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शनिवार, 8 अगस्त 2026

जनतांत्रिक ज्ञानमीमांसा

जनतंत्र अपनी स्वयं की ज्ञानमीमांसा में निहित होता है; ऐसा अन्यथा हो ही नहीं सकता। इसकी आधारशिला व्यक्ति, उसके व्यक्तित्व और संपत्ति की सुरक्षा, उसके अभिकरण की स्वायत्तता तथा उसके अस्तित्व की गरिमा में निहित है। लोकतंत्र का जो आधार देखने में सरल प्रतीत होता है, उसे सार्थकता देने और बनाए रखने के लिए एक जटिल संस्थागत तथा सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है। ऐसी व्यवस्था एक विकसित होती भौतिक और बौद्धिक सामाजिक अवस्था की अपेक्षा करती है, जो उसे निर्मित करने, बनाए रखने और निरंतर विकसित करने में सक्षम हो। यही कारण है कि जिन समाजों में इसके लिए आवश्यक सामाजिक और संस्थागत परिस्थितियाँ विकसित नहीं हुईं, वहाँ लोकतंत्र के लिए सार्थक जड़ें जमाना ऐतिहासिक रूप से कठिन रहा है। भारत में, हालांकि, लोकतंत्र जड़ें जमा सका, क्योंकि यहाँ इसकी गहरी सभ्यतागत विरासतें विद्यमान थीं।

विश्वभर में लोकतंत्र को टिकाए रखने के लिए आवश्यक ज्ञानमीमांसीय आधार अपनी गहराई और प्रतिबद्धता, दोनों में क्षीण हुए हैं। इस क्षरण की पहली बड़ी अभिव्यक्तियों में से एक नवउदारवादी व्यवस्था की पराजय थी, जिसे लोकप्रिय रूप से एलपीजी अर्थात उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के नाम से जाना गया। दूसरे, विभिन्न महाद्वीपों और सभ्यताओं में अनेक जनांदोलन, ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट से लेकर अरब स्प्रिंग तक, या तो निष्फल हो गए या ऐसे परिणामों में परिणत हुए जिनसे समाजों की स्थिति बेहतर नहीं हुई और कुछ मामलों में पहले से भी बदतर हो गई।

अब सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उदय लोकतांत्रिक जीवन-पद्धति के सामने इससे भी अधिक गहरी चुनौती प्रस्तुत कर रहा है, जिसका मूल मानवतावाद और मानवीय गरिमा में निहित है। केंद्रीय प्रश्न केवल व्यवस्था-विचलन का नहीं है, बल्कि मानवता के एक बड़े हिस्से के लिए मानवीय अभिकरण और मेधा के क्रमशः अप्रासंगिक या अनावश्यक होते जाने का है। जब लोग स्वायत्त अभिकर्ता के रूप में कार्य करने की अपनी क्षमता, अवसर या प्रासंगिकता को क्रमशः खोने लगते हैं, तब लोकतंत्र की स्वयं की ज्ञानमीमांसीय आधारशिला कमजोर होने लगती है।

इसके लिए हमें अधिक गहन ‘प्रणाली-चिंतन’ की आवश्यकता है। हमें लोकतंत्र को केवल शासन-व्यवस्था या संस्थाओं के एक समूह के रूप में नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व को जानने, उसका मूल्य निर्धारित करने और उसे व्यवस्थित करने की एक पद्धति के रूप में समझना होगा। अंततः लोकतंत्र का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करेगा कि हम मनुष्य के पुरुषार्थ को संरक्षित कर पाते हैं या नहीं, और उसे केवल अधिष्ठानावलंबी प्रजा, उपभोक्ता अथवा लगातार अधिक स्वायत्त होती जा रही प्रणालियों के किसी स्वायत्त-प्रणालीगत प्रतिस्थाप्य घटक में बदलने से रोक पाते हैं।

नीरज कुमार झा

गुरुवार, 25 जून 2026

ज्ञान समाज

ज्ञान मानव की स्वाभाविक स्थिति है। ज्ञान कोई सिद्धि नहीं, बल्कि सत्य के प्रति अनवरत निष्ठा और आत्मपरीक्षण का यत्न है। जो व्यक्ति इस प्रवृत्ति से हीन है अथवा उससे बाधित है, वह अपनी स्वाभाविक स्थिति में नहीं है। ऐसी वैयक्तिक अस्वाभाविकता का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है और उसकी भारीता भारी संकट का कारण बन जाती है।

