पृष्ठ

मेरी कविताएँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मेरी कविताएँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 14 अगस्त 2011

जिसे नहीं गवारा मेरा गुलाम होना

गुलाम मैं भी हूँ 
गुलाम तुम भी हो
मजे में हो तुम
लेकिन मैं हूँ बेचैन 
जिसका तुम्हें भान भी नहीं
उसके मारे मैं हूँ परेशान 
ऐसा क्यों है
शायद तुम पड़े हो जन्म से ही 
ऐसी कालकोठरी  में 
जिसमें कोई रोशनदान भी नहीं
मैं जहाँ हूँ नज़रबंद 
वहाँ खुली खिड़कियाँ तो हैं ही सही 
रोशनी तो कभी न कभी तुमने भी देखी होगी
लेकिन तुमने झूठला दिया होगा देखे का
बहला लिया होगा अपने-आप को 
समझ कर उसे छलावा 
दिमाग पर जोर डालना 
शायद नहीं  तुम्हारी फितरत 
लेकिन मेरे मन का एक कोना है
जिसे नहीं गवारा 
मेरा गुलाम होना

- नीरज कुमार झा 

शनिवार, 13 अगस्त 2011

जन-जन संप्रभु

================================
यह जनतंत्र है
यहाँ कोई राजा नहीं है 
कोई प्रजा भी नहीं
हम सभी नागरिक हैं
और तय है कि
हम चुनते हैं अपने प्रतिनिधि
स्वामी नहीं
उचित तो यह भी नहीं कि 
कहा जाए किसी को शासक या प्रशासक 
जीविका चलती उनकी 
हमारे अंशदान से 
मात्र  हैं  वे प्रबंधक 
हमारे सामूहिक हितों के 
यह जनतंत्र है
और हर जन संप्रभु है
बंदिशें हैं और रहें 
लेकिन सिर्फ इसलिए कि
हमारी अनधीनता नहीं बदले अराजकता में
बंदिशों का है लक्ष्य मात्र एक
कि हो हमारी स्वतंत्रता अधिकतम 
और प्रतिबंध रहे हम पर कम से कम
हर जन है बड़ा 
तंत्र के किसी भी अंग
या उसके किसी कर्मी से
याद रहे हमेशा कि
यह जनतंत्र है
और जन-जन संप्रभु है
--------------------------------------------
नीरज कुमार झा
=============================



मालिक मेरे कुत्ताजी

चोरी की बढ़ती वारदातों को लेकर मैं परेशान था
दोस्तों ने सलाह दी 
मैंने एक कुत्ता पाल लिया 
शुरू में उसने कुछ संदेहास्पद लोगों को देखकर तेवर दिखाए 
लेकिन यह कुछ ही दिन चला
अब वह सारे रूआब मुझ पर ही झाड़ता है 
वह मेरे बिछावन पर लेटता है 
मेरी कुर्सी  पर बैठता है
म्रेरे भोजन का बड़ा हिस्सा 
मुझसे पहले डकार जाता है
और मैं यदि विरोध करूँ  तो 
मुझ पर गुर्राता है 
मैं एक दिन पूछ ही बैठा 
मालिक तू है या मैं 
कुत्ते ने कहा 
मैं हूँ मालिक 
मैं हैरत में पड़ गया 
वह कैसे 
तू काम करता है 
हाँ 
मैं काम करता हूँ 
नहीं 
कौन मालिक हुआ 
तुम 
मेरा नाम सम्मान से ले 
क्या कहूँ आपको 
मालिक मेरे कुत्ताजी 
ठीक है मालिक मेरे कुत्ताजी
मैं उसके तगड़े जबड़ो से झांकते 
मजबूत दांतों को देखकर सहम गया था
खाना तो आप मेरा दिया खाते हैं 
यह तेरा भ्रम है 
कैसे 
मैं पहले खाता हूँ 
हाँ 
तू मेरा छोड़ा खाता है 
हाँ 
फिर बता कौन किसको खिलाता है 
आप मुझे खिलाते  हो 
लेकिन काम तो मैं अपना करता  हूँ 
यह भी तेरा भ्रम है 
काम भी तू मेरी वजह से कर पाता है 
वह कैसे 
मैं सुबह-सुबह तुझ पर भूँकता हूँ 
तभी तो तू काम पर जाता है 
और काम कर पाता है 
हाँ मालिक मेरे कुत्ता जी 
मेरे पास कोई चारा नहीं था 
कुछ दिनों के बाद तो उसने अति कर दी 
उसने सर पर चमकने वाला सीसा बाँध लिया 
और चलते वक्त सीटी बजाने लगा 
अब यह क्या है 
समझा नहीं 
सिटी जैसे मैं बजाऊँ तू जहाँ  का तहाँ  खड़ा हो जा 
संडास भी जा रहा तो बिलकुल ठहर जा 
कुछ भी करूँगा तो मैं पहले करूँगा  
जब तक मैं कुछ करूँगा
तू कुछ नहीं करेगा और चुपचाप रहेगा 
मेरी अक्ल अब ठिकाने लग चुकी थी 
मालिक मेरे कुत्ताजी 
कहकर मैंने सलाम बजाया 
शाबाश 
शाबाशी पा 
सच कहूँ मुझे अच्छा लगा 
मजे से मैं 
घर के कोने में उसका  जूठन खाने बैठ गया

