्ति है, वह इस भाषा में उस स्तर का प्रावीण्य प्राप्त नहीं कर सकता है जो देशज भाषा में उसे सहज प्राप्त होता है. अँगरेज़ी भाषाइयों में उसकी पहचान तो एक शरणार्थी की ही रहेगी चाहे वह कुछ भी कर ले। यदि वह अँगरेज़ी में प्राकृतिक प्रवीणता हासिल कर भी लेता है तो वह ऐसा अपनी संस्कृति से बिलगाव की कीमत पर करता है। अतः प्रत्येक हिन्दी भाषी  स्वयं तथा हर तरह तथा हर स्तर के संगठन, जिसपर उसका प्रभाव है, में प्रयास करे कि हिन्दी के प्रभाव में वृद्धि हो। ऐसी स्थिति में ही सरकारी प्रयासों में भी गम्भीरता तथा ईमानदारी दिखने की सम्भावना है।
- नीरज कुमार झा 

(मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका रचना के मई- अगस्त २००६ अंक में प्रकाशित मेरे आलेख का अंश)

रविवार, 5 दिसंबर 2010

भारती का भविष्य (भाग ९)

उन्नति के आधार

हिन्दी निश्चित रूप से पराभव की स्थिति में है लेकिन इसके उदय के प्रबल आधार उपस्थित हैं। आवश्यकता इच्छा शक्ति को जाग्रत करने तथा सक्रिय होने की है। हिन्दी चीनी भाषा के बाद दुनियाँ की दूसरी सबसे ज़्यादा बोले जाने वाली देशज भाषा है। देशज भाषा के रूप में अँगरेजी  तीसरे स्थान पर है तथा स्पेनी भाषियों की संख्या उनसे ज्यादा पीछे नहीं है। विदेशों में फैले दो करोड़ से ऊपर अप्रवासी भारतीय तथा भारतीय मूल के लोग इस भाषा के विस्तार के सक्षम संवाहक हो सकते हैं। हिन्दी चलचित्र उद्योग विश्व में हालीवुड के बाद दूसरा स्थान रखता है। आज भी देश में अंग्रेजी अखबारों से बहुत ज्यादा पाठक संख्या हिन्दी अखबारों की है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी हिन्दी चैनल ही सबसे ज्यादा देखे जाते हैं। ये प्रमाण हिन्दी के सबल आधार की ओर इंगित करते हैं। यह आधार वास्तव में पिछड़े  क्षेत्र के विपन्न जन हैं। उनके सम्मान तथा समृद्धि के लिये भी आवश्यक है कि हिन्दी का विकास हो। हिन्दी में अभी काफी संभावनाएँ मौजूद  हैं लेकिन यह भाषा आज इस स्थिति में नहीं है कि यह अपने बल पर विश्व भाषा बन सके। इसके लिये विशेष प्रयासों की आवश्यकता है। इसके लिये विशेष निवेश की आवश्यकता है। ऐसा भी नहीं है कि  वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास के लिये हिन्दी पर जोर अवरोधक हो। दुनियॉ के अनेक देशों ने स्वदेशी भाषा के माध्यम से ही ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में स्वतंत्र प्रगति की है तथा इन क्षेत्रों में उनकी उपलब्धियॉ आंग्ल भाषी देशों से किसी भी तरह से कमतर नहीं है। जर्मनी, जापान तथा रूस सहित अनेक यूरोपीय देश इसके उदाहरण हैं।
- नीरज कुमार झा
(मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका रचना के मई- अगस्त २००६ अंक में प्रकाशित मेरे आलेख का अंश

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

भारती का भविष्य (भाग ८)


दूसरा पहलू जो समाज विज्ञानों से ही संबंध रखता है वह है  मानव अधिकारों की उपलब्धता का। हिन्दी भाषियों के जीवन स्तर को सुधारने के लिये मानव अधिकारों की सुनिश्चितता भी आवश्यक है। यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा निर्धारित मानवाधिकार आर्थिक विकास, सांस्कृतिक उन्नति तथा जनतंत्र के सबलीकरण के आधार हैं। भारतीय जनतंत्र के शरीर को सबल तथा स्वस्थ बनाने के लिये अधिकारों की उपलब्धता के व्यापक विस्तार की आवश्यकता है। सत्ता इस दिशा में मंथर गति से चलती है और वह भी पीछे से धकेलने पर। वास्तव में सत्तासीनों के अपने हित होते हैं जो जनता के हितों से सामान्यतः विपरीत ही होते हैं। आवश्यकता होती है जनजागृति की। सजग जन अपने अधिकारों को माँगे  तथा हासिल करें, यही मार्ग है सशक्तीकरण का - व्यक्तियों तथा समाज का। इसके लिये भी आवश्यक है भाषा के उपादेयता के विस्तार की। मानव अधिकार आन्दोलन तब तक सफल नहीं होगा, जब तक इस विषय के साहित्य, शोध तथा सिद्धांत जनता के बीच उनकी भाषा में प्रस्तुत नहीं किये जाते हैं।