प्रश्न उठता है: ज्ञानी कौन है? ज्ञानी वह नहीं जो स्वयं को ज्ञान का स्वामी मानता है, बल्कि वह है जो संवेदनशील है; जो दूसरों की भावनाओं, पीड़ाओं और अनुभवों को अपने भीतर अनुभव कर सकता है।
सूत्र रूप में:
ज्ञान का लक्षण संवेदना है; अज्ञान का लक्षण अहंकार।
ज्ञानसार के कतिपय कथ्य :-
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
- महा उपनिषद
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
यदा पश्यति भूतात्मा ब्रह्म संपद्यते तदा॥
- महाभारत
(जब मनुष्य सभी प्राणियों में अपने को और अपने में सभी प्राणियों को देखता है, तब वह ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।)
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
- कबीर
परहित सरिस धरम नहि भाई।
परपीड़ा सम नहि अधमाई॥
- तुलसीदास
आज के समय में उपर्युक्त बातें अत्यंत कृत्रिम या अव्यावहारिक लग सकती हैं, किन्तु इतिहासकारों और बाह्य पर्यवेक्षकों के विवरण बताते हैं कि प्राचीन भारत में यह सामान्य जीवन का यथार्थ था। तथापि, यह स्थिति स्वतः निर्मित नहीं हुई थी; इसकी स्थापना और रक्षा के लिए ज्ञानियों तथा योद्धाओं ने अनीति और अन्याय के विरुद्ध सतत संघर्ष किया था।
नीरज कुमार झा

गुरुवार, 28 मई 2026

साम्राज्य और एम्पाइअर

अनुवाद प्रायः भाषाओं के समांतर शब्दों के माध्यम से किया जाता है, किंतु ऐसे समांतर शब्द अनेक बार सभ्यताओं के मौलिक अंतर को ढक देते हैं। उदाहरण के लिए भारत में अब यह समझ एक सीमा तक विकसित हुई है कि ‘रीलिजन’ और ‘धर्म’ में मौलिक भेद है। इसी प्रकार ‘साम्राज्य’ और ‘एम्पाइअर’ (अथवा अन्य सभ्यताओं के समांतर शब्दों) के बीच भी मौलिक अंतर है, जिसे मेरी जानकारी के अनुसार अभी तक सामान्य बोध के क्षेत्र में पर्याप्त रूप से दृष्टिगत नहीं किया गया है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में साम्राज्य का मूल उद्देश्य धर्म का विस्तार, न्याय की स्थापना, शांति और संपर्क को निर्बाध बनाना तथा सामान्य समृद्धि के मार्गों को निष्कंटक करना था। यह व्यापक सामूहिक शक्ति का लोककल्याण और विपत्तियों के निवारण हेतु व्यवस्थित उपयोग था। चक्रवर्ती का ध्येय आदर्श और न्यायप्रिय धर्मराज के रूप में शस्त्र और शास्त्र, दोनों के माध्यम से संसार में धर्मचक्र की स्थापना करना था।

इसके विपरीत, एम्पाइअर प्रायः किसी व्यक्ति अथवा संगठित समूह की सर्वोच्चता और लिप्सा-पूर्ति के उद्देश्य से व्यापक स्तर पर लोगों के दमन और दोहन की व्यवस्था रहा है। निश्चय ही दोनों ही स्थितियों में अपवादों की बहुलता मिलती है, किंतु रामराज्य का आदर्श तथा अशोक और चंद्रगुप्त द्वितीय के साम्राज्य जैसे उदाहरण भारतीय अवधारणा की विशिष्टता को स्पष्ट करते हैं।

पुनश्च : उक्त संदर्भ में मेरा आग्रह है कि हिंदी में सम्प्रेषण के लिए ‘एम्पाइअर’ तथा ‘इम्पीरियलिज़्म’ शब्दों का यथावत प्रयोग किया जाए। उदाहरणार्थ, ‘ब्रिटिश एम्पाइअर’ और ‘ब्रिटिश एम्पाइअरवाद’ कहा जाए, न कि ‘ब्रिटिश साम्राज्य’ और ‘साम्राज्यवाद’।

नीरज कुमार झा 

मंगलवार, 5 मई 2026

शब्दों की प्राण-रक्षा

हर शब्द प्रयत्न है,
अर्थ उसका जीवन है।
निष्प्राण न हों शब्द,
शब्दों को सींचना होता है।
सूखे-गिरे बिखरे शब्दों के ऊपर,
जीवन दुष्कर हो जाता है।

नीरज कुमार झा

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

सच की नियति

संघर्ष ही सच की नियति,
नहीं कभी रहा उसका ठाठ।
करुणा व प्रीत प्रकृति उसकी,
कैसे फैलाए वह जाल?

