पृष्ठ

सामाजिकता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सामाजिकता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 17 मार्च 2024

सामाजिकता

सामाजिकता का ह्रास आज की कटु सच्चाई है। सामान्य समझ यह है कि इसका कारण मोबाईल और इंटरनेट है। लोग ऐसा मानते हैं कि सामाजिकता की जगह ऑनलाइन संलिप्तता ने ले ली है। यह प्रगट कारण है लेकिन मूलभूत नहीं। यह मेरी सोच है और एक परिकल्पना है। इसपर गंभीर चिंतन और शोध की आवश्यकता है।
 
स्‍कैन्‌डिनेव़िअन देशों में सामाजिकता अत्यंत न्यून है। वहाँ व्यक्ति हेतु सुरक्षा और सुविधाएँ बहुत ही अच्छी हैं। वहाँ लोगों को एक-दूसरे की जरूरत ही नहीं है जैसा कि सार्वजनिक अभिकरण उनकी हर जरूरत को बखूबी पूरा करते हैं। इन देशों में लोग सम्पन्न हैं और उनका जीवन निरापद है। लेकिन मेरा मानना है कि सामाजिकता का अभाव इस स्थिति में भी आदर्श नहीं है। व्यक्ति एकाकीपन में जीवन की सार्थकता प्राप्त करे, अस्वाभाविक प्रतीत होता है।

भारत के वर्तमान दौर में सामाजिकता को सघन, स्वस्थ और सुखद बनाने की आवश्यकता है। इसकी कमी के कारणों और इसमें विस्तार हेतु उपायों को लेकर व्यापक विमर्श होना चाहिए। मैं इस विषय (स्थिति, कारण, और समाधान) पर अपने विचारों को क्रमशः लिखता रहूँगा। मित्रों से आग्रह है कि इस विषय पर विचार करें और उन्हें साझा करें।

नीरज कुमार झा

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

सामाजिकता के आधार

सामाजिकता के आधारों को लेकर विमर्श अल्प है लेकिन यहआवश्यक है। आधारभूत रूप से यह मानव की जैविक प्रकृति की उत्पति है। दूसरे छोर पर इसका कारक मानवजीवन के पारलौकिक लक्ष्य को लेकर मान्यताएँ हैं । दोनों छोरों के बीच, जन्म और मृत्यु के मध्यकाल में, सामाजिकता के प्रधान कारकों में अभाव और असुरक्षा हैं। सामाजिक उत्कृष्टता हेतु इन नकारात्मकताओं को न्यून करने और कला, साहित्य, क्रीड़ा, स्वास्थ्य, ज्ञान-विज्ञान और पर्यटन को लेकर सहकार की प्रधानता का मार्ग प्रशस्त करने की आवश्यकताएँ है। इसके लिए सामान्य जन की सुरक्षा सुनिश्चित और संपन्नता के पथ को निष्कंटक करना होगा।

नीरज कुमार झा