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बुधवार, 30 दिसंबर 2015

समकालीन परिदृश्य में शिक्षा एवं शिक्षक : विचारार्थ कतिपय बिंदु



प्राचीन भारत निश्चित रूप से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में समकालीन विश्व में अग्रणी था। मानव सभ्यता के विकास में भारतीय मनीषा का आधारभूत योगदान है। आज स्थिति हालांकि भिन्न है। भारत स्वतंत्रता के लगभग सात दशकों के बाद भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में अपना अभीष्ट स्थान सुनिश्चित नहीं कर पाया है। आज तक, स्वतंत्रता के लगभग सात दशक के बाद भी, विश्व के शीर्ष विश्वविद्यालयों के गुणानुक्रम में भारतीय विश्वविद्यालय स्थान नहीं पा सके हैं। यह स्थिति विडंबनात्मक है क्योंकि भारतीय मेधा का लोहा दुनियाँ मानती है। इस विडंबना की जड़ें गहरी हैं। बाह्य आक्रान्ताओं से पराजय और तत्पश्चात् अधीनता की लम्बी कालावधि में भारत में शिक्षा का पराभव होना तय था और वैसा हुआ भी। पराभव के दौर में ही, ऐसा रेखांकित करना सर्वथा प्रासंगिक है कि, उस प्राच्य शिक्षा परम्परा की अदम्य शक्ति भी सिद्ध हुई। लगभग एक सहस्राब्दी की दासता और दमन के बावजूद भारतीय संस्कृति और सभ्यता की अस्मिता अक्षुण्ण रही। ऐसा पूरे विश्व में कहीं संभव नहीं हुआ था। आज वैश्विक महाक्रांति के इस दौर में चुनौती यह नहीं है कि भारत विश्व के समक्ष अपनी शिक्षा व्यवस्था की स्तरीयता सिद्ध करे बल्कि यह है कि यह स्वयं सहित पूरे विश्व को संक्रमण के इस दौर में मार्गदर्शन करे। यह तय है कि इस लक्ष्य के निमित्त प्रयास को सफल बनाने में शिक्षा की भूमिका आधारभूत होगी। आलेख में समकालीन परिदृश्य को दृष्टिगत करते हुए भारतीय शिक्षा और शिक्षक की स्थिति को लेकर विचारार्थ कतिपय बिंदु प्रस्तावित हैं। 

आज भारत को विश्व की जरूरत से ज़्यादा विश्व को भारत की जरूरत है। भारत का दर्शन ही विश्व को सभ्यताओं के संघर्ष, जातीय विद्वेष, पारिस्थीतिकीय असंतुलन, आसुरी रक्तपात तथा आत्मघाती संताप के प्रकोप से बचा सकता है। यह भी तय है कि भारत विश्व के बौद्धिक नेतृत्व की अपनी स्वाभाविक भूमिका के सम्यक् निर्वहन के द्वारा ही अंतरराष्ट्रीय जगत में भारतीय सभ्यता को चुनौती देने वाली ताक़तों को परास्त कर सकेगा। वैश्विक नेतृत्व के स्वाभाविक और नैतिक दायित्व के निर्वहन हेतु भारत को पहले स्वयं तैयार होना होगा। भौतिक विपन्नता, सांस्कृतिक क्षरण तथा बौद्धिक विकलता के साथ इस तरह की भूमिका के प्रयास हास्यास्पद ही होंगे। ऐसी स्थिति स्वतः सिद्ध होगी यदि राष्ट्र संपत्ति, संस्कृति और बौद्धिक रूप से उत्कृष्टता के शिखर पर हो। यहाँ यह तथ्य रेखांकित करना आवश्यक है कि भारत का उत्थान सभ्यता का उत्थान है न कि बर्बरता का परिमार्जन है। भारत को अपना वैश्विक नेतृत्व सुनिश्चित करने के लिए आतंरिक तौर से सुसंगठित होना होगा। भारत को शक्ति, संपत्ति और संस्कृति के दृष्टिकोण से वैश्विक धुरी बनना होगा। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था ही आधार हो सकती है। ज्ञान किसी भी योजना का आधार है। ज्ञान ही श्रेष्ठता का साधन है और साध्य भी। मानव प्रकृति की विशिष्टता उसके ज्ञान बोध की क्षमता है।

