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मंगलवार, 30 सितंबर 2014

Celebrating the Warrior Goddess

Gulmohar City, Gwalior, September 30, 2014
Brahmanism did everything to elevate womanhood. Annual celebration of the feats of the Warrior Goddess Durga  is a similar resolve. She rides the most ferocious of beasts - a lion and she slays the invincible Mahishasur. This is an exhortation to beat bestiality for all women. The message is loud and clear - fight your way out. You don't need anybody to be by your side, you are all powerful. 

रविवार, 8 जून 2014

If You Are Truthful

If you are truthful,
You belong to none,
But to yourself.
This is an age
When deceit is the character.
That's natural to most of them.
People don't see people,
Who may be truthful,
With suspicion.
They are dead sure of
Their wickedness.
For most of them
Anything animate or inanimate
Is a matter for use.
Exhausted of usability
A person becomes a pariah
Instantly.
If you are humane,
That's an added liability.
People enjoy finding
A soft target,
With whom
They can let loose
Their all lust and wickedness,
And the venom
To test its effect
As they sense the obvious impunity.
Self-respect is a baggage,
Which hardly one can carry.
Be haughty or submissive
As the occasion demands,
This is how people live.
You can't afford dignity,
In times, when nothing attracts more derision
Than this stupid thing.
If you are incorrigibly truthful,
And also humane,
And have self-respect,
Do imbibe some vileness,
To dilute all these.
Otherwise like pure gold,
You are going to vanish,
By rubbing around with
Rugged and rough objects.






गुरुवार, 7 मार्च 2013

नैतिकता का मृत्यु-भोज

अधिकतर लोगों ने समझ लिया है 

यदि हैं आदतन ईमानदार 
तो इस बात को प्रकट न होने दें 
नहीं तो लोग समझेंगे ढोंगी 


यदि हैं चरित्रवान 
तो चर्चाओं में ऐसा न झलके 
नहीं तो समझे जायेंगे पाखंडी 

यदि हैं सज्जन 
तो इसे प्रदर्शित न होने दें 
नहीं तो लोग समझेंगे बेबस-कमज़ोर 

सच बोलने से बचें 
नहीं तो लोग करार देंगे
उपद्रवी या द्रोही 

लोग जानते हैं कि 
नैतिकता के मृत्यु-भोज पर 
बोलने से खलल पड़ता है 
भोजन के आनंद में 

कान रखो  बंद ताकि 
नहीं सुनाई दे 
मानवता की आर्त्तनाद 

मूंदे रखों आँखें ताकि 
नहीं दिखे लुटता  समाज 

रखो मुंह बंद 
ताकि कहीं निकल जाए  आह 
होगी जो 
मृतप्राय सभ्यता की कराह 

यही है बहुसंख्य संवेदी लोगों का हाल 

- नीरज कुमार झा 

सोमवार, 13 अगस्त 2012

उम्मीद की पतली डोर

उम्मीद की पतली डोर है
परखो इसे मत इतना कि
रेशा-रेशा इसका उधड़ जाए
तुम चिंता क्यों नहीं करते
दल-दल की जिसमें हो
तुम बुरी तरह फँसे
निष्क्रिय शरीर और
चोंचलेबाजी में तुम्हारी महारत
हैरत की बात है
ऐसा तो नहीं है कि
तुम्हारे खुले मुंह में
कोई  कुछ डाल जाता है
और तुम उसी की टर्राने लगते हो


- नीरज कुमार झा





शनिवार, 9 जून 2012

"सबसे प्रेम करो, कुछ पर भरोसा करो और किसी का बुरा न करो।”



"सबसे प्रेम करो, कुछ पर भरोसा करो और किसी का बुरा न करो।” - विलियम शेक्सपियर, नाटककार और कवि (1564-1616)
“Love all, trust a few, do wrong to none.” - William Shakespeare, playwright and poet (1564-1616)



