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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

अमीरी के कटीले झाड़

बेमुरुव्वत  मरुस्थल में 
अमीरी के कटीले झाड़ 
उग रहे तेजी से चारों ओर
चोरी-चकारी
लूट-खसोट 
ठगी और बेईमानी 
का ही जोर 
हर ओर
हैं नखलिस्तान ईमान के भी 
लेकिन दीवारें खड़ी 
उनके चारों ओर 
जमीन होती यदि सही
लगते बाग एक पर एक 
एक से एक
मेहनत के फूल खिलते
उद्यम के वृक्ष उगते
साहस के तरूवर छूते आकाश 
छाया होती घनी 
सुगन्धित होती हवा 
होती खुशी
संतुष्टि 
शांति 
चारों ओर   

- नीरज कुमार झा 

सोमवार, 12 सितंबर 2011

अभी भी दूर है सभ्यता हमसे

तय है 
भविष्य की पीढ़ियाँ
जब लिखेंगी इतिहास 
हमें रखेंगी बर्बरों की श्रेणी में
हमारी तथाकथित सभ्यता 
खर्चती है
सबसे ज़्यादा  संसाधन 
ध्वंस के उद्योगों पर
और हिंसा के प्रशिक्षण पर
मानवता की प्रगति बौनी है 
इसकी अदमित दानवता के आगे
हमारे पंथ और तंत्र के मूल में 
है अभी भी सिर्फ हिंसा
अभी भी उपेक्षित है
भारत का वसुधैव कुटुम्बकम का  सन्देश 
और अहिंसा का दर्शन 
हमारी सभ्यता अभी भी दूर है
सत्य, अहिंसा और अनुराग के
जीवन दर्शन और शैली से 
अभी भी दूर है सभ्यता
हमसे

- नीरज कुमार झा 






गुरुवार, 3 जून 2010

शहर के पुल


शहर पटा पुलों से
आवाजाही भी बहुत पुलों पर
शहर को बाँटते नदी-नाले
पता भी नहीं पड़ते
नदी-नाले पता तो नहीं पड़ते
लेकिन इस गुमनाम आवाजाही से
पता भी क्या पड़ता है
आते-जाते हैं लोग
पता उनका भी नहीं पड़ता
शहर है बड़ा
दरारें हैं चौड़ी
पर पता नहीं चलता
पुल पड़े हैं पाटों पर
जोड़ते नहीं किनारों को
बार-बार पार होते हैं लोग
लेकिन पार नहीं हो पाते लोग
पता उसका भी नहीं चलता

- नीरज कुमार झा

शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

दीप आस्था के






अरण्य में कोई दीप जला जाता है
घटाटोप अंधकार में राहगीर का
विश्वास जब डगमगाता है
यह टिमटिमाती रोशनी
बन जाती है उसकी आस्था

अमावस की स्याह रात
जब दीप असंख्य जलते हैं
अंधकार के अति की उस रात में 
आस्था एक सभ्यता की रोशन होती है
राह दिखाती संशय में पड़े कदमों को

रूग्णता, शैथिल्य, दुःख, या बिछोह
होता जब जीवन में उछाह कम
काटता यह तिमिर नैराश्य का
लौटा लाता यह उत्साह-उमंग 
पुनर्नवा करता मानव मन को

देश और दुनिया में कहीं भी
जब हम प्रकाश को लड़ियों में पिरोते हैं
हमारी प्रतिबद्धता है प्राचीन 
सत्य में हमारा विश्वास है अडिग
उस रात ये जगमग लड़ियाँ कहती हैं 

एक संस्कृति देती है चुनौती
अन्याय, अनीति और अनाचार को 
विकार, विद्वेष व विषाद के अंधकार को 
असत का रहा हो कितना भी जोर 
अखंडित है यह हमारा प्रकाश पर्व 

- नीरज कुमार झा

शनिवार, 13 जून 2009

मंजिल

राह हो मुश्किल
चलना न हो मुमकिन
राही हताश न हो
राहें और भी हैं
मंजिल भी एक नहीं

न भी मिले कोई राह
तुम परेशान न हो
बस चल पड़ो
राह वही है
पहुँच गए जहाँ
मंजिल वही है

चल भी न सके
तो कोई बात नहीं
मिले न कोई मंजिल
तो भी निराश न हो
हर राह है
अपने ही अंतर की यात्रा
खुद ही हो तुम अपनी मंजिल


-- नीरज कुमार झा