राष्ट्र पुनरुत्थान के अभियान की सफलता शिक्षा के साथ ही शिक्षकों को केंद्र में रखे बिना संभव नहीं है। उत्कृष्टता की सामाजिकता राष्ट्रोद्भव की आधाररभूमि है और ऐसी सामाजिकता शिक्षकों के नेतृत्व की मांग करती है। गुरुओं की प्रभुता ने ही प्राचीन भारत को विश्वगुरु बनाया था। यदि भारत अपनी पुरातन सभ्यता के बल, वैभव और गौरव के अनुरूप पुनर्स्थापित होना चाहता है तो उसे निश्चित रूप से शिक्षा और शिक्षकों को इस अभियान के केंद्र में लाना होगा। आज स्थिति यह है कि भारत में शिक्षा और शिक्षक परिस्थितियों को प्रभावित करने के स्थान पर स्वयं परिस्थितियों के दास बने हुए हैं। शिक्षा व्यवस्था की स्थिति राजनैतिक और आर्थिक तंत्र के संयंत्र की तरह है। परिणामतः विडम्बना यह उत्पन्न हो रही है कि आज सभी शिक्षकों को ही शिक्षित करने में लगे हुए हैं। इस विडम्बना की जड़ें भारत के दासता के इतिहास में है। विदेशी दासता के दौर में भारतीय सभ्यता की प्रभुसत्ता विच्छिन्न हो गयी, जिसका अति नकारात्मक प्रभाव यहाँ की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ा। समस्त गुरुकुल हीनता के भाव से ग्रस्त हो गए। आंग्ल शासन के दौर में उस पुरातन व्यवस्था को समूल ही नष्ट कर दिया गया और आधुनिक शिक्षा के नाम पर समस्त शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों को उपनिवेश के औचित्य सिद्धि का उपकरण बना दिया गया। स्वतंत्रता अभियान के दौर से ही अपना प्रभाव प्रबल कर रहे वामपंथ ने बाकी कसर पूरी कर दी। इसकी छाया में शिक्षकों समेत पूरी शिक्षा व्यवस्था ही भ्रमजाल में फंस गयी और शिक्षाजगत राष्ट्रोत्थान के अभियान को तिलांजलि देकर एक घातक निरर्थकता में लिप्त हो गया। इस स्थिति का परिणाम स्पष्ट दृष्टिगोचर है। भारत अपनी सभ्यता में अन्तर्निहित उत्कृष्टता को जीवंत करने के बजाय भौतिक और बौद्धिक विपन्नता के साथ आतंरिक कलहों में ही उलझा रहा है और साथ ही देश वैश्विक सभ्यता को नेतृत्व प्रदान करने के स्थान पर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के कुचक्र में फंसा रहा है। 

इस तथ्य को पूरी गंभीरता से समझना होगा कि शिक्षा व्यवस्था पर संकेंद्रण की आवश्यकता विशेषकर समकालीन परिस्थितियों में अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। पहली परिस्थिति देश में जनतंत्र की गहरी होती जड़े हैं। देश में सापेक्षिक विकास तथा जन जागरूकता के कारण राजनीति में रुचि और भागीदारी पूर्व की तुलना में अत्यंत व्यापक हो चुकी है। सोशल मीडिया के द्वारा लोकमत का प्रभाव बहुत ही बढ़ा है। जनतंत्र का निरंतर विस्तार और गहन होते जाना देश की राजनीतिक विकास का प्रमाण है लेकिन यह देश के समक्ष एक बड़ी चुनौती भी है। जनमत की बृहत्तर भूमिका जन संस्कृति की श्रेष्ठता के बिना लोकतंत्र के लिए अनिष्टकर ही सिद्ध होगी। ऐसी स्थिति में देश को एक बौद्धिक समाज में बदलने की आवश्यकता है। लोकमत में अज्ञान और पूर्वग्रह का विलोप एक स्वस्थ और विकासशील जनतंत्र की प्राथमिक आवश्यकता है। 

भारत में व्यापक निरक्षरता तथा निर्धनता के उपरांत भी जनतंत्र की सफलता अधिकतर विशेषज्ञों के लिए एक अबूझ पहेली है। कुछ तथाकथित विद्वान इसका श्रेय ब्रिटिश उपनिवेशवाद को भी देते हैं जो सर्वथा आधारहीन है। यदि ऐसा होता तो पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कॉमनवेल्थ के सभी देश जनतंत्र होते। वास्तव में भारत में जनतंत्र की जड़ें भारत की पुरातन सभ्यता में है। उस प्राचीन सभ्यता में अन्तर्निहित उत्कृष्टता का पूर्ण प्रस्फुटन शिक्षा की सार्वजनीन व्यापकता और श्रेष्ठता के द्वारा ही हो सकता है। यदि यह स्थिति फलीभूत होती है तो एक विकारहीन जनतंत्र भारत में स्थापित होगा जो समस्त मानवता के लिए प्रतिमान होगा। 

जनतंत्र से जुड़ा मुद्दा आर्थिक उन्नति का भी है। स्वशासन विपत्ति का नहीं बल्कि संपत्ति का हेतु है। यदि जनतंत्र आर्थिक उन्नति में बाधक है, विपन्नता की पोषक है, तो यह समझना होगा कि ऐसी व्यवस्था जनतंत्र न होकर जनतंत्र का छद्म है। यह तथ्य रेखांकित करना भी समीचीन होगा कि आर्थिक दृष्टिकोण से सबसे महत्वपूर्ण सम्पदा मानव पूँजी है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति में संस्कार, कौशल और मेधा का निवेश ही आर्थिक उन्नति का आधार है। दूसरे शब्दों में शिक्षा व्यवस्था जनतंत्र का प्राथमिक सरोकार है। 