- नीरज कुमार झा 





गुरुवार, 4 अगस्त 2011

रिश्ते कुछ ही चलते जन्म भर

मैं रोया हूँ कई बार
टूटे रिश्तों को लेकर
हुआ हूँ रूआंसा कई बार
भांप कर
टूट जाने वाले रिश्तों को लेकर
पहले पता नहीं था
रिश्ता चाहे कैसा भी हो
रक्त या सम्बन्ध का
दोस्ती का या पेशे का
रिश्तों की जमीन होती है
जो हो जाती है बंजर अधिकतर
एक समय के बाद
और सूख जाते हैं रिश्तें
कुछ समय के बाद
रिश्तों की उम्र होती है
रिश्ते कुछ ही चलते हैं जीवन भर
हर रिश्तों को सहेजना नहीं होता है संभव
हर एक के लिए


- नीरज कुमार झा

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

बंदी जीवन की विरासत

हम संस्कार के नाम पर 
बच्चों को देते हैं ऐसी शिक्षा और माहौल, 
जिससे मजबूत होती हैं 
दीवारें उस कारा की 
जिसके अन्दर हम कैद हैं.
बच्चों से हम नहीं कहते 
कि हम आदर्श नहीं हैं; 
आदर्श कोई और भी नहीं है. 
हम नहीं कहते उन्हें 
कि मत पड़ो इन झमेलों में. 
उनकी ही जिम्मेदारी है
कि वे  चुने अपना रास्ता, 
और तय करें 
क्या है अच्छा या बुरा.
हम नहीं कहते 
कि हम नहीं हैं पूज्य. 
मत हो नतमस्तक हमारे सामने, 
और न ही प्रयास करो आज्ञा पालन की. 
वे ले निर्णय अपने, 
और निर्धारित करें अपने कृत्य-अकृत्य.
मत करें अनदेखी हमारी कमियों की. 
हिकारत से देखें हमें भी, 
और लौटाए जैसा का तैसा 
हमारे अस्वीकार्य किए का. 
ईज्जत करें बिना झुके
सिर्फ़ नेकनीयती की. 
हमें होना चाहिए साहस कहने के लिए
कि नहीं है हम अनुकरणीय
या कोई और भी. 
करना है उन्हें अनुसरण सिर्फ अपने विवेक का, 
और रखना है स्वविवेक को भी संदेह के घेरे में. 
हम नहीं सिखाते उन्हें  
कि वे करें प्रतिकार हमारा. 
हमसे करें प्रश्न, 
और रहे कोशिश में हमेशा 
हमें नकारने की.
हममें होनी चाहिए ईमानदारी कहने की 
कि प्रभुता और दासत्व की दुनियाँ में रहकर 
प्रवृत्ति बन चुकी है हमारी 
सल्तनत अपनी खड़ी करने की 
घर में भी. 
बच्चों से हम कहें  कि सब हैं  बराबर, 
और गैरबराबरी की हमारी हर चेष्टा पर 
वे करें प्रहार
बिलकुल बेहरमी और नफ़रत से.
बड़प्पन के थोपने की हर हमारी कोशिश को 
वे  उधेड़  दें बिलकुल बेपरवाही से. 
जब तक हम नहीं छोड़ेंगे 
हक़ अपनी छोटी मिल्कियत की,
बच्चों को नहीं बनायेंगे प्रतिगामी 
हम अपनी सामंती के,
तब तक हम नहीं तोड़ पायेंगे 
दीवारें उस कारा की 
जिसमें हम  कैद हैं, 
और हम बाध्य होंगे 
छोड़ने को विरासत 
उसी बंदी जीवन की 
जो चली आ रही है 
सनातन से. 

