शहर बसा है टुकड़ों में
टूटा शहर नहीं है
शहर बना है टूटों से
रहते भी टूटे ही टुकड़ों में
शहर की हैं परतें
शहर उधड़ रहा है
दिख रही हैं परतें
लेकिन एक जैसी नहीं
परतों में रहते हैं लोग
जीते हैं परतों में
परतदार ज़िंदगी
ख़ुद को नहीं जानते लोग
खदक रहा शहर बरसों से
लोथड़े हो गये टुकड़े
अलग हो रहीं पपड़ियाँ
लेकिन वे पिघलती नहीं
घुलती नहीं
- नीरज कुमार झा