विशेषकर वर्त्तमान वैश्विक स्थिति में शिक्षा का मुद्दा बेहद नाजुक हो चुका है। संक्रमण के इस दौर में जबकि स्थापित मान्यताएँ टूट रही हैं और मानदंडों को लेकर भारी भ्रम है, उस समय शिक्षा को लेकर किसी तरह की लापरवाही सांस्कृतिक आत्मघात से कम सिद्ध नहीं होगी। यह समय है कि समस्त समाज, विद्वत वर्ग और शिक्षा जगत साथ मिलकर सुसंगठित रूप से शिक्षाव्यवस्था में अभीष्ट परिवर्तन के लिए कार्यशील हो। आज समाज में जीवंत आदर्शों की जरूरत है जो समाज को भटकाव के तमाम राहों से सुरक्षित निकालते हुए एक शिष्ट और सम्यक जीवन प्रणाली की और प्रवृत्त कर सके। ऐसी स्थिति बलपूर्वक नहीं लाई जा सकती है । यह मार्ग शिक्षक वर्ग आपने आचरण से प्रशस्त करेगा। इसके लिए आवश्यक है कि समाज अपना अधिकतम संसाधन शिक्षा में निवेशित करे, श्रेष्ठ प्रतिभाओं को इस क्षेत्र में लाए और पूरी निष्ठा के साथ शिक्षा व्यवस्था के पीछे खड़ा हो। नहीं भूलना चाहिए कि समाज, राष्ट्र और मानवता के मूल्य विद्यापीठों में निर्मित और धारित होते हैं। प्रश्न है कि समाज की मेधा और ऊर्जा को किस तरह से शिक्षा व्यवस्था के परिष्कार हेतु प्रवृत्त किया जाए । कहना अनावश्यक है कि शिक्षा की व्यवस्था सरकार का पारिभाषिक दायित्व है। शासन के स्थानीय, प्रांतीय और केंद्रीय, प्रत्येक स्तर पर इस दायित्व के सम्यक् और उत्कृष्ट निर्वहन हेतु उत्साहपूर्ण निष्ठा होनी चाहिए। यह भी जरूरी है कि प्रत्येक स्तर की सरकार शिक्षा को अपना सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य समझे और इस मद पर राजकोष का सर्वाधिक धन व्यय करे। 

यह तथ्य तो निर्विवाद है कि शिक्षा की व्यवस्था सरकार के अस्तित्व का प्रधान ध्येय है लेकिन इस में भी कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि यह मात्र सरकार का दायित्व नहीं है। नागरिक समाज और निजी प्रयासों की भूमिका इस क्षेत्र में समान रूप से वांछित है। पारमार्थिक संगठन इस क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं और देश की शिक्षा के विकास में महती भूमिका निभा रहे हैं। आज हालांकि विचारणीय प्रश्न यह है कि भारत के निजी उपक्रम, जो वैश्विक स्तर पर भारतीय उद्यम के शक्ति को बहुत थोड़े समय में प्रतिष्ठापित कर चुके हैं, को कैसे शिक्षा के विकास से जोड़ा जाए। यह भी आवश्यक कि शिक्षा संस्थानों को सहकारिता के माध्यम से भी चलाया जाए । दूसरे शब्दों में शिक्षा को सहकारी क्षेत्र में भी लाया जाए।  

समकालीन युग वैश्वीकरण का युग है। विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक तथा विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र और एक प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की विश्व में वृहत्तर भूमिका की आवश्यकता है। यह भारत के शक्ति संवर्द्धन और आर्थिक उन्नति के लिए भी अपरिहार्य है। भारत के इस लक्ष्य की प्राप्ति के निमित्त उच्चतर शिक्षा में गुणात्मक सुधार, विस्तार और इसका अंतरराष्ट्रीयकरण सर्वाधिक प्रभावी माध्यम हो सकता है। उच्चतर शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण से भारतीयों के अंतरराष्ट्रीय समझ और संपर्क में बढ़ोतरी होगी। विश्व के अन्य विकसित देशों के साथ चलने के लिए भी उच्चशिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीयता शिक्षा प्रणाली में सुधार का प्रधान ध्येय होना चाहिए। अत्यंत तोष का विषय है कि भारत सरकार उच्चतर शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की पक्षधर है और इस दिशा में अग्रसर है। सरकार ने नीति आयोग को विदेशी विद्यालयों के द्वारा भारत में परिसर स्थापित करें हेतु दिशानिर्देश तैयार करने को कहा है । 

प्राचीन भारत समकालीन विश्व में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी था। मध्यकालीन विदेशी दासता के दौर में भारत ज्ञान-गवेषणा के क्षेत्र में पिछड़ गया और दासता भारतीय मानस पर प्रभावी होने लगी। आज समय आ गया है कि भारत विश्वगुरु की अपनी भूमिका को पुनर्जीवित करे और विश्व का अपनी समस्याओं से त्राण पाने में मार्गदर्शन करे। इस उद्देश्य से भी भारत की शिक्षा व्यवस्था का अंतरराष्ट्रीयकरण आवश्यक है। यहाँ यह तथ्य उल्लेखनीय है कि यदि भारत सनातन परम्परा में अन्तर्निहित मानवीयता के श्रेष्ठतम मूल्यों को विश्वपटल पर प्रतिष्ठापित करना चाहता है तो उसे स्वयं की उपस्थिति और प्रभाव को विश्वव्यापी बनाना होगा। आज का युग ज्ञान का युग है, व्यापक विचार विनिमय का युग है। इस दौर में भारत के विश्वबंधुत्व का सन्देश सर्वत्र अपनी जगह बना सकता है। भारतीय राष्ट्र की उद्दात्त भावना अन्य जनों को उनकी संकीर्ण राष्ट्रीयता की दायरे से बाहर ला सकती है। 