- नीरज कुमार झा 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

आँखें

उथली आँखें लोलुपता की
धंसी बेचारगी की आँखें
सही जगह की आँखें
बेपरवाही की
आँखें  दे रहीं गवाही
आज की हालात के

- नीरज कुमार झा 

अंधेरा (कविता)

जगमगाहट ऐसी
कि नज़रें ठहरती नहीं
अंधेरा ऐसा कि
खो जाता अहसास
आँखों के होने का ही
कहीं कैद रोशनी अंधेरे में
कहीं झीनी रोशनी के पीछे ठोस अंधेरा
याद आती है ऐसे में
पसरी दूर-दूर तक
शांत शीतल चाँदनी

- नीरज कुमार झा


मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

यह तरक्की कैसी

नफ़रत से आँखें फेर लो
बेशर्मी की बेहिसाब अमीरी ऐसी
नज़रें ना मिला सको
बेज़ार करती गरीबी ऐसी
यह  तरक्की कैसी कि
नैतिकता का निकल गया फलूदा
और मरणासन्न है मानवीयता

- नीरज कुमार झा

रविवार, 23 जनवरी 2011

सहजता का पागलपन


पागल न हों
इसलिये हम सहज रहना चाहते हैं
सहज रहने की यह हमारी कोशिश भी
पागलपन के हद तक जा चुकी है
निरर्थक में अर्थ ढूढ़ना  और
सार्थक को समझने से बचना
हमारी प्रवृत्ति बन चुकी है

संवेदना से दूर हो चुके हम इतने कि
सुपची संस्कृति हमें स्वाभाविक लगती है
और मत्स्य न्याय को नियति हमने स्वीकारी है

फ़सानों  और तमाशों को दी हमने अहमियत ऐसी
कि वे असलियत का मुँह चिढ़ा रहे हैं
हमने किया है कुछ ऐसा कि
नक़ल की दुनियाँ में चल रहा हमेशा जलसा है
और इठला रहे लोग नक़ली हैं

असल की दुनिया के लोग हम असली
छायाओं की दुनियाँ में अपने को तलाश रहे हैं
अपने खोखले व्यक्तित्व और निरंक  कृतित्व का मुखौटा साथ रखते हैं
रजतपट पर चलते चित्रों को उस मुखौटे को पहना कर खुश होते हैं
और अपनी मानवीयता की कब्र पर उगे अहम् के कटीले झाड़ को सींचते हैं

कल्पना भी उधार की
ऐसे में क्या  जीवन की कोई नई कहानी गढ़ी जा सकती है
स्थिरजन्मा बौद्धिकता के सड़ते शरीरों के बीच
क्या किसी नई सभ्यता की बातें की जा सकती हैं

- नीरज कुमार झा

रविवार, 16 जनवरी 2011

अपेक्षाएँ


अपेक्षाएँ 
समाज से, 
व्यवस्था से,
दूसरों से, 
और उम्मीदें 
बेहतरी की 
हमारी मानसिकता के 
अहम् हिस्से हैं. 
लेकिन हम नज़रअंदाज कर देते हैं 
पूरी तरह कि 
हमारी हर उम्मीद बेमानी है
बिना हमारी सक्रियता के.
हमारी उम्मीदें मांग करती हैं
हमारे प्रयासों की. 
सोचना है हमें कि 
जरूरत  हमारी है तो 
पूरी करनी होंगी हमें ही. 
व्यक्तिगत आवश्यकताएँ
हम पूरी करते हैं स्वयं ही.
सार्वजनिक हित के लिये भी
सर्वजन की इकाई के रूप में 
प्रयास होंगे हमारे ही.
इंतजार  दूसरों के पहल की 
इंतजार ही रहेगा.
कुछ तो करें हम भी 
यदि चाहते हैं अच्छा समाज. 
और यदि नहीं कर पाते  कुछ भी 
तो  भी इतना तो कर ही सकते हैं 
कि जितना बन पड़े 
करें न बुराई 
और न बने भागीदार दूसरों की
बुराइयों  में.

