ज्ञान मानव की स्वाभाविक स्थिति है। ज्ञान कोई सिद्धि नहीं, बल्कि सत्य के प्रति अनवरत निष्ठा और आत्मपरीक्षण का यत्न है। जो व्यक्ति इस प्रवृत्ति से हीन है अथवा उससे बाधित है, वह अपनी स्वाभाविक स्थिति में नहीं है। ऐसी वैयक्तिक अस्वाभाविकता का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है और उसकी भारीता भारी संकट का कारण बन जाती है।
प्रश्न उठता है: ज्ञानी कौन है? ज्ञानी वह नहीं जो स्वयं को ज्ञान का स्वामी मानता है, बल्कि वह है जो संवेदनशील है; जो दूसरों की भावनाओं, पीड़ाओं और अनुभवों को अपने भीतर अनुभव कर सकता है।
सूत्र रूप में:
ज्ञान का लक्षण संवेदना है; अज्ञान का लक्षण अहंकार।
ज्ञानसार के कतिपय कथ्य :-
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
- महा उपनिषद
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
यदा पश्यति भूतात्मा ब्रह्म संपद्यते तदा॥
- महाभारत
(जब मनुष्य सभी प्राणियों में अपने को और अपने में सभी प्राणियों को देखता है, तब वह ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।)
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
- कबीर
परहित सरिस धरम नहि भाई।
परपीड़ा सम नहि अधमाई॥
- तुलसीदास
आज के समय में उपर्युक्त बातें अत्यंत कृत्रिम या अव्यावहारिक लग सकती हैं, किन्तु इतिहासकारों और बाह्य पर्यवेक्षकों के विवरण बताते हैं कि प्राचीन भारत में यह सामान्य जीवन का यथार्थ था। तथापि, यह स्थिति स्वतः निर्मित नहीं हुई थी; इसकी स्थापना और रक्षा के लिए ज्ञानियों तथा योद्धाओं ने अनीति और अन्याय के विरुद्ध सतत संघर्ष किया था।
नीरज कुमार झा
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