विगत की समझ और समझदारियाँ विचारधाराओं के रूप में हमारे बीच रहती हैं। इस संदर्भ में विचारधारा और क्रियाशील ज्ञानमीमांसा भिन्न नहीं है। सामान्य लोकयात्रियों के लिए उनके बीच प्रचलित विचारधारा ही उनका प्रश्नातीत अवलंब होती हैं। बेहतरी के नजरिए से बड़ी बात यह है कि विचारधाराएँ भी ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय अनुशीलन की मांग करती हैं और भिन्न विचारधारा पोषित इतिहासकारिताएँ (इतिहासलेखन की धाराएँ) भी।
इस लघुलेख का उद्देश्य यह रेखांकित करना है कि विगत में ऐसे भी दौर आये जब इतिहास बोध विलुप्त हो गया। हर समय ऐसा भी नहीं था कि इतिहास की पुस्तकें और इतिहासकार उपलब्ध नहीं थे। वास्तव में इतिहास मात्र ज्ञान के लिए ज्ञान की विधा नहीं है, बल्कि समाज की अच्छाई के प्रति प्रतिबद्धता से जनित बोध और सक्रियता है।
नीरज कुमार झा
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