इस तरह से भाषा का महत्व भावनात्मक के अलावा सांस्कृतिक, आर्थिक या राजनीतिक भी है। इन तथ्यों पर विचार के उपरांत भाषा का महत्व राष्ट्रशक्ति के एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में भी विचारणीय है। इस दृष्टिकोण से भाषा का महत्व अंतर्राष्ट्रीय है। आज राष्ट्रशक्ति में मृदु शक्ति की महत्ता बढ़  रही है। सैन्य तथा अर्थ बल के अलावा शिक्षा, संस्कृति, कला, साहित्य, दर्शन तथा राजनीतिक व्यवस्था  की प्रतिष्ठा भी राष्ट्रशक्ति के प्रमुख तत्वों में गण्य हैं। शक्ति के ऐसे तत्व मृदुशक्ति के रूप में जाने जाते हैं।  ऐसे में भाषा की प्रतिष्ठा भी राष्ट्रशक्ति का प्रमुख तत्व हो सकता है। फ्रांस, जर्मनी तथा रूस की शक्ति तथा प्रतिष्ठा का एक अवयव उनकी भाषाएँ भी हैं। अँगरेज़ी आंग्लभाषी देशों की शक्ति को परिलक्षित ही नहीं वरन्‌ पुष्ट भी करती है। राष्ट्रशक्ति के विस्तार के लिये भी राष्ट्रभाषा का अंतर्राष्ट्रीय जगत में सम्मान भी महत्वपूर्ण है।

जहॉ तक तार्किकता की बात है भाषा का उस दृष्टिकोण से तो महत्व  है ही लेकिन इसका सीधा संबंध भावना से है। भाषा राष्ट्रीयता, संस्कृति तथा संस्कारों के केंद्र में है। वास्तव में भावना का अपना तर्क है, जो तर्कों  में सर्वोपरि है। सवाल यह उठता है कि क्या पराश्रित उन्नति सच्ची उन्नति है? क्या सम्पन्नता अस्मिता के मूल्य पर अभीष्ट है? क्या सांस्कृतिक स्वायत्तता खोकर राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ रह जाता है? ऐसे बहुत सारे  मुद्दे हैं जहॉ भावना ही अंतिम तर्क है। इस मुद्दे पर तर्कों का मूल यही है कि भाषा का प्रश्न सभी तर्कों से परे है।

- नीरज कुमार झा
(मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका रचना के मई- अगस्त २००६ अंक में प्रकाशित मेरे आलेख का अंश

भारती का भविष्य (भाग ७)

