पृष्ठ

Gender Justice लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Gender Justice लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 29 अगस्त 2010

गालियों का समाजशास्त्र

नारी मुक्ति के सरोकारी समाज में स्त्रियों के प्रति व्याप्त भेदभाव के उदहारण के रूप में इस बात का बहुधा उल्लेख करते हैं कि पुरुषों को दी जाने वाली तमाम गालियाँ स्त्रियों को लेकर दी जाती हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि समाज में, दुनियाँ के लगभग हर समुदाय में, बिरले अपवादों को छोड़कर, पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की स्थिति कमतर है लेकिन उक्त दृष्टान्त से यह  तथ्य कतई अभिप्रमाणित नहीं होता है.  समस्या की ग़लत समझ और समझ के नाम पर निरर्थक और भ्रामक जुमलेबाजियाँ समस्या को सुलझाने के बजाय उलझाती हैं.

व्याप्त धारणाओं के विपरीत सामजशास्त्रीय समझ हमें सूचित करती है कि गालियों का समाज की  कार्यशीलता में वस्तुतः सकारात्मक योगदान है. समाजशास्त्र हमें सिखाता है कि प्रत्येक सामाजिक प्रक्रिया या तथ्य के प्रकट प्रकार्य (समाज के सातत्य में योगदान की क्रिया)  के इतर उसका अप्रत्यक्ष प्रकार्य भी होता है. यह आधारभूत समाजशास्त्रीयता तत्क्षण गालियों के अप्रत्यक्ष प्रकार्य स्पष्ट कर देती है. 

समाज के स्वस्थ अस्तित्व के लिए व्यक्तियों के मध्य यौनिक संबंधों का नियमन और सीमाकरण आधारभूत है. पाशविक यौनिकता के विपरीत मानव मध्य शारीरिक संपर्क निषिद्ध, निंदनीय, वैधता आदि की श्रेणियों में विभाजित हैं. दूसरे शब्दों में, समाज ने उक्त संपर्कों का  कठोर नियमन किया हुआ है. 

इस संबंधों की सीमाओं के उल्लंघन को लेकर क़ानून के द्वारा दंड का भी प्रावधान है लेकिन उन अल्पज्ञात कानूनों से अलग सामाजिक नियमन के इस प्राथमिक व्यवस्था का ज्ञान व्यक्तियों को कैसे होता है? यहाँ यह बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि यह महत्वपूर्ण भूमिका तथाकथित और उचित रूप से कथित असभ्य जन द्वारा उच्चरित इन अपशब्दों के  द्वारा ही निष्पादित होती  हैं. दूसरी तरफ़ इस प्रकार्य की प्रभावशीलता इसके इसी स्वरूप पर निर्भर करती है. 

बात यहीं समाप्त नहीं होती है. गालियों  का  प्रकट उद्देश्य संबोधित व्यक्ति को अपमानित, आहत या उसके  पौरूष को ललकारना  होता है. साथ ही, जैसा कि स्पष्ट किया जा चुका है कि  अप्रकट रूप से इनका उद्देश्य  पुरुषत्व को सीमाबद्ध भी करना है.  गालियों के इस अप्रकट प्रकार्य की पुष्टि  दूसरे तथ्य से भी होती है. हमारे यहाँ एक परम्परा है कि संभ्रांत परिवारों की महिलाएँ भी विवाह संस्कार के दौरान उपस्थित मेहमानों को इन आपत्तिजनक शब्दों से संबोधित करती हैं. इस परम्परा का उद्देश्य भी निस्संदेह व्यक्तियों को निषिद्ध संबंधों से  अवगत कराना है. इस तरह से व्यक्ति के समाजीकरण और समाज की व्यवस्था में गालियों का योगदान आधारभूत है और इस  तथ्य को लैंगिक असमानता से जोड़ना किसी भी तरह से हमारी मदद नहीं करता है. 
- नीरज कुमार झा