इस लक्ष्य की व्यापक प्राप्ति के लिए अनेक तरह के उपाय अपनाए जा सकते हैं। पहला यह होना चाहिए कि भारत के सभी विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय हों। भारत के प्रत्येक विश्वविद्यालय की कोशिश होनी चाहिए कि वहाँ हर महाद्वीप और अधिकतम राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व हो। इन विश्वविद्यालयों में ऐसी व्यवस्था हो कि विश्व की श्रेष्ठ प्रतिभाएँ इनमें शिक्षक, शोधार्थी और शिक्षार्थी के रूप में स्थान पाने के लिए प्रतिस्पर्द्धा करें । दूसरा, भारतीय विश्वविद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों को भिन्न देशों में अपनी शाखाएँ, परिसर या स्वतन्त्र विश्वविद्यालय खोलने की स्वतंत्रता और क्षमता होनी चाहिए। तीसरा, अन्य देशों के विश्वविद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों का भी भारत में स्वागत होना चाहिए। चौथा, देश के सभी विश्वविद्यालयों में देश और विदेश के अन्य विश्वविद्यालयों से शिक्षकों और शिक्षार्थियों के आदान-प्रदान की व्यवस्था होनी चाहिए। पाँचवा, देश के शिक्षण संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों को अध्ययन तथा प्रशिक्षण हेतु विदेशी विश्वविद्यालय भेजे जाने चाहिए। इसके साथ ही भारतीय छात्रों को विदेशों में पढ़ने के लिए प्रोत्साहन और सहायता दी जानी चाहिए। 

शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण से भारतीय छात्र सही मायने में राष्ट्रीय और वैश्विक दृष्टिकोण विकसित कर सकेंगे। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीयता समय की आवश्यकता है। वैश्वीकरण के इस युग में अर्थव्यवस्था का अंतर्राष्ट्रीयकरण अनिवार्य है। इस तरह की प्रतियोगिता में बने रहने के लिए उच्च शिक्षा का भी अंतरराष्ट्रीयकरण आवश्यक है। यह विश्व बाज़ार को समझने और वैश्विक संपर्क का आधार होगा। उदाहरण के लिए किसी अंतरराष्ट्रीय प्रबंध संस्थान के स्नातकों का अर्थव्यवस्था का ज्ञान और व्यक्तिगत संपर्क स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय होगा, जो वैश्वीकरण के युग में प्रबंधकों की सफलता का अपरिहार्य सूत्र है। आर्थिक कारणों के इतर भी इस तरह की व्यवस्था की सकारात्मकता व्यापक है। 

पूरी चर्चा का प्रधान ध्येय इस आवश्यकता को इंगित करना है कि शिक्षा और शिक्षक की भूमिका समाज और राष्ट्र के उत्थान में आधारभूत है। शिक्षा और शिक्षकों को दासता के दौर में समाज के अग्रदूत की भूमिका से अलग कर दिया गया था। आज उस स्थिति को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है।

- नीरज कुमार झा 

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

Intolerance

The debate is healthy and yet farcical. Reduced to its essence, the debate among the compatriots is like this. "The country is turning intolerant." The accused replies,"No, it's not." The fact is that data do not support the accusation and the suspects are in vehement denial but even the denial is seen as an affront. This I find healthy because even tinges of intolerance create such a brouhaha in the country. This is amazingly good when we see intolerance is genocidal elsewhere and even within the country where Hindus are non-majority, the intolerance virtually leads to their mass eviction from their own land. If you cross the borders, west or east, you will find a high level of tolerance to the worst barbarism. You go to the north, Tiananmen reminds you that rolling over of tanks on live human bodies is pleasantly tolerable.

Yet the intensity of debate is not only farcical but also counterproductive. First because it's about a non-issue largely. And secondly and more importantly the debate throws the baby out of bathwater. The baby is the rule of law. People must point to the violations of laws, and nuisance or crime must be checked and punished. Crimes are committed ultimately by individuals and they must be prosecuted without fail and unsparingly. Tragically this is not the part of the discourse because it denies the partisans the thrill of belligerence. The rule of law and criminal justice system must be the focus of debate.

In almost all parts of the country there are mafia like organised people, who cannot be spoken against. Nobody talks about them. Besides, there are many things in India, which are intolerably bad or ugly. These issues are going out of focus because of the nastiness of our public discourse. And to me the biggest lacunae is the absence of education in liberal arts. The so-called educated sections mostly have exposure to indoctrination only and their all interventions are diversionary and disruptive by default.