- नीरज कुमार झा 

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

मानवीयता के साथ

मैं कभी-कभी सोचता हूँ 
कि यदि कोई है 
सरल, सच्चरित्र, संवेदना से पूर्ण
और करुण हृदय 
उसे करनी चाहिए 
कोशिश पूरी ताक़त से 
शक्ति और सत्ता के लिये 
ताकि रहे अनाहत उसकी मानवीयता 
पाशविकता के प्रहारों से 
फ़िर सोचता हूँ 
मानवीयता के साथ सत्ता 
क्या सम्भव है दोनों का साथ
मेरा अनुभव कहता है
चुनाव ही विकल्प है 
सामान्य मेधा व  संकल्प के व्यक्ति के लिये 
चुनाव ही जब करना है 
रहना चाहूँगा मैं 
अपनी आहत और जीर्ण 
मानवीयता के साथ

- नीरज कुमार झा 


शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

महान

जो आज बड़े माने जाते हैं
उनसे मुझे परहेज है
महान तो दूर 
मैं उन्हें बड़ा भी नहीं मानता हूँ 
उदाहरण के लिये पर्दे की दुनियॉ वाले
मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते
पर्दे पर दिखने वाले फसाने
मुझे नहीं लुभाते 
समाज को देखने के लिए
मेरे पास हैं बेहतर माध्यम
और मनोरंजन के लिए है
मेरा स्वयं का कल्पना संसार
और मेरे मन का पटल
दूसरे की कल्पना खरीदने की नहीं मुझे दरकार
नकल की कला में कोई कितना भी रखे महारत
खोटा सिक्का जैसे सबके लिए
वैसे ही मेरे लिए लोग नक़ल की दुनियाँ  के 
महान मानना ही हो तो मैं मानूंगा
नुक्कड़ों पर नाटक खेलने वाले को 
या दूसरे तमाशेबाजों को
जो हमारी तालियों पर 
कृतज्ञता से हैं सर झुकाते
खिलाड़ियों को फिर भी मैं मानता महान 
गेंदों, बल्लों आदि के करतब
कूद-फांद की असाधारण क्षमता
की करता मैं भी सराहना
लेकिन उनकी महानता क्षुद्र है मेरे लिए
जलती धूप और जमा देने वाली ठंड में 
काम करने वाले मजदूरों की महानता के सामने
घर-घर में काम करने वाली महिलाएँ 
सड़कों और भूमिगत नालों को साफ करने वाले कर्मी
मन से रूग्णों की सेवा करने वाली अस्पतालों की बहनें
असली सम्मान के अधिकारी हैं मेरे लिए 
मुझे नहीं शक 
स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों की महानता पर 
उनका त्याग और बलिदान है स्तुत्य
उनका साहस है प्रणम्य
जान को हथेली पर रख कर लड़ने वाले वीर सिपाही
उनके बड़प्पन पर हो नहीं सकता किसी को ऐतराज
लेकिन नहीं किसी तरह से महान 
मेरे लिए राजनेता और अधिकारी
उनमें भी हैं मानवता के सेवी
हो सम्मान उनका
काम करने के लिये बनकर अपवाद 
मैं भी मानता हूँ 
लेकिन एक तो  सेवा ही है उनका रोजगार
और दूसरा शोहरत, ईज्जत और सुविधाएँ जो  उन्हें मिलती हैं
उन्हें नहीं रहने देती महान
मेरी नजरों में
जान को खतरे में डालकर सच के लिए लड़ने वाले समाजसेवी व पत्रकार 
और स्वहित को छोड़कर समाजहित में सोचने वाले सुधी
निश्चित रूप से हैं महान मेरे लिए
महान लेकिन महान नहीं शुमार होने वाले और भी हैं
महान नहीं लेकिन महान शुमार होने वाले और भी कई हैं
लेकिन मैं अंत करता हूँ नमन करके
मित्रता की उस नि:स्वार्थ भावना को 
जो महान बनाती मेरे मित्रों को 
मेरी नजरों में