हिन्दी भाषियों के आर्थिक विकास से हिन्दी का विकास तथा हिन्दी के विकास से उनका आर्थिक विकास तो जुड़ा है ही लेकिन भाषा का प्रश्न जीवन के अन्य क्षेत्रों से भी असम्पृक्त नहीं है। इसका स्पष्ट संबंध राजनीति की प्रकृति में सुधार तथा संस्कृति के परिष्कार से है। भारत के हिन्दी क्षेत्र का पराभव प्रधानतया इस क्षेत्र की निम्न स्तरीय राजनीति के कारण है। हिन्दी भाषी क्षेत्र में स्वस्थ तथा गतिशील सामाजिक व्यवस्था के लिये आवश्यक है कि समाज विज्ञानों में उपलब्ध ज्ञान जनता तक प्रेषित हो, जो हो नहीं रहा है। कारण है वही कि भारती साहित्य की भाषा तो है लेकिन समाज विज्ञानों की नहीं। समाज संबंधी चिंतन तथा स्थापनाएँ  अभी भी भारत में आयातित ही हैं; उनमें मौलिकता का अभाव है। वे लोक जीवन से जुड़े नहीं हैं यदि जुड़े भी हैं तो समाजविज्ञान भारतीय परिदृश्य में हाशिये पर हैं। कारण है कि समाज विज्ञानियों ने अँगरेज़ी भाषा  को अपने अध्ययन, शोध तथा ज्ञान विस्तार का माध्यम बना रखा है जिस कारण से वे आम जनता तक पहुँच नहीं पाते हैं। सामाजिक चिंतन तथा ज्ञान जनतांत्रिक आधार के अभाव में प्रभावहीन रह जाते हैं। दूसरी तरफ जनता उच्चतर चेतना के अभाव में पिछड़ी तथा दमित रह जाती है। दूसरे शब्दों में ज्ञान जनसमर्थन के अभाव में प्रभावहीन रहता है तथा जन ज्ञान के अभाव में निःशक्त। साहित्य की बात लें तो हिन्दी साहित्य की स्थिति की समस्या गुणवत्ता की कम तथा प्रसार की ज्यादा है। प्रसार सामान्य जन में निरक्षरता, अशिक्षा, निर्धनता तथा निम्न जीवन स्तर के कारण बाधित है। प्रसार के अभाव में अच्छा साहित्य पनप भी नहीं पाता है। लोकग्राह्यता के अभाव के कारण प्रकाशक सरकारी खरीदी पर निर्भर करते हैं जिसके कारण साहित्य का प्रसार नहीं वरन्‌ भ्रष्टाचार का विस्तार होता है तथा लेखक प्रकाशक का मुहताज रहता है। ऐसे कुंठित साहित्यकारों से क्या उम्मीद की जा सकती है? साहित्य है क्योंकि इतनी बड़ी  आबादी से सृजन का विलोप हो ही नहीं सकता है। फ़िर भी समाज विज्ञानियों की अपेक्षा हिन्दी साहित्यकारों की  समाज में ज़्यादा  प्रतिष्ठा तथा प्रभाव है क्योंकि वे ज़्यादा लोगों के लिये सुलभ हैं।

- नीरज कुमार झा
(मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका रचना के मई- अगस्त २००६ अंक में प्रकाशित मेरे आलेख का अंश

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

भारती का भविष्य (भाग ३)

उदारवादी  वैश्वीकरण के अंतर्गत भारतीय संस्कृति के अस्मिता को लेकर खतरों को रेखांकित करने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि उदारवाद या वैश्वीकरण भारत या भारतीय संस्कृति के  लिये अहितकर हैं. वास्तव में  भारतीय संस्कृति के अवमूल्यन का कारण आज़ादी के बाद उदारवाद से विमुख होना था. स्वतंत्रता के पश्चात भारत में मेजतंत्रीय समाजवाद को अर्थनीति का आधार बनाया गया. आशा के विपरीत लेकिन इस व्यवस्था  के अनुरूप  इसके अंतर्गत विकास की गति अत्यंत शिथिल रही. इस काल में न सिर्फ भारतीयों की उद्यमिता  दमित रही बल्कि उनकी सर्जनात्मक  क्षमताओं का भी क्षरण हुआ. यह भारतीय इतिहास का सबसे विभ्रमकारी  युग था  जिसमें निहित  स्वार्थों के द्वारा अनधीनता  के नाम पर दासता, विकास के नाम पर विपन्नता और ज्ञान के नाम पर प्रचार परोसा गया. हालांकि इस व्यवस्था की कमजोरियों ने ही भारत  में उदारवाद  का मार्ग प्रशस्त किया लेकिन आज भी उदारवाद भारत के  मध्यवर्ग में एक घृणित शब्द है, खासकर भाषा तथा साहित्य के पुरोधाओं  के मध्य. उदारवाद अपनी असीमित क्षमता के आधार  पर भारतीयों के मध्य सम्बल बन उपस्थित है और इसके लाभ बेहतर  विकास दर और घटती गरीबी के रूप में स्पष्ट हैं. फ़िर भी उदारवाद  को कम ही सराहा जाता  है. इसमें निश्चित रूप  से निहित स्वार्थों की भूमिका है लेकिन ज़्यादा बड़ा कारण शिक्षा के नाम पर प्रचार के शिकार लोगों की मानसिकता  का है. आर्थिक विकास के द्वारा ही भाषा, तथा संस्कृति भी, सुरक्षित रखी  जा सकती  है. विपन्नता  की स्थिति में संस्कृति कभी भी फल-फूल नहीं सकती  है. उदारवाद तथा वैश्वीकरण भारत को अवसर प्रदान कर रहा है कि भारत अपनी काबिलियत विश्व में साबित करे. कई भारतीय उद्यमी ऐसा कर भी रहे हैं. आवश्यकता उन अवसरों के विस्तार की है जिससे जन-जन में छिपी उद्यमिता तथा सृजनात्मक क्षमताएँ  विकसित हो सके. जरूरत  है भारत को विश्व पूँजी व्यवस्था में अपनी उचित  स्थान बनाने की ताकि अन्य देशों के लोग भारती सीखकर गर्वान्वित हों और भारतीयों की सेवा में रत हों जैसाकि आज भारतीय अन्य लोगों के लिये कर रहे हैं.