- Niraj Kumar Jha

शनिवार, 29 अगस्त 2015

अबंध


सबसे पहले तुम व्यक्ति हो

सबसे पहले
तुम व्यक्ति हो
तुम मानवता हो
बाद में हो तुम और कुछ
जैसे हैं सभी
तुम्हें नहीं जरूरत रक्षा की
या रक्षकों की
तुम हो ही नहीं कमज़ोर
तुम्हें सिर्फ़ ऐसा बताया गया है
यह एक षड्यंत्र है
तुम्हें सरपरस्ती में रखने के लिए
तुम्हें तुम्हारी मानवीयता से वंचित करने के लिए
वे तुम्हें हर कुछ के रूप में रखना चाहते हैं
सिवाय उसके जो तुम हो
एक व्यक्ति, एक मानव
तुम भी हो वही गीता वाली आत्मा
जिसका कुछ नहीं हो सकता
शरीर संरचना भी अलग नहीं
यह है मात्र परस्पर पूरकता
कलंक से इसका कोई सम्बन्ध नहीं
समझो
वैसा कुछ भी नहीं है
जैसा तुम्हें महसूस होता है
ये बनाए गए साचें हैं सिर्फ़  
तुम फोड़ सकती हो सारे  साचों  को
प्रार्थना है तुमसे
मत बने रहो तुम रणक्षेत्र
उठो मिट्टी से
बनो तुम अग्रिम योद्धा
अनीति-अन्याय के विरूद्ध
चल रहा आदिम संघर्ष
कर रहा है इंतजार तुम्हारा
युगों से

नीरज कुमार झा

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

Hegemony




When hunger stalks a large number, fear dominates the psyche of the sensible and hatred engulfs the intellect of the very best, it's time for demagogues, messiahs and autocrats. At the end they shall have their sway and spoils and relish their whims and fancies and you will be more miserable than ever witnessing the travesty of your own volition, but without realising.

Niraj Kumar Jha

Capitalism

Substantive freedom manifests itself as capitalism. Capitalism translates into democracy in the realm of politics. In Marxian terminology, capitalism is the base and democracy is the superstructure of freedom edifice. 
                                                             
                                                                              - Niraj Kumar Jha

बुधवार, 5 अगस्त 2015

शिक्षा में स्वायत्तता; स्थापना के उपक्रम

शिक्षा में स्वायत्तता की अभीष्टता स्वयंसिद्ध है। ज्ञान सृजन, संग्रहण और प्रसार का बंधन मुक्त होना ही मूलतया स्वतंत्रता की स्थिति और इसकी निरंतरता की शर्त है।   स्वायत्त ज्ञान विकास का भी हेतु है। ज्ञान के सतत् सृजन तथा आदान-प्रदान से ही समाज आगे बढ़ता है। धर्मसुधार आंदोलन तथा पुनर्जागरण के दौर में यूरोप में उत्पन्न वैचारिक क्रांति ही यूरोप को सभ्यता के शिखर पर ले गयी। समाज में आर्थिक उन्नति, सामाजिक सौहार्द्र तथा सांस्कृतिक उन्नयन के लिए समाज  में ज्ञान की  प्रधानता आवश्यक है।  वैश्विक स्तर पर भी शांति और सहयोग ज्ञान की संप्रभुता के द्वारा ही संभव  है। हालांकि ज्ञान का स्वरूप मानव विरोधी तथा विध्वंसात्मक भी हो सकता है। उदहारण के लिए तमाम विनाशकारी शस्त्रास्त्र विज्ञान की देन हैं लेकिन यहाँ ध्यातव्य है कि  इस तरह का विज्ञान ज्ञान के ऊपर नियंत्रण के कारण  उत्पन्न होता है। स्वायत्त ज्ञान अधिकतर लोकहितकारी ही होता है। प्राचीन भारत की सम्प्रभु ज्ञानगवेषणा अखण्डित  मानववाद की आधारशिला है। इस सन्दर्भ में वसुधैव कुटुम्बकम् (1) जैसे अनेक अवधारणाओं को रखा जा सकता है। ज्ञान की संप्रभुता के लिए शिक्षा की स्वायत्तता अपरिहार्य है।
यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि शिक्षा में स्वायत्तता की स्थापना कैसे हो? स्वायत्तता एकबारगी  मिल भी नहीं सकती। इस कारण से ज़्यादा प्रासंगिक मुद्दा यह है कि  शिक्षा में स्वायत्तता का विस्तार कैसे हो और उपलब्ध स्वायत्तता की रक्षा कैसे हो? शिक्षा की स्वायत्तता की समस्या शासन-प्रशासन तथा बाजार के नियंत्रणकारी प्रभाव से जुड़ी है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सामान्य सुझावों के इतर कतिपय आधारभूत उपायों की चर्चा यहाँ बीजरूप में की गई है। निम्न विमर्श के आधार रूप में द्विपक्षीय मान्यता यह है कि शिक्षा की स्वायत्तता के विस्तार के उपक्रम में प्रथम दायित्व शिक्षक समुदाय का ही है और उसको इसलिए अपनी भूमिका और लक्ष्य का सही संज्ञान होना चाहिए ।


(1) वसुधैव कुटुम्बकम् का प्रथम उल्लेख महोपनिषद में है, जिसका रचनाकाल ईसा पूर्व ३००० वर्ष माना गया है. नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के सामान्य सभा के अपने ऐतिहासिक सम्बोधन में वसुधैव कुटुम्बकम्  को  भारत  का दर्शन होना बताया. द  हिन्दू,  सितम्बर २८, २०१४.