- नीरज कुमार झा 

रविवार, 29 अगस्त 2010

ताबूत में पड़े मुर्दे की तरह

अकारण ही मुझे मिला है बहुत सारा
मेरी प्रतिभा और प्रयासों से  कहीं बहुत ज़्यादा
 अपने-आप जो आया 
डरता हूँ कहीं चला न  जाए ऐसे ही 
आँखें रखता हूँ  नीची
चलता हूँ धीमा
बोलता बिलकुल कम
साँस भी लेता धीरे-धीरे
कहीं कुछ ऐसा ना हो  जाए
कि खो जाए सब कुछ अकारण
जीता हूँ लेकिन
ताबूत में पड़े मुर्दे की तरह

- नीरज कुमार झा

शनिवार, 28 अगस्त 2010

आखेटक

मेरी ज़ेहन की तरकश में 
तराशे जुमलों के तीर भरे हैं 
ज़बाँ की  कमान से 
बेधने लक्ष्य का कोई मौक़ा
करता नहीं  जाया 
होता हूँ खुश पा निशाने पर 
झूठ, छल,  छद्म के आवरण से हीन सहजता
परहेज़ है मुझे  बख्तरबंद  लड़ाकों से
बनावटी चरित्र के लौह कवचों पर बेकाम जाते हैं तीर
ऊपर से ज़ोखिम जवाबी हमले का  
निश्शंक साधता तीर
साधुता के खुले तन पर 
धंसते तीर के ध्वनि की तीक्ष्णता 
तीर के धंसने की गहराई
पतली रक्तधारा की सघनता 
करती हैं मुझे तुष्ट
बींधे लक्ष्य की असह्य वेदना
निर्दोष मन की मर्मान्तक छटपटाहट  
करती नहीं मुझे विकल 
आखेटक हूँ पक्का 
पालन-प्रशिक्षण ही ऐसा मेरा 
होने के लिए  ऐसा ही 
किया गया है तैयार मुझे 

-  नीरज कुमार झा 


सोमवार, 9 अगस्त 2010

संगति स्वार्थ की

मैंने अनुभवों से सीखा है.
दुर्जनों का साथ,
उनसे सहयोग,
उनका समर्थन, 
भले ही लाभदायक हो,
लेकिन क्लेश ही देता है.
सज्जन का साथ,
उनकी सहायता, 
भले ही घाटे का सौदा हो, 
लेकिन सुखद होता है.
संगति स्वार्थ की 
त्रास ही देती है. 
मुश्किल है हालांकि दुष्टों से बचना. 
हर तरफ़  हैं वे ही हावी.
फ़िर भी बचता हूँ उनसे 
जितना हो सके. 

- नीरज कुमार झा 
  

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

मौन क्यों हो

मौन क्यों हो
बोलो तो सही
तुम नहीं तुच्छ 
मुद्दे तुम्हारे नहीं गौण
बातें बड़ी अधिकतर
मुद्दे  महान ज़्यादातर 
तिकड़मियों के बुने  मकड़जाल
जटिल और आकर्षक विन्यास
जीव फँस जान गँवाते
जाल में फँसे हो 
फ़िर भी चुप हो
कम से कम बोलो तो सही
नहीं हो सिर्फ़ निवाला
तुम हो बोलो तो सही

- नीरज कुमार झा 

शनिवार, 19 जून 2010

दिन वह जल्दी आने वाला है

 दिन वह जल्दी आने वाला है
जब न होंगी सीमाएँ
और न होंगी सेनाएँ 
टूटेंगी दीवारें मानवता के बीच 
दरकिनार होंगे लोग वे 
सधते हैं हित जिनके 
मानवता के बटे होने से 
नहीं होगा उद्योग सबसे बड़ा 
हत्या और नरसंहार के  औजारों का
रुकेंगे प्रशिक्षण हिंसा और ध्वंस के 
दुनियाँ चल चुकी है उस ओर 
संपर्क और आवाजाही 
व्यवहार एवं व्यापार 
तथा नई तकनीकों से
बढ़ती निकटता 
ला रही घनिष्टता अपूर्व 
मानवता के सरोकार और खतरे 
भी हो रहें हैं एक
दकियानूसी पीछे छूट रही है 
सोच नई पनप रही है 
मानवता हो रही एक इकाई
खेमें  रहेंगे तो भी नहीं खेले जाएंगे खूनी खेल 
रहेंगी अस्मिताएँ भी अनेक
पर होंगी वे प्रतिबिम्ब मात्र 
बहुरंगी संस्कृतियों के 
लोग एक दूसरे को समझ रहे हैं
गुमराह करते विचार 
नहीं हैं अब स्वीकार्य 
वसुधैव कुटुम्बकम 
अब भारत की भावना नहीं
दुनियाँ की सच्चाई बन रही है
धरती के प्राकृतिक रूकावटों को 
हम कबके जीत चुके हैं 
कृत्रिम बाधाएँ 
हमें रोक नहीं सकती
अब ज़्यादा दिन 

- नीरज कुमार झा 

शनिवार, 29 मई 2010

सच जीतता है क्योंकि ...