शेक्सपियर के कथन का तीसरा हिस्सा, किसी का बुरा ना करो, हमारी सभ्यतामूलक आचरण की अन्तर्निहित विशेषता है। 'जो तोको काँटा बोए ताहि बोए तू फूल' का सन्देश यदि पूरी तरह से नहीं तो कम से कम आंशिक रूप से तो निश्चित तौर से अधिकांश लोगों के आचरण की विशेषता है । लोग अकारण किसी का बुरा नहीं करते हैं। 'सबसे प्रेम करो' की प्रवृत्ति कठिन है। सबसे प्रेम की भावना प्रबोध की पराकाष्ठा  है। इसलिए कबीर ने कहा है कि ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए। ऐसी भावना महान संतों में ही पाई जाती है। उदाहरण के लिए मैं महात्मा गांधी, मदर टेरेसा तथा बाबा आमटे का नाम लेना चाहूंगा। इस तरह का आचरण हालांकि जितना कठिन है उतना ही अनुकरणीय है। शेक्सपियर के उक्त कथन के मध्य हिस्से से मैं सहमत नहीं हूँ। मेरा यह मानना है कि हर व्यक्ति मानवीयता से नैसर्गिक रूप से युक है तथा प्रत्येक व्यक्ति भरोसे के काबिल है । किसी पर भरोसा नहीं करना व्यक्ति की मानवीयता की अवमानना है तथा स्वयं की मानवीयता के प्रति अविश्वास है। शेक्सपियर के इस वाक्यांश से पाश्चात्य सभ्यता की चतुराई झलकती है। भरोसा नहीं करने से भरोसे लायक लोगों की संख्या ही घटेगी। हमारा आचरण तो यही है कि हम धोखा खाकर भी भरोसा करते हैं और किसी भी व्यक्ति से बार बार धोखा खाकर भी हमने उस पर भरोसा नहीं छोड़ा है।आदमी होने के नाते उसके अंदर थोड़ी बहुत आदमीयत तो होगी ही, मुझे उस हिस्से को बेसहारा छोड़ना गवारा नहीं है। हमें उस साधु का आचरण ही भाता है जो बिच्छू से बार-बार डसे जाने के बाद भी उसे बचाता है। हमारी वरीयता हमारी साधुता होनी चाहिए न की सामने वाली की दुष्टता। हमारी मौलिक प्रवृत्ति यदि परिवेश से प्रभावित हो जाती है तो स्वाभाविक है की वह हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं है।



- नीरज कुमार झा

रविवार, 20 मई 2012

राजनीति में अरुचि

"राजनीति में हिस्सा नहीं लेने का एक दंड अपने से निम्न व्यक्तियों द्वारा शासित होना है।" - प्लैटो
("One of the penalties for refusing to participate in politics is that you end up being governed by your inferiors." - Plato)

इन्टरनेट पर सर्फ करते हुए प्लैटो के इस उक्ति पर नजर पड़ी. भारत की त्रासदी के सबसे बड़े कारण को यह कथन एकबारगी साफ़ कर देता है. भारत में राजनीतिक अव्यवस्था का सबसे बड़ा कारण समाज के अस्तरीय या निम्नस्तरीय लोगों की राजनीति में सक्रियता तथा स्तरीयता की संभावना वाले लोगों की राजनीतिक उदासीनता है. तथाकथित स्तरीय लोगों को तथाकथित इसलिए कहा गया है कि बिना सार्वजनिक मामलों में रूचि और सहभागिता के किसी व्यक्ति को स्तरीय कहा जाना उचित नहीं है. राजनीति में रूचि का यह मतलब कदापि नहीं है कि हर व्यक्ति चुनावी राजनीति में हिस्सा ले बल्कि इसका मतलब यह अवश्य है कि कम से कम आदमी मतदान तो अवश्य करे और सोच-समझ कर करे. बिना सोचे-समझे मतदान करना मतदान नहीं करने से भी बुरा है. हमें किसी दल को इसलिए ही वोट नहीं डालना चाहिए कि हम फलानी पार्टी के खानदानी समर्थक हैं, फलानी पार्टी हमारी जाति के लोगों की है, उम्मीदवार हमारी जाति या जमात का है. भारतीय मतदाता जज्बाती भी है. सामूहिक जज्बात की लहर से देश में कई बार राजनीतिक असंतुलन उत्पन्न हुआ है. हमें ऐसी किसी लहर से बचने की आवश्यकता है. इसके अलावा हर स्तर की राजनीति में रूचि रखना और नागरिक कर्तव्यों का निर्वहन जितना बन पड़े करना भी आवश्यक है. और हर स्तर की राजनीति, यहाँ तक की पारिवारिक मामलों को भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की राजनीति से और राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की राजनीति को भी पारिवारिक मामलों से जोड़कर देखने की आवश्यकता है. प्रत्येक व्यक्ति की मानसिकता और क्रिया-कलाप से लेकर भूमंडलीय राजनीति तक के एक ही विशाल और जटिल विन्यास के आयाम हैं जहाँ कोशिकाएं शरीर का और शरीर कोशिकाओं का निर्माण करती हैं. हमारी हर गतिविधि और सोच का व्यापक प्रभाव है, इस सच पर विश्वास रखते हुए हमारा आचरण होना चाहिए.