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

I think ...

I think that I should also think and talk about much needed economic turnaround, cultural renaissance, intellectual surge, social equity and security. I should also share thoughts on the needs and ways of and hindrances to economic reforms, educational renovation, justice, harmony and the freest possible atmosphere for debate. I have also made this a serious issue to train and equip my mind for reflecting on complex issues. I do need to resolve that I must rise above the binary vision of the things around. I know that I don't know things and finality defies everything. The crises which torment us, must be met squarely and with force but that must not consume us as a creative, responsive and responsible people . And a fight is never to the finish. A fight always paves the way for a new beginning, a fresh engagement, which does demand some residual goodwill for our own good. I don't think that I should ever forget the abysmal poverty and indignities common folks have to bear around me. I also must not forget that I am a member of the professoriat and I don't have the privilege of flaunting my ignorance.


- Niraj Kumar Jha

शनिवार, 25 जुलाई 2015

Leftist Forces

Tragically leftist forces are regrouping in India.I have admired them and still admire them for their courage, conviction and concern for the poor. But the point is that they are positive only till the point they remain at the margins as the critique of mainstream but if they somehow become the mainstream, they are a colossal disaster. The Christian missionaries love the suffering people because they feel that by serving the wretched they are serving the God. The same is true with Leftism. They love the people in wretchedness so that they can carry out the politics of belligerence, which is their credo with lofty nomenclatures like Revolution. In fact Leftism is Christianity reborn in the age of secularisation. It is the ominous grip of Leftism, which has vitiated the capitalist development in India. Crony capitalism, the undoing of capitalism, is simply the antithesis of the prevalence of the Leftist ideology in India because it has denied legitimacy to capitalism here. I reason with responsibility that Leftism is not only akin to Christianity (the crusading one) but also to feudalism, because it lionises a class (here not a class related to property distribution but a psychological category), which is not productive, least creative and yet wishes to lord over all and sundry. The phenomenon is the resurfacing of mediaevalism in full. What we should do is to fight against the forces which are subverting capitalism rather than fighting capitalism per se. As far as my personal standing is concerned, I want dignity being bestowed on every being, not only human beings, but every living being and all the elements of nature, therefore I am a Sanatani, and want nobody to be a poor therefore I am a liberal.

- Niraj Kumar Jha

रविवार, 19 जुलाई 2015

आप बेमिसाल और लाजवाब हैं

सवाल हैं आपके
जवाब भी आपके
सवाल ऐसे
जिनके जवाब नहीं है
जवाब भी
बिना सवालों के हैं
मुकम्मल दोनों अपने-आप हैं
शख्सियत ही आपकी ऐसी है
आप ख़ुद ही सवाल हैं
जिसका जवाब नहीं है
आप जवाब भी हैं
जो किसी सवाल का नहीं है
आप टुकड़ों-टुकड़ों में
पूरे-पूरे हैं
आप बेमिसाल हैं
आप लाजवाब हैं


- नीरज कुमार झा

बुधवार, 10 जून 2015

आईने घर के सारे तोड़ डाले

आईने घर के सारे तोड़ डाले
पुरानी तस्वीरों का ही सहारा है

नीरज कुमार झा

मंगलवार, 9 जून 2015

अँधेरे कुएँ का मज़ा

मैं ही मैं हूँ
और कोई नहीं है
नीरज कुमार झा

कुछ बचा नहीं है

चिपक गए मुखौटे को उतारा है
शायद चेहरा सा कुछ बचा  नहीं है

नीरज कुमार झा

बेहाली के बोल


मैंने बन्दों में ख़ुदा देखा 
वे सच के ख़ुदा निकले 

मैं तो खुद में खोया था 
खोजकर लोग मेरे खोट गिना गए 

मैं अपनी बेअक़्ली से बेहाल 
लोग गुरुर मुझमें अक़्ल का होना बता गए 

सफ़ाई से ख़ुद से ही झूठ बोल जाना 
ऊपर वाले ये हुनर मुझे भी दे दे 

ऊपर वाले तू मुझ पे भी मेहरबानी कर दे 
थोड़ी बेईमानी, थोड़ा फ़रेब, थोड़ी चालबाज़ी मेरी फ़ितरत  कर दे 









रविवार, 7 जून 2015

आदमी हूँ ?

चिलचिलाती धूप
करकराती सर्दी
मूसलाधार बौछारों में
एक आदमी
एक तरफ़ है
दूसरी तरफ़
एक आदमी मैं  हूँ ?
एक तरफ़
एक आदमी है
भूखा
अधनंगा
बेघर
बीमारी में बिना दवा
बेनाम जिंदगी में
अनगिना मौत में
दूसरी तरफ
एक आदमी मैं हूँ ?

