पृष्ठ

बीजलेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बीजलेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 2 दिसंबर 2024

दर्शन की परख

मैं प्रस्तुत बीजलेख में दर्शन को इस तरह परिभाषित करता हूँ : दर्शन होने के अर्थ और उद्देश्य को नियत करने हेतु व्यवस्थित विचार है।

दर्शन का प्रभाव सकारात्मकअथवा नकारात्मक हो सकता है, या इसका कोई प्रभाव नहीं हो सकता है। यह बीजलेख निष्प्रभावी दर्शन को लेकर नहीं है।

दर्शन की प्रकृति जानने हेतु परीक्षण की यह युक्ति अपनायी जा सकती है: यह देखा जाए कि इसकी उत्पति भयजनित है अथवा संभावनालक्षित। दूसरा, यह मानवों को साधन मानता है या साध्य। तीसरा, यह लक्ष्यानुरूप मानवजीवन के संगठन की योजना निरूपित करता है या मानवजीवन को आधारित कर लक्ष्य निर्धारित करता है।

विश्व इतिहास को दृष्टिगत करने पर प्रभावोत्पादकता को लेकर इस परीक्षण की उपादेयता स्पष्ट हो सकती है।

नीरज कुमार झा

शनिवार, 30 नवंबर 2024

जनतांत्रिक सभ्यता

​भारतीय लोकतंत्र की जड़ें इसके सभ्यतागत मूल्यों और लोकाचरण में है। इस सभ्यता में वैयक्तिक अस्मिता, वैचारिक व सांस्कृतिक विविधता, और ऐहिकता की मर्यादा की मान्यता सदैव बनी रही है। भारत सभ्यता राष्ट्र-राज्य  ही नहीं, सभ्यता जनतंत्र भी है।

वैश्विक स्तर पर जनतंत्र का उदय और प्रसार, जिसका भारत भी हिस्सा है, का संबंध हालाँकि आधुनिकता के विकास से है, जिसकी उत्पति पाश्चात्य सभ्यता में हुई। लेकिन, जनतंत्र यूरोप में वहाँ की सभ्यता के मूल्यों और लोकाचरण के प्रतिवाद के रूप में विजयी हुआ था और यूरोपीय परंपरा का वाद उस कारण से सीमित हो गया। ऊपर से, यह दीर्घकालिक, या कहें तो, युगीन हिंसात्मक संघर्षों के बाद ही संभव हुआ।

आज भी जब विश्व में जनतंत्र की व्याप्ति सीमित ही है, भारत में जनतंत्र की स्वीकार्यता लगभग स्वाभाविक रही। इस संदर्भ में इस बीजलेख का उद्देश्य यह रेखांकित करना है कि जनतंत्र किसी भी कालखंड की स्थिति नहीं, बल्कि उसकी उपलब्धि है। जनतंत्र हर पीढ़ी से सचेतन प्रयासों की मांग करता है। हमें अपनी इस सभ्यता के प्रसाद को निरंतर परिष्कृत करना है। दूसरा जुड़ा अहम लक्ष्य विश्व और विश्व व्यवस्था को जनतांत्रिक बनाना है। सर्वजन को जनतंत्र की गरिमा से युक्त करना भारत का ही दायित्व हो सकता है।

नीरज कुमार झा