नीरज कुमार झा

शोधपद्धति-विज्ञान

पाँव देखो,
हैं कि नहीं?
 
नीरज कुमार झा

डकार भी नहीं लेता

अति बुद्धिसंपन्न होगा वह
जिसने पहचाना होगा
सबसे पहले
कि झूठ के पाँव नहीं होते।

यदि यह सच है कि
झूठ के पाँव नहीं होते,
तो फिर झूठ पहुँचता कैसे है
हर जगह?

झूठ के पाँव नहीं होते,
पर उसमें फरेब होता है।
वह सच की पीठ पर चढ़ जाता है,
यह कहकर
कि वही उसे ले जाएगा
सही जगह।

और इस तरह
झूठ पहुँच जाता है
हर जगह।

पहुँचकर जहाँ पहुँचना होता है उसे,
सच को बाहर
खूँटे से बाँधकर रखता है वह।

पाँव नहीं होते झूठ के,
पर उसका मुँह बड़ा होता है,
और पेट भी।
वह निगल जाता है
संघर्षरत सच की संपत्तियाँ—
मानवीय सरोकार,
उद्यमिता,
सृजनशीलता
और क्रांतियाँ।

डकार भी नहीं लेता।

नीरज कुमार झा

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

लोकधर्म

जनतंत्र को जन शक्ति देता है, और जनतंत्र जन को। जनतंत्र विषयक धर्म व्यापक धर्म के अटल विधान के ही रूप में कार्य करता है -
 
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद् धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥

जनतंत्र को पुष्ट करने निमित्त जन को सम्यक आचरण और उपक्रम अपनाने से पहले तंत्र के व्यवस्थित बोध को प्राप्त करना अभीष्ट है, अन्यथा ऐसे प्रयास विपरीत प्रभाव डाल सकते हैं। इसके लिए लोग प्रश्न करें, और जिनके लिए संभव हो, वे अध्ययन करें। यहाँ यह उल्लेख भी प्रासंगिक है कि वैश्विक संदर्भ में (अन्य सभ्यताओं की तुलना में) दृष्टिगत करने से यह स्पष्ट है कि भारतीय परंपराओं में मानवता और मानवीय गरिमा को अतुल्य रूप से श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है, जिसका अध्ययन सम्यक बोध प्राप्ति हेतु ठोस आधार प्रदान करता है।
 
नीरज कुमार झा

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

निदान

गणित के शिक्षक ने विद्यार्थी से कहा कि उसका उत्तर गलत है; सही उत्तर 4 है, जबकि उसने 2 लिखा है। विद्यार्थी ने अपने उत्तर में 2 जोड़ दिया और बोला—“लीजिए सर, अब उत्तर सही हो गया।”

पानी और उर्वरक के अभाव में फसल पीली पड़ने लगी। किसान ने पौधों को  हरा रंग दिया।

कमरे में छत से पानी टपक रहा था। मकान मालिक ने फर्श पर पानी बहने के लिए नाली बनवा ली।

नकझ

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

वैश्विक वैचारिक तन्तुजाल

वैश्विक संगठित शक्तियों का वर्चस्व, दमन और दोहन जिन तंत्रों पर टिका है, उनका पोषण करने वाला वैचारिक तंतु-जाल सामान्य व्यक्तियों की मानसिकता में आविष्ट होकर क्रियाशील रहता है। स्वयं को निरीह मानकर आरोपित आचरण का स्वाभाविक रूप से पालन करने वाले व्यक्तियों का समूह ही अंततः उस व्यवस्था का यौगिक अवयव बन जाता है। यह तंत्र इतना सूक्ष्म रूप से कार्य करता है कि वही निर्धारित करता है कि सामान्य व्यक्ति किन व्यक्ति-भूमिकाओं, दृश्यों और वस्तुओं की सराहना करे और किनका तिरस्कार। स्वयं, स्वजनों और समस्थित व्यक्तियों के प्रति तिरस्कार इस पराजयी प्रवृत्ति का प्राथमिक लक्षण है।

नीरज कुमार झा

भारतीयता

माता-पिता और गुरुओं के प्रति अनन्य सम्मान मानवीयता का आधारभूत लक्षण है। यह पुरानी सी लगने वाली बात ही भारतीयता के अस्तित्व और अस्मिता का पोषक और रक्षक रही है।

नीरज कुमार झा

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

राह दिखाते हैं गांधी

शांति के गीत में हैं गांधी
प्रतिरोध के प्रयास में हैं गांधी
मानव की हो धरती
राह दिखाते हैं गांधी

