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सोमवार, 2 दिसंबर 2024

दर्शन की परख

मैं प्रस्तुत बीजलेख में दर्शन को इस तरह परिभाषित करता हूँ : दर्शन होने के अर्थ और उद्देश्य को नियत करने हेतु व्यवस्थित विचार है।

दर्शन का प्रभाव सकारात्मकअथवा नकारात्मक हो सकता है, या इसका कोई प्रभाव नहीं हो सकता है। यह बीजलेख निष्प्रभावी दर्शन को लेकर नहीं है।

दर्शन की प्रकृति जानने हेतु परीक्षण की यह युक्ति अपनायी जा सकती है: यह देखा जाए कि इसकी उत्पति भयजनित है अथवा संभावनालक्षित। दूसरा, यह मानवों को साधन मानता है या साध्य। तीसरा, यह लक्ष्यानुरूप मानवजीवन के संगठन की योजना निरूपित करता है या मानवजीवन को आधारित कर लक्ष्य निर्धारित करता है।

विश्व इतिहास को दृष्टिगत करने पर प्रभावोत्पादकता को लेकर इस परीक्षण की उपादेयता स्पष्ट हो सकती है।

नीरज कुमार झा

रविवार, 1 दिसंबर 2024

दर्शन और समाज

मेरा यह विश्वास समय के साथ दृढ़ होता जा रहा है कि किसी भी सभ्यता अथवा राष्ट्र की स्थिति, उत्कर्ष, अथवा अपकर्ष का प्रधान निर्धारक समुदाय में क्रियाशील विचारधारा होती है। हर समुदाय की एक प्रधान विचारधारा होती है जिसमें परंपरा, आंदोलन अथवा आरोपण का योग होता है।

किसी जनपद की भौतिक परिस्थितियों का प्रभाव वहाँ की विचारधारा पर हो सकता है लेकिन ये विचारधारा के निर्धारक नहीं होते हैं। ऐसे मानव होते हैं जिनकी बौद्धिक क्षमता और ऊर्जा उनके द्वारा लक्षित समुदाय की नियति बदल देती है और जिनका प्रभाव पूरी मानवता अथवा इसके बड़े हिस्से पर पड़ता है।

विचारधारा का प्रधान निर्धारक वास्तव में दर्शन है। इस संदर्भ में दर्शन के वैश्विक इतिहास के अध्ययन की आवश्यकता है, विशेषकर उनसे उत्पन्न प्रणालियों की और उनके प्रभावों और दुष्प्रभावों की।

प्रत्येक समाज को उत्कर्ष हेतु और अपकर्ष से रक्षार्थ दार्शनिकों की आवश्यकता होती है। आज कृत्रिम बुद्धि के दौर में सक्षम प्राकृतिक बुद्धि के पोषण की आवश्यकता और बढ़ गयी है।

दर्शन और दार्शनिकों का पोषण अपने-आप में पर्याप्त नहीं है। समाज को निःशंक दार्शनिकों से कठिन प्रश्न करने  चाहिए। यह दार्शनिकों और समाज के हित में है कि लोग अपने अनुभवों के आधार पर दार्शनिकता का गहन परीक्षण करें। उनसे मांग करें कि वे ऐसी बातें भी करें जो व्यावहारिक और बोधगम्य हों ।

नीरज कुमार झा

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024

दर्शन और प्रदर्शन

दर्शन को मात्र ज्ञान की विशिष्ट विधा मानना यथार्थ नहीं है। दर्शन हर व्यक्ति के जीवन का अविभाज्य आयाम है। मानव बिना जीवन दर्शन के नहीं हो सकता है। मानवीयता की आवश्यकता दर्शन को लेकर जाग्रत चेतना है।

इस संदर्भ में यह रेखांकित करने का प्रयास किया गया है कि सामान्य जन में प्रदर्शन के और उसमें निहित दर्शन को दृष्टिगत करने की क्षमता हो। प्रदर्शन के माध्यम से अनेक अमंगलकर विचार समाज के अभिकरण के चालक मूल्यों में प्रविष्ट करा दिए जाते हैं।

नीरज कुमार झा

शुक्रवार, 8 मार्च 2024

दार्शनिक

जन अथवा समाज मंगल  गंभीर और जनहितैषी दार्शनिकों की उपस्थिति की मांग करता है। 

हालाँकि दर्शन के साथ गंभीर और जनहितैषी विशेषण अनावश्यक हैं, लेकिन दर्शन के नाम से जो चलन में रहता है, उसको लेकर सचेत करने के लिए  यहाँ इन विशेषणों का प्रयोग किया गया है। 