नीरज कुमार झा

झूठ की पौ-बारह



झूठ की पौ-बारह है
निर्वस्त्र घूम रहा
तारीफ़
उसके कपड़ों की हो रही है

नीरज कुमार झा

शनिवार, 6 जून 2015

साथ हो तो कोई बात है

ऊँचे झरोखे से झलक दिखा जाते हो 
हम भी जयकारे कर रह जाते हैं 
यह तो कोई बात नहीं हुई 
साथ हों बातें हों तो कोई बात है


नीरज कुमार झा 

अच्छा है


धूप  का नहीं

पुतलियों की अवारगी
का बहाना है
अच्छा है
आँखों में नहीं चुभती
आँखें हैं

नीरज कुमार झा

गुरुवार, 4 जून 2015

उफनती दरिया में तैर रहे हो

उफनती दरिया में तैर रहे हो
छूटते किनारों की अनदेखी तो न करो
तूफानों में उड़ान भर रहे हो
नीचे की जमीन की याद तो रखो
झूठ से लड़ नहीं सकते
इसकी पैरोकारी तो न करो
सच की आँखों में झाँक  नहीं सकते
लेकिन इससे नफ़रत तो न करो

नीरज कुमार झा

सॉरी

मैं भूत हूँ
तुम्हारी मरी अंतरात्मा का
मेरा शरीर नहीं है
मेरा अस्तित्व नहीं है
फिर भी अँधेरी रातों में
तुम डर जाते हो
मेरी वजह से
सॉरी

नीरज कुमार झा

मत लगा तोहमत चिरागों पे

किवाड़ भले ही सूखी लकड़ी के
दहलीज़ पर दिये रखे जाते हैं
झोपड़े भले ही फूस के
चिराग से रोशन होते हैं
मत लगा तोहमत चिरागों पे
घर नहीं जला करते चिरागों से
काबू कर आग मन की
घर इसी से ख़ाक होते हैं

नीरज कुमार झा

गुरुवार, 28 मई 2015

कुछ नहीं भी महफूज़ नहीं

घर खाली था
खालीपन चुरा ले गए लोग
घर में कुछ नहीं था
फिर  भी घुस आए चोर
कुछ नहीं भी महफूज़ नहीं
कैसे-कैसे ये चोर

- नीरज कुमार झा

खोखला शंख

सुनकर मेरा नाद
मत देखो मेरी तरफ
किसी उम्मीद से  
मैं तो हूँ  शंख
बिल्कुल  खोखला
और बदनुमा भी
जिससे नहीं सज सकता तुम्हारा घर
बजता भी नहीं मैं  फूँकने  से
ध्वनित होता मैं यूँही
आवारा हवाओं के बहने से

  • नीरज कुमार झा

मंगलवार, 26 मई 2015

Please don't patronse

I exist to the limits. Limits you see in me are external to me. I am my maximal. Limits you point to and heights you direct me to are meant not to give me a boost but to belittle me. Hegemonies are crafted by making others feel deficient. I may need you, I may need you very badly too as I am not smart enough to face a wretched system, but who doesn’t? Care and share, if you can and without gloating, but please don’t patronise. (This is not my feeling per se but is the feeling a typical person may have or should have.)   

रविवार, 17 मई 2015

जमीन पर खड़ा आदमी ही आदमी है आज

बड़े बनने की धुन में बड़प्पन खो रहे हैं लोग
बड़ा बनने के चक्कर में आदमी नहीं रह गए लोग
गंदगी की ढेर को ऊंचाई मान रहे  हैं लोग
विकृतियों की तुष्टि को उपलब्धि मान रहे लोग
जालसाजों की  संगत  से प्रफुल्लित हैं  लोग
अपमान हर किसी का करना मान मान रहे हैं लोग
कुत्सितता की कामयाबी के अहंकार से उन्मत्त हैं लोग
छोटा आदमी ही ज़्यादा आदमी है आज
जमीन पर खड़ा आदमी ही आदमी है आज

- नीरज कुमार झा 

मंगलवार, 5 मई 2015

Media

Indian media (mainly the electronic) has been on the firing line for quite some time, particularly in social media. This is bizarre because to me the media is not the fourth estate or the fourth pillar of democracy, but it is the mainstay of freedom and democracy. Indian media has been fighting for these for quite a long time. They fought the Brits and later all attempts of scuffling democracy in India. The beauty of all these is that they have done this under private ownerships, which have their commercial interests to guard. The journalistic profession deserves unqualified eulogy for its valiant efforts all the way and in particular I would salute the field journalists who brave a lot of hardships and risks. At the same it is also true that a large number of them are black ships and many of them lack culture. But this is so commonplace in all walks of life, applies to almost all professions in the country. The question is why is the media being singled out? First, for the reason that they are doing something and secondly and more importantly, by being the agents of freedom on the basis of the very nature of the profession, the agency is always at the target of the powers that be and people who largely find their comfort zones in the spaces of unfreedom and love to side with positions of power, find media irritating and jump on the slightest slippages of the agency. This is ironical and unfortunate that the media is tarnished as a whole. To me what should be bemoaned is the very flawed processes of our acculturation, our system of education, which is throwing out half baked individuals in every walk of life.

