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शनिवार, 6 जून 2015

अच्छा है


धूप  का नहीं

पुतलियों की अवारगी
का बहाना है
अच्छा है
आँखों में नहीं चुभती
आँखें हैं

नीरज कुमार झा

गुरुवार, 4 जून 2015

उफनती दरिया में तैर रहे हो

उफनती दरिया में तैर रहे हो
छूटते किनारों की अनदेखी तो न करो
तूफानों में उड़ान भर रहे हो
नीचे की जमीन की याद तो रखो
झूठ से लड़ नहीं सकते
इसकी पैरोकारी तो न करो
सच की आँखों में झाँक  नहीं सकते
लेकिन इससे नफ़रत तो न करो

नीरज कुमार झा

सॉरी

मैं भूत हूँ
तुम्हारी मरी अंतरात्मा का
मेरा शरीर नहीं है
मेरा अस्तित्व नहीं है
फिर भी अँधेरी रातों में
तुम डर जाते हो
मेरी वजह से
सॉरी

नीरज कुमार झा

मत लगा तोहमत चिरागों पे

किवाड़ भले ही सूखी लकड़ी के
दहलीज़ पर दिये रखे जाते हैं
झोपड़े भले ही फूस के
चिराग से रोशन होते हैं
मत लगा तोहमत चिरागों पे
घर नहीं जला करते चिरागों से
काबू कर आग मन की
घर इसी से ख़ाक होते हैं

नीरज कुमार झा

गुरुवार, 28 मई 2015

कुछ नहीं भी महफूज़ नहीं

घर खाली था
खालीपन चुरा ले गए लोग
घर में कुछ नहीं था
फिर  भी घुस आए चोर
कुछ नहीं भी महफूज़ नहीं
कैसे-कैसे ये चोर

- नीरज कुमार झा

खोखला शंख

सुनकर मेरा नाद
मत देखो मेरी तरफ
किसी उम्मीद से  
मैं तो हूँ  शंख
बिल्कुल  खोखला
और बदनुमा भी
जिससे नहीं सज सकता तुम्हारा घर
बजता भी नहीं मैं  फूँकने  से
ध्वनित होता मैं यूँही
आवारा हवाओं के बहने से

  • नीरज कुमार झा

मंगलवार, 26 मई 2015

Please don't patronse

I exist to the limits. Limits you see in me are external to me. I am my maximal. Limits you point to and heights you direct me to are meant not to give me a boost but to belittle me. Hegemonies are crafted by making others feel deficient. I may need you, I may need you very badly too as I am not smart enough to face a wretched system, but who doesn’t? Care and share, if you can and without gloating, but please don’t patronise. (This is not my feeling per se but is the feeling a typical person may have or should have.)