नीरज कुमार झा
(मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका रचना के  मईअगस्त २००६ अंक  में प्रकाशित मेरे आलेख का अंश

बुधवार, 3 नवंबर 2010

भारती का भविष्य (भाग २)

उदारवादी वैश्वीकरण के इस दौर में इस वैश्विक संस्कृति का निरंतर विस्तार हो रहा है. वैश्वीकरण के आर्थिक प्रभावों को लेकर मतभेद हो सकता है लेकिन विभिन्न संस्कृतियों पर इसके विघटनात्मक तथा विलयनकारी  प्रभावों को नकारना असम्भव है. भारत की संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति के  प्रभावों के नकारात्मक तथा सकारात्मक दोनों ही पहलू हैं लेकिन जो चिंता का कारण है वह भारत की धूमिल हो रही सांस्कृतिक अस्मिता है. भारत का आभिजात्य वर्ग विदेशी संस्कृति को तेजी से अपना रहा है तथा उनके सांस्कृतिक  आदर्शों में पाश्चात्य सांस्कृतिक मूल्य शुमार हो रहे हैं. प्रवृत्ति भारतीयता में संशोधन या सुधार की नहीं है बल्कि पश्चिमी मूल्यों का अंधानुकरण है. भारत में  पुनर्जागरण काल में भी पश्चिमी मूल्यों से प्रेरणा ली गयी थी लेकिन भारतीय मूल्यों को नकार कर नहीं. यहाँ जो विषय विचारणीय है वह  संस्कृति से जुड़ा  सबसे बड़ा और पहला मुद्दा है. यह मुद्दा भाषा का है. भाषा किसी भी सभ्यता या समाज की संस्कृति की  वाहिका हो्ती है. आज इस वैश्वीकराण के दौर में विश्व की अन्य भाषाओं के साथ भारती का भी भविष्य शोचनीय है. इस एकीकृत विश्व की भाषा अँगरेजी है. यह अंतरराष्टीय वाणिज्य की भाषा है, विश्व पूँजी की भाषा है. यह विश्व को नियंत्रित करने वाली राजनीति की भाषा है. उदारवादी  वैश्वीकरण के इस दौर  में अँगरेज़ी भाषाई एवं सांस्कृतिक ब्रह्मांड  का अंधगह्वर (ब्लैक होल) बन चुका है जिसके विनाशक आकर्षण का प्रभाव विश्व की तमाम भाषाओं एवं संस्कृतियों पर स्पष्ट अनुभव किया जा सकता  है. इसका प्रमाण अँगरेजी का निरंतर विस्तार एवं तेजी से विलुप्त  हो्ती विश्व की कमज़ोर और  छोटी भाषाएँ हैं. दुनियाँ में आज जहाँ सौ करोड़  से ज़्यादा लोग द्वितीयक भाषा के रूप में अँगरेज़ी का उपयोग कर रहे हैं वहीं बड़ी संख्या में भाषाएँ निरंतर विलुप्त हो रही हैं. कालांतर में विश्व की अनेक महत्वपूर्ण भाषाएँ, और संस्कृतियाँ भी, बिना किसी निशान, धरोहर या उत्तराधिकार के अँगरेज़ी के इस अंधगह्वर में विलीन हो जायेंगी. भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी के भविष्य की ऐसी सम्भावना भी त्रासद है हालांकि भारती  जैसी बहुभाषी भाषा के लिये इस तरह का विलुप्तीकरण तो प्राय: सम्भव नहीं है लेकिन इसके पतन के लक्षण स्पष्ट हैं. वास्तव में भारती का वर्तमान भी कम चिंताजनक स्थिति में नहीं है. हिंग्लिश का आंग्ल भाषा का सर्वाधिक भाषी स्वरूप होने की दिशा में बढ़ना भारती का अँगरेज़ी में विलयन की प्रकिया का लक्षण हो सकता है. आज विश्व में संयुक्त राज्य अमेरिका तथा ब्रिटेन के बाद सबसे ज़्यदा  अँगरेजी बोलने वाली आबादी भारत में रहती है.

