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मंगलवार, 17 जून 2025

धर्मो रक्षति रक्षितः

व्यक्ति के अधर्म का दुष्परिणाम उसके स्वयं के लिए तो होता ही है; उस परिवेश का भी होता है, जिसमें वह जीवनयापन करता है। दूषित परिवेश के दुष्परिणाम का वह स्वयं भी भागीदार होता है और उसके सगे-संबंधी भी। एक व्यक्ति का धर्मपालन सभी के हित में है और किसी का अधर्म सभी का अहित है। 

जीवन का ध्येय धर्म है और इसकी सफलता धर्मपालन की प्रवृत्ति और सामर्थ्य है।

धर्म अज्ञेय और ज्ञेय का पारिस्थितिकी की मर्यादा के साथ व्यक्ति की पूर्णता और सामुदायिक सावयवता हेतु समन्वय जनित बोध और तदनुरूप आचरण है।

नीरज कुमार झा

सोमवार, 17 जून 2024

ज्ञान, बुद्धि, कौशल, और चतुराई

ज्ञान, बुद्धि, और कौशल पृथक् विशिष्टताएँ हैं। यह बात अटपटी लग सकती है, लेकिन ज्ञानी व्यक्ति बुद्धिमान हो, जरूरी नहीं है, और कार्यकुशल हो, यह तो बिल्कुल जरूरी नहीं है। एक व्यक्ति का इन सभी गुणों से युक्त होना दुर्लभ है। एक व्यक्ति जो कार्यकरण में निष्णात है, हो सकता है कि ज्ञान से बिल्कुल रहित हो।

मेरे उक्त अभिव्यक्ति का उद्देश्य यह रेखांकित करना है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का आकलन संदर्भ के अनुसार ही होना चाहिए।

ज्ञानी व्यक्ति का बुद्धिमान नहीं होना एक व्यापक त्रासदी है। ऐसे व्यक्तियों के पास ज्ञान का विपुल भंडार होता है, लेकिन हो सकता है कि वह ज्ञान के ध्येय और प्रभाव से अनभिज्ञ हो। उसके द्वारा ज्ञान का सम्प्रेषण वास्तविकता से असंपृक्त अथवा लोकहित का प्रतिगामी हो सकता है।

ज्ञानी और मूर्ख में भेद कर पाना भी एक कठिन चुनौती है। लोग इसके लिए व्यक्ति को प्राप्त उपाधियों अथवा पद के आधार पर उसका मूल्यांकन करते हैं, जो प्रायः भ्रामक होता है।

ज्ञान का एक प्रबल पक्ष ज्ञानी व्यक्ति का सर्वहित की व्यवस्थागत विचारों से अवगत होने की स्थिति और उसके विस्तार करने की क्षमता है। मेरे विचार से ज्ञानी व्यक्ति की प्रकृति की विशिष्टता वैचारिक संवेदना है। यदि विद्वान कर्मणा भी सज्जन और जनहितैषी है, तो वही मेरे लिए महान है।

जनहितैषी विचारों में जन की प्रभुसत्ता रहे, विचारों की नहीं, यह भी जरूरी है। विचारों की आग पर लोगों का पकाया जाना ज्ञान और बुद्धि की विकृति है; और विडंबना यही है कि यही विद्वता का सर्वाधिक क्रियाशील स्वरूप है।

ज्ञान, बुद्धि, और कौशल, अथवा कौशल से युक्त होने मात्र से जीवन में सफलता मिले, यह तो लगभग एक संयोग ही है। इसके लिए एक अलग विशिष्टता की आवश्यकता पड़ती है, वह है चतुराई। यह बुद्धि का स्वहित में लक्ष्यबेधी संधान है। यह अन्य का स्रोतीकरण है। ऐसे जन स्वयं को स्वाभाविक रूप से साध्य और अन्य को साधन के रूप में प्रयोग करते हैं। उनके लिए ज्ञान भी स्वहित हेतु एक संसाधन मात्र है।

नीरज कुमार झा

रविवार, 13 अगस्त 2023

भाषाई विपन्नता का संकट

भाषाई विपन्नता सम्प्रेषण का बाधक ही नहीं, स्वतंत्रता का भी संकट है। बोध और अभिव्यक्ति की निपुणता का अभाव अधिकतर विवादों का कारण होता है। यह समस्या तथाकथित विद्वानों को लेकर भी भिन्न रूप में व्याप्त है। उनमें से अधिकतर ज्ञान के नाम पर किसी विशिष्ट विचारधारा में प्रशिक्षित होते हैं और उनका भाषाई संसार समृद्ध होने के पश्चात् भी एक विशाल व्यूह रचना ही होती है, जिसका प्रयोजन अन्य का पराजय और स्वयं का महिमामंडन होता है। इस व्यूह रचना का अंधपक्ष यह है कि इसके द्वारा निर्मित व्यवस्था पदसोपानात्मक होती है, जिसमें स्थित व्यक्तियों की परिलब्धियाँ वंचना से शुरू होकर विशेषाधिकार पर समाप्त होती है। वास्तव में भाषा की विपन्नता और इसका दोहन प्रभावरूप में समान परिघटनाएँ हैं ।

नीरज कुमार झा

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

प्रतीक्षा

उड़ेंगे  गुलाल ग्राम-ग्राम नगर-नगर
उस दिन 
जलेंगे साँझ दिए घी के  घर-घर 
उस दिन 
मुंह मीठा कराएंगे  एक-दूजे का जन-जन 
उस दिन 
सभी करेंगे शुभ-कर्म अनेक 
उस दिन 
नवयुग का होगा आरंभ   
उस दिन 
सर्व-मंगल का होगा नाद 
उस दिन
संकल्प सत्य-निष्ठता का होगा नवीकृत 
उस दिन
मानवता होगी साकार 
उस दिन 
जीव-जगत की गरिमा होगी मूर्त 
उस दिन 
सत्य सभ्यता पुनर्नवा होगी 
उस दिन 
विराजेंगे राम लला नवभवन 
उस दिन 
अब दूर नहीं 
वह दिन 

नीरज कुमार झा