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रविवार, 12 मई 2024

कथाकारिता की सीमाएँ

कथारूप में जीवन का निरापद प्रतिनिधित्व लगभग असंभव है। अधिकतर कथाएँ (विशेषकर मनोरंजन उद्योग के द्वारा प्रयुक्त कथाओं की प्रकृति) एक विशेष व्यक्ति पर केंद्रित होती हैं, और अन्य  सभी जन और परिस्थितियाँ उस चरित्र की केन्द्रीयता को पोषित करती हैं। समस्त को एक व्यक्ति के हेतु निमित्त  के रूप में  निरूपण  जीवन की वास्तविकता का विरूपण है। यह कथाकार की आत्मकेंद्रीयता और  अहमन्यता की प्रवृत्ति के  प्रतिबिंबन के फलस्वरूप  और लक्षित उपभोक्ताओं के समान भावनाओं की तुष्टि के लिए होता है।  इसका दुष्परिणाम है; यह पाठकों और दर्शकों के दृष्टिकोण को संकुचित करता है। वह स्वयं को नायक में स्थित करते हुए कथा को  ग्रहण करता है और अन्य को हेतु के रूप में देखता है। इस कारण से उसमें संवेदना और अन्य के प्रति सम्मान का भाव नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है और वह हमेशा कुंठाग्रस्त रह सकता है। एक सुधी व्यक्ति  को कथाकारिता की सीमाओं की भिज्ञता रखनी चाहिए और उसे  इससे अन्य को अवगत कराना चाहिए। 

नीरज कुमार झा 

शुक्रवार, 10 मई 2024

तुम देखना कवि

तुम देखना कवि
कहीं तुम्हारा अभिव्यक्ति का कौशल
जीवन पर हावी तो नहीं हो रहा है
कहीं अहं को तुमने तो नहीं बना रखा है दसवाँ रस
और सभी रसों में उसे ही घोल रहे हो
कवि, तुम याद रखना
मूक जीवन मुखर होने
तुम्हारी तरफ देख रहा है
जो द्रव बन सींच रहे जीवन को
उन्हें स्वर तुम्हें उसी विनम्रता से देना है
तुम साथ रहो, साझेदार बनो
मानवता पुकार रही है
तुम एक हो, लेकिन अनेक से अलग नहीं
तुम्हें ही यह समझना है, तुम्हें ऐसे ही रहना है
 
नीरज कुमार झा

बुधवार, 8 मई 2024

The Job of Teachers

The formative years of people are foundational for their intellectual becoming. What they learn primarily stays with them throughout their lives and judges for them all other ideas and conditions which come later to them. They may turn opportunistic while maturing but the formative learnings inform their morality even if they may not care for that. When they speak, it comes from their basic learnings and what they do carries the weight of living conditions. The dichotomy is due to the weakness of epistemology but that is not a concern of this post. It is about the job of teachers who play a crucial role in the becoming of beings. They must cultivate the ability and strength to see through the ideas and ideologies that pervade the times and to see that the young people they work with can find their path by applying their genius. 

Niraj Kumar Jha 

सीखना

ज्ञानी होना कोई स्थिति नहीं है, यह ज्ञानार्जन की प्रवृत्ति है। यह सीखते रहने की निरन्तरता है। ज्ञानी होने का प्रधान पक्ष कुशल होना नहीं, जिज्ञासु होना है। कार्यकुशलता और विनम्रता ज्ञानवान होने के स्वाभाविक लक्षण हैं। वैसे सीखना किसी व्यक्ति के लिए प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन यह सीख परिस्थितियों से अवगत होना मात्र है। ज्ञान का संबंध परिस्थितियों की व्यापक समझ से है, जो परिस्थितियों के कारण-परिणामों के रूप में विभाजित करने और उसपर कार्य करते हुए समस्यामूलक स्थितियों का निवारण और सुधार को लेकर है। इस तरह का सीखना स्वाभाविक नहीं है, इसके लिए काफी प्रयत्न करना होता है। सीखने का कौशल प्राप्त करना प्रयास के क्रम में कभी एकाएक होता है या फिर कभी नहीं होता है।

नीरज कुमार झा

रविवार, 5 मई 2024

विकास बुद्धि

मानव प्राकृतिक रूप से विकासशील प्राणी है। जंगलों में खाद्य शृंखला की एक कड़ी के रूप में रहने वाला  मानव आज जंगल के राजा को पिंजरे में रखता है और चाँद और मंगल तक अपनी पहुँच बना चुका  है। तकनीकों का आविष्कार और प्रयोग भी मनुष्यत्व का अहम भाग है, और उसकी उन्नति का हेतु है। इस तथ्य के इतर यह सच्चाई भी है कि यदि मानव विकास नहीं करेगा तो उसका ह्रास होगा। यथास्थिति में कोई  समुदाय रह तो सकता है लेकिन जहाँ अन्य आगे बढ़ेंगे तो वह समुदाय इस जुड़ी दुनिया में पीछे रह जाएगा और उसका शोषण होगा।  मानव जाति में अभी यह परिपक्वता नहीं आई है कि जो समुदाय यदि दूसरों को बिना नकारात्मक रूप से प्रभावित किए हुए  यथास्थिति में  रहता है तो उसे  उस स्थिति में रहने दे और उसका सम्मान करे। 