- नीरज कुमार झा 
(मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका रचना के  मई- अगस्त २००६ अंक  में प्रकाशित मेरे आलेख का अंश

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

भारती का भविष्य (भाग १)


भारती से यहॉ आशय हिन्दी भाषा से है। इस भाषा को व्यापक बनाने तथा राष्ट्रीय स्तर पर इसकी स्वीकार्यता को बढ़ाने के लिये भारती नाम का प्रयोग ही उपयुक्त प्रतीत होता है। इससे स्पष्ट सन्देश जाता है कि भारती भारत की भाषा है। हिन्दी नाम से कुछ लोग भ्रमित हो जाते हैं। ऐसे लोग इस भाषा को धार्मिक मतावलम्बन या क्षेत्रीयता के संदर्भ में देखते है । भारती नाम ऐसे निराधार धारणाओं को दूर करने में सहायक हो सकता है। इस नाम से इसके व्यापकीकरण तथा इसे भारत के सम्पर्क भाषा के रूप में प्रभावी तौर से स्थापित करने में भी काफी सहायता मिल सकती है । गॉधीजी समेत अनेक नेताओं ने अपेक्षा की थी कि हिन्दी अन्य भारतीय भाषाओं की अभिव्यक्तियों को अंगीकार कर समग्र भारत में बोधगम्य होगी तथा यह भारत की राजभाषा मात्र न रहकर भारत की एकता तथा राष्ट्रीयता की भाषा हो सकेगी। भारती नाम इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये भी सकारात्मक होगा। वैसे भी, संस्कृत, जो विश्व की महानतम तथा ऐतिहासिक भाषाओं में से एक है, के मूल की अग्रणी भाषा हिन्दी, जो भारतीय राष्ट्रवाद की आकांक्षाओं का भी प्रतीक है, के लिये प्रयुक्त संज्ञा तत्सम/देशज ही होनी चाहिए। इन तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में इस आलेख में, जिसमें इस भाषा के वर्तमान के अधार पर इसके भविष्य को लेकर कुछेक अप्रिय सम्भानाओं पर चिंताएँ प्रगट की गयी हैं तथा उन चिंताओं के निवारण हेतु कुछेक विचार भी प्रस्तावित किये गये हैं, हिन्दी के लिये भारती शब्द का ही प्रयोग यथासम्भव किया गया है।

भाषा की स्थिति का समकालीन सन्दर्भ

विश्व पटल पर भारत की प्रभावशाली पहचान है तथा भारत का उज्ज्वल भविष्य, सम्पन्न तथा शक्तिशाली देश के रूप में, स्वप्न नहीं वरन् उपलब्धनीय सत्य प्रतीत हो रहा है। लेकिन इस सत्य का भयावह नकारात्मक पहलू भी है। इस सत्य का मूल्य सम्भवतः भारत की अस्मिता है तथा निश्चित रूप से इसकी अस्मिता की प्रतिष्ठा है। पूरे विश्व को एक समष्टि के रूप में लें तो इसकी अपनी आर्थिक व राजनीतिक संरचनाएँ हैं जो अपने निर्माणकों से काफी हद तक स्वतंत्र हैं। लेकिन इसकी संस्कृति सर्वाधिक शक्तिशाली सदस्यों की संस्कृति से ज्यादा भिन्न नहीं है। ऐसा होना स्वाभविक है। हालॉकि भारत इस संस्कृति एवं व्यवस्था का अंग है लेकिन उसमें इसकी हिस्सेदारी मामूली है। भारत इस व्यवस्था का हिस्सा बनता जा रहा है तथा वैश्विक संस्कृति पर इसके प्रभाव का भी अनुभव किया जा सकता है लेकिन वह प्रभाव गौण है। भारत इस व्यवस्था में समाहित होने का प्रयास कर रहा है लेकिन वह इसका निर्माणक नहीं है। 