सोमवार, 4 मई 2015

History

History speaks through people. In their utterances,  in their articulations, and, even in their  silences, and in their actions and in their inactions history manifests itself. Particularly when an Indian opens his mouth, I can listen to the millennia gone by. History is there in our lives but not in our pedagogy. Most of our historians in place of unearthing the past have put massive load of earth on that. Incompetence (of a good number of them) combined with ideological disorientation has undone history in India. This problem combined with another pedagogical  lacunae, which makes one feel that text-books contain gospel truths and there is no scope for probing or questioning, makes education, whatever  we have, counter-productive. Result we can see - a menacing sway of ignorance. 

शनिवार, 2 मई 2015

Empire of Evil


Inside each of us, there is the seed of both good and evil. It's a constant struggle as to which one will win. And one cannot exist without the other.

Each of us has a vision of good and of evil. We have to encourage people to move towards what they think is good... Everyone has his own idea of good and evil and must choose to follow the good and fight evil as he conceives them. That would be enough to make the world a better place.

The first idea the child must acquire is that of the difference between good and evil.

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One of the gravest of crises we face is that people do not have the sense of good and evil. In our society mostly greed and  fear dominate human thought and action and in such a scenario, persons who are depraved, thuggish and swindlers are not only held in esteem but sometimes are even deified. At the root of this moral decadence are uprooted families, soulless education and debased social milieu. As a result such people abound who are very innocently devilish. To them, evil is normal. And they do not only view goodness with suspicion but also they shun it. More troublesome is that there develops an unholy alliance of those who are the worst and they gang up to suppress good at any cost, everywhere, at every layer of existence. 

Niraj Kumar Jha

शनिवार, 21 मार्च 2015

On Monologuing and Diagloguing

Monologuing has always been the trait of demagogues and charlatans. Democracy and humanism demand dialoguing. Even more democratic and feminine (as opposed to masculinism, the drive for domination of a person irrespective of her/his sex) is the sharing of ideas and feelings. Social media is amazing for advancing this dialoguing and sharing of ideas. Awakened people must be at guard against persons prisoners of their old habits who seek to pollute the space by seeking domination (psychological), and their monologuing, by their attempts of self perpetuation and patronisation while trying to dispose off ideas though mostly in the sense of appreciation. This media emerged in our times; we must be at guard against getting it hijacked by the people whose self perception is incongruent to democracy.

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

तुम ही ज्ञान हो तुम ही अंधकार हो

कोई इतना भी बड़ा नहीं हो सकता
कि तुमसे बड़ा हो जाए
कोई इतना भी छोटा नहीं हो सकता
कि तुमसे छोटा हो जाए
तुम नहीं जानते कि तुम क्या हो
तुम सब कुछ हो
और तुम कुछ भी नहीं हो
तुम ही ब्रह्माण्ड हो
तुम ही हो कण लघु
तुम ही आदि हो
तुम ही अनादि हो
तुम अंत हो
तुम ही अनंत हो
तुम ही सीमा तुम ही असीम हो
तुम ही आकार तुम ही निराकार हो
तुम ही भंगुर तुम ही सनातन हो
अस्तित्व का यह अगम अगोचर अज्ञेय विस्तार
है तुम्हारा ही विराट रूप
यह सृष्टि भी तुम ही हो
तुम्हारे ही साथ यह उत्पन्न
और तुम्हारे साथ ही हो जाएगी यह नष्ट
तुम नष्ट भी नहीं होते
तुम अजन्मा भी हो
इसलिए यह सब कुछ भी वैसा ही है
नश्वर ही शाश्वत है
शाश्वत ही नश्वर है
तुम नश्वरता में हो शाश्वत
और हो शाश्वत नश्वर भी
तुम सब कुछ समझते भी हो
और कुछ भी नहीं समझते
तुम ही ज्ञान हो तुम ही अंधकार हो

- नीरज कुमार झा

रविवार, 8 मार्च 2015

Thinking Education


The world is in great flux. The global revolution, which is under-way, would far overshadow all previous ones and even the great wars in its consequences. It would be so even if they are put together. The scope of changes is going to be so vast and deep that it cannot even be imagined at this stage. This is despite the fact that during these couple of decades the world is already changed beyond description. Stating this obvious has a context here. For us, the Indians, forming the largest democracy, the imperative is to visualise the unfolding changes and not only prepare accordingly for all these but also to lead humanity out of strife and guide them towards sustainable prosperity. But the very arena where these things can be worked out is in serious disarray. Yes, I am talking about the whole paraphernalia of education in our country. I am not competent to talk about the numbered institutions of excellence in the country but I am sure in saying that they are like few oases in the vast desert what our educational reality is. Even these few and discrete institutions do not stand global marking for excellence. At this stage not only we need to mobilise the best talents available in the country but also need to invite or hire the best minds from across the world to build up a top order of education and a benchmark for the rest of the world. This would not happen by itself or merely by appealing to powers that be, but what is needed is to make it a general public demand. This can be done if the educational institutions put up concerted efforts. This does not require extra resources or efforts; they can do this only by orienting their routine work. Through seminars, workshops, interacting with the media and by using social media and most importantly by talking to their students they can build up the momentum by which the critical issue of education for national rejuvenation becomes a national priority. The teachers from universities to preparatory schools must put their mind together for bringing the issue of education at the top of social agenda for the sake of humanity, for the sake of the country and for the sake of their fellow beings. 
- Niraj Kumar Jha