यहाँ मध्यवर्ग की राजनीतिक भूमिका का उल्ल्लेख भी आवश्यक है. देश में मध्यवर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका है. आज जो देश तरक्की कर रहा है उसका जनाधार मध्यवर्ग ही है. भारत के पूंजीपति विश्व के धनकुबेरों में शुमार हो रहे हैं और भारत के राजनेताओं को वैश्विक स्तर पर सम्मान से देखा जाने लगा है. इन सभी का श्रेय मध्यवर्ग के मेधा, कौशल और श्रम को ही जाता है. मध्यवर्ग के परिश्रम के फलस्वरूप इस वर्ग का विस्तार हुआ है जिससे बड़ी संख्या में लोग गरीबी से निजात पा सके हैं. इन सब के बाद भी सरकार के द्वारा मध्यवर्ग के हितों की अनदेखी की जाती है. राजनीतिक वर्ग जानता है कि मध्यवर्ग राजनीतिक रूप से उदासीन नहीं तो निष्क्रिय जरूर है. इस कारण से मध्यवर्ग के हितों की वे निरंतर अवहेलना करते हैं. मध्यवर्ग की वृहत्तर राजनीतिक सक्रियता समय की माँग है. मध्यवर्ग की दूसरी समस्या राजनीतिक अभिमुखता की भी है. प्रायः उनकी राजनीतिक सोच पर वाममार्गी विचारधारा हावी है. इसका कारण लम्बे समय तक भारत की शिक्षा व्यवस्था में वामपंथी विचारधारा की विद्यमान प्रधानता है। सोवियतसंघ ने प्रचार तथा गुप्तचर गतिविधियों के द्वारा यहाँ की राजनीतिक सोच को अपने सांचे में ढाल लिया था। आज भी धुर दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोग भी जब मुंह खोलते हैं तो सोवियत शब्दावली और विचारधारा ही मुखर होती है। मध्यवर्ग को अपनी राजनीतिक अभिमुखता पर गंभीरता से मंथन करना चाहिए।

मध्यवर्ग के लिए ही नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए अतएव जो सबसे जरूरी है वह राजनीतिक साहित्य का व्यापक अध्ययन है और राजनीति को लेकर, जितने लोगों और जिन लोगों से संभव हो, बहस करना है. इस तारतम्य में यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हम राजनीतिक सक्रियता के प्रयास में किसी विचारधारा या नेता में अंधविश्वास या आस्था के चक्रव्यूह में न फँसे. ऐसी प्रवृत्ति घातक हो सकती है. हर व्यक्ति को अपने विवेक को सदैव सजग रखना चाहिए और बड़े से बड़े नेता, संगठन या विचारधारा को अपने विवेक की कसौटी पर सदैव परखते रहना चाहिए. हमें अपने व्यक्तित्व या मेधा को किसी भी हाल में कमतर नहीं आंकना चाहिए. हमें किसी के भी अनुयायी बनने की आवश्यकता नहीं है.

सच तो यही है कि हर व्यक्ति समष्टि की उतनी ही महत्वपूर्ण इकाई है जितना कि किसी व्यवस्था का सर्वोच्च पदाधिकारी. किसी भी व्यक्ति की महानता वास्तव में अन्य व्यक्तियों की अधमता के कारण जनित होती है. हमारी कमियाँ ही नायको को जन्मती है. एक दोषहीन समाज नायकों से भी हीन होगा. और अंत में बर्टोल्ट ब्रेख्ट का निम्नलिखित कथन सारी बातों के निचोड़ के रूप में -

"अभागा है देश जिसके नायक अनेक." (ब्लॉग लेखक द्वारा अनूदित)
"Unfortunate is the land which has many heroes." - Bertolt Brekht)

- नीरज कुमार झा

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

क्यों ?

सच को क्यों देनी होती है
परीक्षा बार-बार
क्यों रहता है सच हमेशा
संदेह के घेरे में
क्यों सहना पड़ता है शरीफों को
तकाजा शराफत का बार-बार
ईमान क्यों गला रहा कोढ़ की तरह
ईमानदार के ही जिस्म को
पढ़े-लिखों के लिये क्यों बन गयी है
पढाई बोझ की तरह
हयादारों के लिए क्यों
हया बनी हैं बेड़ियाँ
यह कैसी हवा चली है उलटी
कि आदमीयत ही खड़ी है कटघरे में
आदमी के क़त्ल के आरोप में

- नीरज कुमार झा