विश्व व्यवस्था में भारत का समकालीन उद्भव भी भ्रामक है। इसमें काफी हद तक विदेशी पूँजी का हाथ है, खासकर व्यवसाय प्रक्रिया बाह्यसाधन (बी.पी.ओ.) का जिसकी वजह से भारत विश्व पूँजीव्यवस्था का फ्श्च-कार्यालय बनने का स्वप्न देख रहा है। वास्तव में भारत भूमि विश्व पूँजी व्यवस्था की कार्य-स्थली बन रही है जिसमें भारतीय अभ्यर्थी, श्रमिक, क्षुद्रसेवी, लिपिक तथा आश्रित उपोद्यमियों की भूमिका निभाने जा रहे हैं। भारत की अति दरिद्रता के परिप्रेक्ष्य में इस तरह की उन्नति भी तोष का विषय हो सकता है लेकिन मान का नहीं । 

- नीरज कुमार झा 

(मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका रचना के मई- अगस्त २००६ अंक में प्रकाशित मेरे आलेख का अंश)

सोमवार, 5 जुलाई 2010

मायने खोती 'राजनीति'





  - नीरज कुमार झा 


महानगरों में 'गेटेड  कम्युनिटीज'  (फाटकबंद  बिरदारियाँ) का चलन बढ़ रहा है. उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग के लोग चारदीवारी के अंदर बनी कालोनियों  में रहते हैं जिनके गेट पर तैनात पहरेदार अनावश्यक लोगों को घुसने नहीं देते हैं और घुसने वालों की पूछ-ताछ और उनकी जानकारियों को रजिस्टर करते हैं. ये फाटकबंद बिरादरियाँ मध्य वर्ग की बढ़ती असुरक्षा और नागरिक मुद्दों से उनके अलगाव के परिणामस्वरूप बढ़ती ही जा रही है. यह चलन यह भी बताता है कि मध्यवर्ग को राजनीति से कोई उम्मीद नहीं रह गयी है और वह इस तरह के द्वीपों में वृहत्तर समाज से अलग होकर सुकून ढूढ़ता है. 'राजनीति' सरीखी फ़िल्में राजनीति को लेकर उनकी नकारात्मक धारणा को मजबूत करती है, उनके भय को बढ़ाती है और पलायनवादी प्रवृत्ति को पुष्ट करती है. फाटकबंद ये बिरादरियां भूल जाती हैं कि यदि वे राजनीति के प्रति ऐसे ही उदासीन बने रहे तो ये चारदीवारें और फाटक उनके किसी काम नहीं आयेंगे. ऐसा हो भी रहा है. इन बिरादरियों में ही अपराधी तत्व सक्रिय हैं और अपने कारनामों को अंजाम भी दे रहे हैं.  

(बी पी एन टुडे, वर्ष २ अंक १०, जुलाई २०१० में प्रकाशित मेरे आलेख "मायने खोती 'राजनीति' "  का एक अंश) 

रविवार, 6 जून 2010

अधिकार और अधिनियम

नीरज कुमार झा


जनतंत्र शासनतंत्र में खुलेपन का भी पर्याय है जो भारत में अभी भी दूर की कौड़ी लगती है. देश में शासनतंत्र और नौकरशाही के औपनिवेशिक स्वरूप में परिवर्तन लाने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है. सूचना का अधिकार जनता के हाथों में एक ताक़तवर हथियार तो है, लेकिन वह लगभग वैसा ही है कि घर में नल का पानी बह रहा हो और उसको बंद किए बिना झाडू से पानी हटाने का प्रयास किया जाए. ... जरूरत शासन को सहज, सुगम और मैत्रीपूर्ण बनाने की है, जिससे लोग समस्त सरकारी सेवाओं का लाभ बिना परेशानी के सद्भावपूर्ण माहौल में प्राप्त कर सकें. ऐसे में सूचना के अधिकार की आवश्यकता ही नहीं होगी. वास्तव में हमारी समस्या अतिशासन की है. जरूरत इसके कार्यों को सीमित और मनमाफिक फैसले लेने की ताक़त को कम करने की है. 
...... 

