समाज से,
व्यवस्था से,
दूसरों से,
और उम्मीदें
बेहतरी की
हमारी मानसिकता के
अहम् हिस्से हैं.
लेकिन हम नज़रअंदाज कर देते हैं
पूरी तरह कि
हमारी हर उम्मीद बेमानी है
बिना हमारी सक्रियता के.
हमारी उम्मीदें मांग करती हैं
हमारे प्रयासों की.
सोचना है हमें कि
जरूरत हमारी है तो
पूरी करनी होंगी हमें ही.
व्यक्तिगत आवश्यकताएँ
हम पूरी करते हैं स्वयं ही.
सार्वजनिक हित के लिये भी
सर्वजन की इकाई के रूप में
प्रयास होंगे हमारे ही.
इंतजार दूसरों के पहल की
इंतजार ही रहेगा.
कुछ तो करें हम भी
यदि चाहते हैं अच्छा समाज.
और यदि नहीं कर पाते कुछ भी
तो भी इतना तो कर ही सकते हैं
कि जितना बन पड़े
करें न बुराई
और न बने भागीदार दूसरों की
बुराइयों में.
- नीरज कुमार झा
