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शनिवार, 9 जून 2012

"सबसे प्रेम करो, कुछ पर भरोसा करो और किसी का बुरा न करो।”



"सबसे प्रेम करो, कुछ पर भरोसा करो और किसी का बुरा न करो।” - विलियम शेक्सपियर, नाटककार और कवि (1564-1616)
“Love all, trust a few, do wrong to none.” - William Shakespeare, playwright and poet (1564-1616)



शेक्सपियर के कथन का तीसरा हिस्सा, किसी का बुरा ना करो, हमारी सभ्यतामूलक आचरण की अन्तर्निहित विशेषता है। 'जो तोको काँटा बोए ताहि बोए तू फूल' का सन्देश यदि पूरी तरह से नहीं तो कम से कम आंशिक रूप से तो निश्चित तौर से अधिकांश लोगों के आचरण की विशेषता है । लोग अकारण किसी का बुरा नहीं करते हैं। 'सबसे प्रेम करो' की प्रवृत्ति कठिन है। सबसे प्रेम की भावना प्रबोध की पराकाष्ठा  है। इसलिए रहिमन ने कहा है कि ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए। ऐसी भावना महान संतों में ही पाई जाती है। उदाहरण के लिए मैं महात्मा गांधी, मदर टेरेसा तथा बाबा आमटे का नाम लेना चाहूंगा। इस तरह का आचरण हालांकि जितना कठिन है उतना ही अनुकरणीय है। शेक्सपियर के उक्त कथन के मध्य हिस्से से मैं सहमत नहीं हूँ। मेरा यह मानना है कि हर व्यक्ति मानवीयता से नैसर्गिक रूप से युक है तथा प्रत्येक व्यक्ति भरोसे के काबिल है । किसी पर भरोसा नहीं करना व्यक्ति की मानवीयता की अवमानना है तथा स्वयं की मानवीयता के प्रति अविश्वास है। शेक्सपियर के इस वाक्यांश से पाश्चात्य सभ्यता की चतुराई झलकती है। भरोसा नहीं करने से भरोसे लायक लोगों की संख्या ही घटेगी। हमारा आचरण तो यही है कि हम धोखा खाकर भी भरोसा करते हैं और किसी भी व्यक्ति से बार बार धोखा खाकर भी हमने उस पर भरोसा नहीं छोड़ा है।आदमी होने के नाते उसके अंदर थोड़ी बहुत आदमीयत तो होगी ही, मुझे उस हिस्से को बेसहारा छोड़ना गवारा नहीं है। हमें उस साधु का आचरण ही भाता है जो बिच्छू से बार-बार डसे जाने के बाद भी उसे बचाता है। हमारी वरीयता हमारी साधुता होनी चाहिए न की सामने वाली की दुष्टता। हमारी मौलिक प्रवृत्ति यदि परिवेश से प्रभावित हो जाती है तो स्वाभाविक है की वह हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं है।



- नीरज कुमार झा