धर्म अर्जन का है,
धन परहित का हेतु हो।
धर्म मन का है,
आचार संवेदना का हो।
कर्म-धर्म से भी ऊपर
कहा और जीया उन्होंने।
वह तन का धर्म है,
रोटी के लिए कम से कम
स्वयं करे मानव श्रम।
वस्त्र-आभूषण और सौष्ठव,
अपनी जगह हैं,
इनसे सब के इतर
शरीर की भी अपनी
प्रतिष्ठा है।
उसका धर्म है,
साफ-सफाई रखना
साफ-सफाई रखना
और मेहनत करना।
कहते हैं गांधीजी,
साफ-सफाई स्वयं रखो,
सेवा और उत्पादन हेतु
शरीर से उतना श्रम अवश्य करो
जितना मूल्य तुम्हारे
भोजन का हो।
बता गए हैं गांधीजी,
तन-धर्म का पालन भी
बहुत जरूरी है
सत्सभ्यता के पोषण हेतु।
नीरज कुमार झा