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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

इतिहास बोध और समाज

इतिहास स्मरणीय तथ्यों का संग्रहण है। स्मरणीय तथ्यों में से आधारभूत है गुणी और सुधी जनों के मानवों को पाशविकता से मानवातीयता की ओर ले जाने के लिए संघर्षों की और दुष्टों के अतिचारों की कहानियाँ। सज्जनों के संघर्ष प्राकृतिक प्रतिकूलता तथा मनुष्य की अमानवीय प्रवृत्तियों के विरूद्ध रही हैं। ये कथाएँ और गाथाएँ हमें सूचित करती हैं कि किन-किन प्रकार के विचारों, किन-किन अभियानों और किन-किन प्रयासों ने मानवता का हित किया है और किन-किन ने अहित। अच्छाई को कैसे बचाया और बढ़ाया जाए और बुराई को कैसे रोका जाए या कम किया जाए, इसको जानने के लिए जिया हुआ अनुभव सबसे प्रामाणिक पैमाना है। इस संदर्भ में तर्क और भावना भरोसे लायक नहीं हैं। इतिहास की यह मौलिक उपादेयता है।
 
विगत की समझ और समझदारियाँ विचारधाराओं के रूप में हमारे बीच रहती हैं। इस संदर्भ में विचारधारा और क्रियाशील ज्ञानमीमांसा भिन्न नहीं है। सामान्य लोकयात्रियों के लिए उनके बीच प्रचलित विचारधारा ही उनका प्रश्नातीत अवलंब होती हैं। बेहतरी के नजरिए से बड़ी बात यह है कि विचारधाराएँ भी ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय अनुशीलन की मांग करती हैं और भिन्न विचारधारा पोषित इतिहासकारिताएँ  (इतिहासलेखन की धाराएँ) भी।  
 
इस लघुलेख का उद्देश्य यह रेखांकित करना है कि विगत में ऐसे भी दौर आये जब इतिहास बोध विलुप्त हो गया। हर समय ऐसा भी नहीं था कि इतिहास की पुस्तकें और इतिहासकार उपलब्ध नहीं थे। वास्तव में इतिहास मात्र ज्ञान के लिए ज्ञान की विधा नहीं है, बल्कि समाज की अच्छाई के प्रति प्रतिबद्धता से जनित बोध और सक्रियता है।
 
नीरज कुमार झा

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