किसी भी देश के लिए इस दुनिया में यह अपरिहार्य है कि वह विकासशील रहे। विकसित जैसा कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है क्योंकि यह दुनिया प्रतियोगी है और एक देश दूसरों के ऊपर वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। आदर्श स्थिति तो यह होगी कि दुनिया के लोग आपस में सहयोग करें और सभी अपने जीवन को बेहतर बनाएँ। इस स्थति में भी परिस्थितियों को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास समाप्त नहीं हो सकता है। 

विकास के लिए  जरूरी है विकासोन्मुख सोच। मानवता के विकास के इस चरण में विकसित होने की एक स्थिति देशों का  गणतंत्रात्मक होना है। इसमें देश के संचालन में नागरिकों की भूमिका आधारभूत होती है।  नागरिक राजनीतिक विषयों को समझने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, उनपर लेकर चर्चाएँ करते हैं, और अच्छे विचारों को क्रियाशील बनाने  के लिए सामूहिक रूप से सजग और प्रयासरत रहते हैं। गणतांत्रिक देशों में इस कार्य में अनेक अभिकरण भी अपना योगदान देते हैं। इसको लेकर यदि उदासीनता व्यापक है तो उस देश में यह प्रजाभाव की अवांछित निरन्तरता है। 

यह तो बिल्कुल साफ है कि नागरिक  समझ को सोर्स (विभिन्न बौद्धिक संसाधनों का उपयोग) तो करें  लेकिन आउट्सोर्स (डिब्बाबंद बौद्धिक सामग्रियों का उपयोग) नहीं करें। इसके बावजूद  नागरिक बौद्धिकता और सक्रियता अपने आप में पर्याप्त नहीं है। इसका विकास की दिशा में होना भी जरूरी है। बिना उचित परख के बौद्धिकता और सक्रियता भी पतनोन्मुख हो सकती है। स्वस्थ विचार स्वहित और सर्वहित के उचित समन्वय पर आधारित होता है। दूसरा, यह व्यक्ति के अस्तित्व और स्वायत्तता को आधारभूत दृष्टिगत करते हुए  उसकी भूमिका सामूहिक हित और पर्यावरणीय संतुलन के परिप्रेक्ष्य में निरूपित करता है। तीसरा, विकास की सोच सदैव ओपन एंडेड (खुली) होती है।यह सोच गंतव्य को लेकर नहीं बल्कि दिशा को लेकर होती है। चौथा, विचार ऐसा नहीं हो जिसके क्रियान्वयन से परिवर्तन की प्रकृति  स्वयं से आपदाकारी हो जाए।   अब मैं अपने लक्ष्य बिन्दु की ओर आता हूँ जो इस संदेश का सरोकार है। 

हमें हमारे समक्ष उपलब्ध समस्त विचारो, अवधारणाओं,  विचारधाराओं, पद्धतियों को अपनी  सोच-समझ के सहायतार्थ ही उपयोग करना चाहिए। यदि उनमें से कोई  हमारे सोच-समझ की क्षमता को नकारता है,  हमारे अस्तित्व की महत्ता का मान नहीं देता है, या हमारे अभिकरण का हरण करना चाहता है तो यह सर्वथा त्याज्य हैं। पहले वाक्य की समझ हमें दूसरे वाक्य की स्थिति से बचाती है। 

"उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।"

ऊपर मेरे द्वारा लिखी बातें मुझे अपनी शैक्षणिक प्रशिक्षण की पृष्ठभूमि में असाधारण लग रही है। आपको कैसी लगी। विमर्श का आवाहन।  

नीरज कुमार झा 

शुक्रवार, 3 मई 2024

Individualism and Communitarianism

I do not see individualism and communitarianism as contrary ideas. Rather, I see each enriching the other. Robust individualism reforms older communities and generates new communities. Individualism is about refashioning society in the spirit of egalitarianism. I do not see egalitarianism as equality, an other-worldly concept, but as a community of individuals who enjoy autonomy and freedom to choose. Invoking equality is an open invitation to authoritarianism. Nonetheless, the sad reality is that community life is declining as individualism gathers momentum. The reason is that we need to design a proper template for scripting individualism.

Niraj Kumar Jha

आँसू

पीड़ा किसे नहीं है और दुख से कौन अछूता है
सहानुभूति अधिकार सभी का, दायित्व भी  है

ऐसा नहीं हो कि कोई अपने आँसुओं को रोक ले
किसी का बहे आँसू तो कोई पोंछने वाला न मिले

मुसकाना-हँसना लोगों का खिल जाना है
इन फूलों को सींचता आँखों का आँसू है

नीरज कुमार झा