नीरज कुमार झा

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

धर्मराष्ट्र भारत का संदेश

उद्दीप्त प्रज्ञा से उद्भूत
विवेक से सतत परीक्षित
धर्म वही है
 
सत्यान्वेषक
सत्यानुरागी
सत्यानुयायी
संवेदना से पूर्ण
स्वतंत्र चेतना से युक्त
जीव-अजीव के प्रति श्रद्धावनत
धर्मप्राण वही है
 
नकारात्मकता चिह्नित करने को उद्यत
न्याय का पक्षधर
दुर्जनों के प्रतिकार को सन्नद्ध
जो सज्जनहितैषी है
धार्मिक वही है

अंधकार के विरूद्ध अभियान है धर्म
अंधत्व से त्राण है धर्म
जिसकी दृष्टि निर्दोष
मस्तिष्क सजग निष्कलुष
धर्ममार्ग यात्री वही है
 
धर्मानुरूप हों
आस्था के वचन
उपासना की पद्धतियाँ
भारत का संदेश यही है
 
नीरज कुमार झा

गुरुवार, 26 मार्च 2026

ज्ञान : कतिपय स्पष्टीकरण

ज्ञान तभी ज्ञान है, जब उसे धारण किया जाए; यह भंडारण हेतु मात्र वस्तु नहीं है। ज्ञान आचरण में परिलक्षित प्रवृत्तियाँ हैं; सम्प्रेषण की निपुणता ज्ञान-अज्ञान से निरपेक्ष एक कौशल है। ज्ञान संवेदना और सौंदर्यबोध है; यह प्रभुता, धन या यश की प्राप्ति की युक्ति नहीं है। ज्ञान पीड़ा, वंचना, निरर्थकता, नीरसता, अन्याय और संघर्षों के शमन हेतु विज्ञान का संधान है; यह अन्यीकरण की योजना के द्वारा शोषण, दोहन और परपीड़न का उपक्रम नहीं है। ज्ञान, सहानुभूति और स्वानुभूति की क्षमता है; नाटकीय प्रदर्शन या मंचन में दक्षता इसके इतर एक कला है।

नीरज कुमार झा

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

इतिहास बोध और समाज

इतिहास स्मरणीय तथ्यों का संग्रहण है। स्मरणीय तथ्यों में से आधारभूत है गुणी और सुधी जनों के मानवों को पाशविकता से मानवातीयता की ओर ले जाने के लिए संघर्षों की और दुष्टों के अतिचारों की कहानियाँ। सज्जनों के संघर्ष प्राकृतिक प्रतिकूलता तथा मनुष्य की अमानवीय प्रवृत्तियों के विरूद्ध रही हैं। ये कथाएँ और गाथाएँ हमें सूचित करती हैं कि किन-किन प्रकार के विचारों, किन-किन अभियानों और किन-किन प्रयासों ने मानवता का हित किया है और किन-किन ने अहित। अच्छाई को कैसे बचाया और बढ़ाया जाए और बुराई को कैसे रोका जाए या कम किया जाए, इसको जानने के लिए जिया हुआ अनुभव सबसे प्रामाणिक पैमाना है। इस संदर्भ में तर्क और भावना भरोसे लायक नहीं हैं। इतिहास की यह मौलिक उपादेयता है।
 
विगत की समझ और समझदारियाँ विचारधाराओं के रूप में हमारे बीच रहती हैं। इस संदर्भ में विचारधारा और क्रियाशील ज्ञानमीमांसा भिन्न नहीं है। सामान्य लोकयात्रियों के लिए उनके बीच प्रचलित विचारधारा ही उनका प्रश्नातीत अवलंब होती हैं। बेहतरी के नजरिए से बड़ी बात यह है कि विचारधाराएँ भी ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय अनुशीलन की मांग करती हैं और भिन्न विचारधारा पोषित इतिहासकारिताएँ  (इतिहासलेखन की धाराएँ) भी।  
 
इस लघुलेख का उद्देश्य यह रेखांकित करना है कि विगत में ऐसे भी दौर आये जब इतिहास बोध विलुप्त हो गया। हर समय ऐसा भी नहीं था कि इतिहास की पुस्तकें और इतिहासकार उपलब्ध नहीं थे। वास्तव में इतिहास मात्र ज्ञान के लिए ज्ञान की विधा नहीं है, बल्कि समाज की अच्छाई के प्रति प्रतिबद्धता से जनित बोध और सक्रियता है।
 