सच जीतता है,
यह जानकर
निश्चिन्त हो जाना
झूठ की जीत का
रास्ता साफ़ करना है। 
सच जीतता है
नहीं अपने आप। 
सच में नहीं है 
चमत्कार की शक्ति। 
सच जीतता है
क्योंकि लोग लड़ते हैं सच के लिये,
और कर देते सब कुछ न्योछावर। 
रामायण और महाभारत
महाग्रंथो का
यही है सन्देश। 
सच की रक्षा के लिये  
धरा पर आना पड़ा स्वयं ईश को। 
सच की  राह होती यदि आसान
तो नहीं करना होता क्रंदन
भगवान को
बैठ निकट मूर्च्छित लक्ष्मण  के। 
नहीं उठा रथ का टूटा पहिया रण में
दौड़ना पड़ता आक्रोशित कृष्ण को। 
सच माँगता है अनवरत संघर्ष,
निरंतर सतर्कता,
और सबसे ऊपर
प्रखर विवेक, 
क्योंकि झूठ बिलकुल सच की तरह होता है;
झूठ जीतता भी है,
और सच के नाम पर राज भी करता है। 
जीते झूठ को सच मान लेना
हारे सच को दफ़न करना है। 
सच की पहचान
सच के जीत की 
पहली शर्त है। 

- नीरज कुमार झा

गुरुवार, 27 मई 2010

क्योंकि वह मरी नहीं है

जब रात गहराती है
मेरी अंतरात्मा
सामने आ खड़ी होती है
कपड़े हटाती है
दिखाती है अपना शरीर
रिसते घावों से भरा
मेरी भावशून्य आँखों को देख
बिलखने लगती है
वह नहीं जाती
आँखों की भावशून्यता के परे
समझती  नहीं
चालाकी करना
और अवसर पा  आघात करना
नहीं है मेरा स्वभाव
सच और संवेदना के साथ चलना
दलदल से होकर गुजरना है
सच मेरे लिये जीत के लिये भी नहीं है
सच मेरा स्वभाव है
इसमें कोई दूसरा भाव नहीं है
अंतरात्मा मेरी फ़िर भी रूग्ण है
क्योंकि अकेला बेसहारा सच
अधिकतर बेजार रहता है
वह नहीं देखती
कि दुनियाँ  में क्या हो रहा है
सिरफिरे शतरंज खेल रहे हैं
और हम बने हैं मुहरें
चालें हैं उनकी अज़ब-गज़ब की 
मची है अफ़रा-तफ़री चारों ओर
वह नहीं देखती हर जगह
बेघर भटकती परित्यक्त अंतरात्माओं को
पटी धरती मरी अंतरात्माओं से
वह अपनी फटेहाली और बीमारी को लेकर रोती है
नहीं समझती कि मैंने उसे छोड़ा नहीं है
उसको नहीं किया है  बेघर
उसका करता हूँ आदर
वह फ़िर आएगी और रोएगी
क्योंकि वह मरी नहीं है

- नीरज कुमार झा 




मंगलवार, 25 मई 2010

विकास का पैमाना

विकास के कई मानदण्ड हैं
सकल घरेलू उत्पाद
सकल राष्ट्रीय आय
प्रति व्यक्ति आय
मानव विकास सूचकांक
धारणीय विकास
और न जाने क्या-क्या
देश की ताक़त भी मापी जाती है
महाशक्ति
कामचलाऊ शक्ति
बिना काम की शक्ति
और सबसे ऊपर
देशों का भी श्रेणीकरण है
सफल और विफल
मुझ जैसे आम जन के लिये
विकास का सबसे बड़ा पैमाना
हँसते-खिलखिलाते बच्चे हैं
देश सफल वही है
जहाँ बच्चों के मन में  उमंग
और होंठों पे उनके मुस्कान है
मासूमियत का राज जहाँ
देशों का सिरमौर वही है

- नीरज कुमार झा