गौर करने की बात है कि अधिनियमों का आधिक्य देश और समाज की कमजोरियों का प्रतिबिम्बन होता है. एक नया अधिनियम प्रायः हमारी उपलब्धि नहीं बल्कि विफलता का परिणाम होता है. निकट भविष्य में ही पीने के पानी का अधिकार, स्वच्छ हवा का अधिकार और अधिकारों को प्राप्त करने का अधिकार जैसे अधिनियम पारित होंगे. ये अधिनियम वास्तव में हमारे सार्वजनिक जीवन के विषयों के प्रबंधन में विफलता के कारण अस्तित्व में आएंगे.

"अधिकार और अधिनियम," बी पी एन टुडे, वर्ष २, अंक ८,  मई २०१०, पृष्ट १४-१५ से उद्धृत 

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

सेना में शुचिता

नीरज कुमार झा 

     सेना देश की पहचान, सम्मान तथा सुरक्षा की अंतिम गारंटी है | सेना वह कवच है  जिसके अन्दर देश का अस्तित्व सुरक्षित रहता है | आज देश के सामने गंभीर खतरे  मंडरा रहे हैं | उत्तर में चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी ताक़त के रूप में शुमार हो चुका है | यह भारत के बड़े भूभाग पर काबिज़ है और अन्य हिस्सों पर बिलकुल नाजायज़ दावे कर रहा है | चीन के द्वारा भारतीय सीमा के अन्दर बराबर घुसपैठ तथा बाहर से लगातार पुख्ता की जा रही घेराबंदी भारत के लिये गंभीर संकट  है | पाकिस्तान ने तो सीधी लड़ाई में भारत को पराजित तथा छद्म युद्ध के द्वारा भारत को कमजोर करने को अपना राष्ट्रीय ध्येय  बनाया  हुआ है | भारत पश्चिम के इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर भी है |  दूसरी तरफ अमेरिका तथा उसके सहयोगी देश भी सापेक्षिक रूप से अपनी  घटती ताक़त और असर को बनाये रखने के लिये जद्दोजेहद को तेज करेंगे | इसका  खामियाजा भारत को भुगतना पड़ सकता है | भारत भी एक महत्वपूर्ण वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थान बना चुका है | एक वैश्विक शक्ति के रूप में अपने वृहत्तर हितों की रक्षा के अतिरिक्त भारत को अनेक  वैश्विक दायित्वों को भी निभाना पड़ेगा | ऐसे में भारत की प्राथमिकता स्वयं को प्रथम श्रेणी की अत्याधुनिक सैन्य  शक्ति बनाने की होनी चाहिए |  इसके लिये यह भी जरूरी है कि भारत न मात्र हथियारों तथा उपकरणों के क्षेत्र में स्वावलमबी बने बल्कि  युद्धास्त्र के वैश्विक बाजार में विक्रेता के रूप में भागीदार बने | रक्षा मंत्री ए के एंटोनी ने भी इस तरह के विचार व्यक्त किया है और  इस दिशा में प्रयास भी  दिख रहे हैं  लेकिन उन प्रयासों में वह ऊर्जा नहीं है जो महाशक्ति की दावेदारी की  जरूरत के हिसाब से हो |  यूरोप के छोटे-छोटे देश वैश्विक आयुध बाजार में दबदबा रखते हैं तो भारत क्यों नहीं इस बाजार में प्रवेश पा सकता है ?  यह भारत के निजी उद्यम की  भागीदारी से संभव है | भारत के उद्योगपति  विश्व के बेहतरीन  उद्योगपतियों में हैं और वे सैन्य साजोसामान के उत्पादन में भी भारत को शीर्ष पर ले जा सकते हैं |  यह समय है कि सेना को लेकर देश में नवीन  चिंतन हो, दर्शन  पनपे तथा ऐसी प्रणालियाँ एवं व्यवस्थाएं निर्मित हों जिनसे सेना की कार्यप्रणाली, व्यापक रणनीति तथा वैश्विक सामरिक परिस्थितियों, खासकर विकसित हो रही प्रौद्योगीकियों के अनुरूप आवश्यक परिवर्तन की समय-समय पर समुचित पड़ताल हो सके | संकट के समय किसी कमी की  जानकारी का क्या लाभ? फ़िर भी अंत में पूर्ण सहमति के साथ रक्षा मंत्री के  इस वक्तव्य को दोहराना समीचीन है कि हमारे जवान और अफसर अपना जीवन, रक्त और स्वास्थ्य का अपनी जमीन के प्रत्येक इंच तथा सीमा की रक्षा में बलिदान कर रहे हैं| हम उन्हें सलाम करें और उनके सम्मान को अक्षुण रखा जाये|

नीरज कुमार झा, "सेना में शुचिता," बी पी एन टुडे, २/६, मार्च २०१०, पृ. २३/२२-२३. 