नीरज कुमार झा

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

मध्यवर्ग

अर्थव्यवस्था द्वारा प्रत्यक्षतः पोषित वृत्तिक वर्ग मध्यवर्ग का गत्यात्मक अंग है तथा मध्यवर्ग के विस्तार में योगदान देने वाला एक उपवर्ग भी है। यह एक खुला वर्ग है, जिसके विस्तार के साथ देश के विकास में प्रत्यक्ष योगदान देने वाले वृत्तिक रूप में अल्प-आय वर्ग, कृषि तथा पारंपरिक वाणिज्य में कार्यरत लोगों का भी इसमें समावेश होता है। यह वर्ग देश और समाज की उन्नति का कारक भी है और उसका परिणाम भी। यही वर्ग वंचित वर्गों की सहायता हेतु वित्त उपलब्ध कराता है तथा पूँजीपति वर्ग के उपक्रमों के लिए मेधा और कौशल प्रदान करता है। इस वर्ग के जीवन की सुगमता विकास को पोषित और गति प्रदान करती है।

नीरज कुमार झा

स्वागत

औपनिवेशिकता आरोपित प्रथाओं, परंपराओं और क्रियाविधियों को स्पष्ट रूप से निर्धारित समय-सीमा के भीतर समाप्त करने के लिए की गई सचेतन, सुव्यवस्थित और योजनाबद्ध कार्ययोजना एक सराहनीय एवं स्वागतयोग्य नीति है। यह मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठापित करने के संवैधानिक संकल्प को पुष्ट करता है। गरिमामय जीवन नागरिकों के आत्मबल का संवर्द्धन करेगा और भारत की विकसित राष्ट्र की ओर यात्रा को सुगम बनाएगा।

नीरज कुमार झा

मंगलवार, 30 सितंबर 2025

तुम भी दीपक

रोशन होने की चाहत में,
मत बनो परावर्तक।
नहीं अधूरे, नहीं अंधेरे में तुम।
अमोल कृति हो तुम उसकी,
तुम भी दीपक हो
उसकी बनाई दुनिया में।

नीरज कुमार झा

जीवन का मूल्य

तुम पतंगे नहीं हो,
वह रोशनी भी नहीं है।
अंतस में दीपक जलाओ,
देखोगे मानव होने की गरिमा,
जानोगे जीवन का मूल्य।

नीरज कुमार झा

सोमवार, 15 सितंबर 2025

हिंदी : रंजन अथवा रणनीति

हिंदी दिवस एक वार्षिक आनुष्ठानिक आयोजन है। प्रत्येक वर्ष गणमान्य जन भाषणों और लेखों के माध्यम से हिंदी के गौरवमयी अतीत, वर्तमान में उसकी विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठा और उज्ज्वल भविष्य के दर्शन कराते हैं। मनभावन और लोकलुभावन वक्तव्यों की अपनी उपादेयता है, परंतु एक अन्य प्रासंगिक तथ्य यह है कि आज तेजी से सिमटती दुनिया में हिंदी को व्यावहारिक विश्वभाषा की स्थिति में लाए बिना हिंदी को लेकर हमारी उद्घोषित आकांक्षाएँ पूरी नहीं हो सकतीं।

पूर्व में भाषाई विविधताएँ दूरियों के द्वारा पोषित थीं, किंतु अब मानव-संपर्कों के अनेक आयामों में दूरी शून्य अथवा अत्यल्प हो गई है। विश्व में वह दिन दूर नहीं जब कोई एक ही भाषा पूरी मानवता की मुख्य अथवा औपचारिक भाषा होगी। अन्य भाषाएँ उस महाधारा में मिलने वाली लघुधाराएँ बनकर रह जाएँगी। प्रयास इस दिशा में होना चाहिए कि हिंदी उसी भाषा के रूप में स्थापित हो। इसके लिए सोद्देश्य, लक्ष्याभिमुख, नियोजित रणनीतिक प्रयास और निवेश की आवश्यकता होगी।

इस प्रयास से, पूर्णरूपेण फलीभूत न होने पर भी, इतना तो सुनिश्चित है कि भविष्य की विश्वभाषा कोई भी हो, कैसी भी हो, वह हिंदीभाषियों के लिए अधिक बोधगम्य होगी और उनके अनुकूल भी।

इसके साथ ही, हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता की संभाव्यता का आधार तभी बनेगा जब हिंदी क्षेत्र वैश्विक स्तर पर सुसंस्कृत और सम्पन्न हो; वस्तुतः वही भाषा दुनिया सीखती है, जिसके बोलने वालों का विश्वव्यापी प्रभाव हो।
जो भी हो, भावनात्मक रंजन का महत्व तो है ही।

नीरज कुमार झा