गंभीर इसलिए कि एक तथाकथित दार्शनिक हवाई किले बनाने वाला हो सकता है; बिना इतिहास बोध, समाज और मानवीय प्रकृति की समझ के वह निरर्थक स्वप्नों का द्रष्टा और प्रसारक हो सकता है। ऐसे दार्शनिक बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और समाज अपनी तमाम विसंगतियों के साथ यथास्थिति में रहता है। किसी भी साधन-संपन्न संप्रभु देश में विपन्नता की विद्यमानता इस तरह की कुबुद्धि के आधिक्य का ही प्रमाण है। 

दूसरा कि अनेक आधिकारिक विद्वान द्वारा बाह्य संस्कृति से उत्पन्न विचारधाराओं को स्वयं के परिवेश में अनुकूलन की क्षमता की बिना परख किए उसके आरोपण की पैरोकारी करते हैं। यहाँ तक कि जहाँ से उनका आयात किया गया है, वहाँ भी उसे स्वीकार नहीं किया गया हो। ऐसे विद्वानों को भी दार्शनिक की श्रेणी में रखा जाता है। विदेशीकृत विद्वान अपनी गठरी में संग्रहीत सामग्रियों को लेकर उलझन का प्रदर्शन कर भी इस श्रेणी में स्थान पा लेते हैं। 

जनहितैषी इसलिए कि दर्शन संज्ञा का दुरुपयोग होता है। कोई व्यक्ति अस्तित्व के अज्ञेय पक्षों को लेकर भय  और  मानवीय मानसिकता में अंतर्निहित दुर्बलताओं को आधार बनाकार  शब्दाडंबर अथवा भाषाई जाल के माध्यम से लोगों को भ्रमित कर सकता है। मानव इतिहास में मानव निर्मित त्रासदियों की भरमार ऐसे ही विकृत बुद्धिप्रयोगों का दुष्परिणाम रहा है। 

दर्शन और विज्ञान में अंतर है। दर्शन की प्रकृति समग्रता मूलक अथवा व्यापक दृष्टि है। इस दृष्टि की व्यापकता अज्ञेय और ज्ञेय का भी मेल कराती है। इसका बिन्दु संकेन्द्रण भी व्यापक दृष्टि का ही सघन संकुचन है। यह जीवन को अर्थयुक्त बनाती है। विज्ञान प्रधानतया एकलता से व्यापकता की ओर जाता है और इसकी मूल प्रकृति संकेन्द्रण की है। 

दर्शन मानव जीवन का विज्ञान की तुलना में अधिक सशक्त मार्गदर्शक है।  दर्शन विज्ञान को अधिगृहीत रखता है। विज्ञान की स्थिति दर्शन सेवी की  है। 

यह दर्शन ही है जो मानव को बर्बर से सभ्य बनाता है, और दर्शन के अभाव में भौतिक तथा वैज्ञानिक साधनों से युक्त होते हुए भी  समुदाय प्रवृत्ति और आचरण से असभ्य ही बने रहते हैं। ऐसा नहीं लगता है कि मानव बिना दर्शन के हो। वास्तव में बर्बरता प्रवृत्ति होती है, जो दर्शन की जगह काम करती है।  यही प्रवृत्ति दर्शन विकृति का स्रोत और दर्शन की चुनौती है। 

भारत ने दर्शन में महती योगदान दिया है। वसुधैव कुटुंबकम, सर्वमंगल, जीवन की  विविध शैलियों का अभिनंदन, शांति  और सुबुद्धि हेतु सतत प्रार्थना इस दर्शन की अनन्य सीखें हैं। आज भारत अपनी मौलिक मेधा को जागृत कर पुनः इस नए युग में मानवहित के पोषण में भूमिका निभाए, यह अभीष्ट  है।  

नीरज कुमार झा 

रविवार, 31 दिसंबर 2017

दर्शन, दर्शनहीनता, और प्रतिदार्शनिकता

समय दर्शन - अध्ययन, अवलोकन, संवेदना और बुद्धि से युक्त दर्शन - की सक्रियता की मांग करता है. दर्शन को दर्शन और दर्शनहीनता अथवा दर्शन और प्रतिदार्शनिकता में भी अंतर स्पष्ट करना होगा क्योंकि इनमें स्वरूप का अंतर नहीं है. दर्शन को यह भी बताना होगा कि दर्शन का उद्देश्य दर्शन का प्राधिकारवाद नहीं है, बल्कि मानवीयता के प्रवाह को अबाध रखना है. दर्शन का एक महती उद्द्देश्य आसुरी तत्त्वों के प्रतिकार के लिए लोगों को  संगठित रखना भी है. एक समय दर्शन को हम इतनी ऊँचाई तक ले गए कि सारी की सारी जमीन ही खो बैठे. 

नीरज कुमार झा