रविवार, 1 नवंबर 2009

तिलिस्म विज्ञापन का

विज्ञापन का तिलिस्म शिशुओं की मासूमियत को, स्त्रियों की गरिमा को, युवाओं की ऊर्जा को लीले जा रहा है. सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जनतंत्र की तरह पूंजीवाद या उदारवाद का भी कोई विकल्प नहीं है. पूंजीवाद का इलाज राजकीय नियंत्रण भी नहीं है, जैसा कि सरकार के तथा उससे जुड़े लोग पैरोकारी करते हैं. वे प्राधिकारवाद के बेईमान पैरोकार हैं. इसका उपचार सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक है.

यह उपचार आवश्यकताओं को सीमित करना है. भारतीय परंपरा में उपवास, त्याग तथा दान की परंपरा है. भारतीय दर्शन किसी तरह की आसक्ति का भी निषेध करता है. ऐसा नहीं है कि भारतीय परम्परा में काम या अर्थ उपेक्षित है, लेकिन वे धर्म की मर्यादा से बंधे हैं. 

आधुनिक युग में जनतंत्र तथा पूंजीवाद को आध्यात्मिक स्वरूप देने का सिद्धांत गांधी जी ने न सिर्फ़ भली-भांति प्रतिपादित किया है बल्कि व्यवहार में लागू कर दिखाया है. पूंजीवाद आजकल कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी की बातें कर रहा है. इस तरह की समझ को भारत की सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक परम्पराओं से जोड़ने की है. 

(नीरज कुमार झा, " तिलिस्म विज्ञापन का ," बी पी एन टुडे, ग्वालियर, १२/१, १६ सितम्बर २००९, पृ. १३/११-१३.)

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

उत्तर से अतिक्रमण

    भारत-चीन सीमा पर असामान्य सी भले ही कोई स्थिति नहीं हो क्योंकि चीन की घुसपैठ को आम बात मानी जा रही है, लेकिन यह तय है कि चीन भारत-चीन सीमा रेखा मैकमहन लाइन को नहीं मानता है, अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताता है, अकसाई चीन पर कब्जा किये बैठा है, भारत की चारो तरफ से घेराबंदी कर रहा है, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता की भारत की दावेदारी का विरोध करता है और भारत को औकात बताने का कोई मौका नहीं छोड़ता है. ... यहाँ मुद्दा यह नहीं है कि भारत की तात्कालिक रूप से चीन से कोई गंभीर खतरा है, बल्कि बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत चीन की  बढ़ती ताक़त तथा उसकी वर्चस्ववादी नीतियों के प्रतिकार की क्षमता विकसित करने के लिए सजग है? क्या भारत चीन के द्वारा प्रस्तुत आर्थिक प्रतियोगिता का सामना करने के लिए तैयार है? यह सही है कि भारत चीन के बाद विश्व की सर्वाधिक बढ़ने वाली  अर्थव्यवस्था है लेकिन जब मुक़ाबला आमने-सामने का हो तो नंबर दो होना कोई मायने नहीं रखता है. ...
     सबल सुरक्षा व्यवस्था के लिये अर्थव्यवस्था की मजबूती आधारभूत है और मज़बूत अर्थव्यवस्था के लिये ज़रूरी है स्वच्छ, समर्पित, सुलझी, सक्रिय तथा लक्ष्योंमुखी शासन प्रणाली. चूंकि जनतंत्र जनस्वामित्व पर आधारित शासन प्रणाली है, इसलिए शिक्षा का मह्त्व निर्णायक है. शिक्षा की गुणवत्ता मानव संसाधन के दृष्टिकोण से ही नहीं बल्कि नेतृत्व तथा प्रशासन की निष्ठा तथा क्षमता, सभ्य नागरिकता और संस्कृति के परिष्कार के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है.
नीरज कुमार झा, "उत्तर से अतिक्रमण," बी पी एन टुडे, ग्वालियर,  १/२, १६ अक्टूबर २००९, पृ. ४३/४२-४४.