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मंगलवार, 16 जनवरी 2018

Methodological Musing(s)

The opposite of wrong as the existent wrong causes it to occur is not the right most of the times. The antithesis of wrong, most often, is another wrong, worse than the original wrong. The right, one should know, does not germinate out of the wrongs.

Niraj Kumar Jha

रविवार, 31 दिसंबर 2017

दर्शन, दर्शनहीनता, और प्रतिदार्शनिकता

समय दर्शन - अध्ययन, अवलोकन, संवेदना और बुद्धि से युक्त दर्शन - की सक्रियता की मांग करता है. दर्शन को दर्शन और दर्शनहीनता अथवा दर्शन और प्रतिदार्शनिकता में भी अंतर स्पष्ट करना होगा क्योंकि इनमें स्वरूप का अंतर नहीं है. दर्शन को यह भी बताना होगा कि दर्शन का उद्देश्य दर्शन का प्राधिकारवाद नहीं है, बल्कि मानवीयता के प्रवाह को अबाध रखना है. दर्शन का एक महती उद्द्देश्य आसुरी तत्त्वों के प्रतिकार के लिए लोगों को  संगठित रखना भी है. एक समय दर्शन को हम इतनी ऊँचाई तक ले गए कि सारी की सारी जमीन ही खो बैठे. 

नीरज कुमार झा

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

क्या ऐसा भी है?

क्या ऐसा भी है कि समाधान या विश्लेषण हेतु भी समस्याएँ निर्मित की जा रही हों? पता नहीं, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि प्रत्येक व्यक्ति पहले अपने आचरण से समस्या का कारण या निदान होता है. ऐसा भी हो सकता है कि समाधान और विश्लेषण करने वाले ही समस्याओं की निरंतरता के कारक हों. महात्मा गांधी शायद इसलिए वचन और आचरण में ऐक्य की बात करते थे.



नीरज कुमार झा

वैश्वीकरण बनाम चीनीकरण

वैश्वीकरण का घनीभूत होते जाना अपरिवर्तनीय है. समस्या यह है कि वैश्वीकरण की जगह आज विश्व का चीनीकरण हो रहा है. संतुलित वैश्वीकरण के लिए समस्त देशों की इस प्रक्रिया में विश्वास और योगदान जरूरी है. यही वैश्विक शांति और समृद्धि का रास्ता भी है. संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य विकसित पाश्चात्य देशों का वि-वैश्वीकरण की तरफ रुझान निश्चय ही लोकलुभावनवाद से प्रेरित है तथा वैश्वीकरण की प्रक्रिया में चीन को बढ़त ही दे रहा है. चीन की तीक्ष्ण शक्ति, जो नम्र और कठोर शक्ति के प्रयोग का योग है, की आंच यूरोप के लिए अब झुलसन सिद्ध हो रही है. दुनियाँ के सभी देश इस चुनौती का सामना करने का रास्ता पाने के लिए व्यग्र हैं. इस सन्दर्भ में भारतीय जनमत की अंतर्मुखी प्रवृत्ति और उदासीनता विस्मयकारी है.



नीरज कुमार झा

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

The Non-existent Coins

Why is worthlessness soaring?
The answer is so obvious, my friends!
When toil is demeaned,
Goodness is devalued,
It is only the worthlessness,
Which is left to hanker after.

When the blind pursuit of moolah,
The craving to control others, and
The exhibition of self,
Become religion,
It is the worthlessness,
Which makes the spheres.

There is nothing we can do,
Except to keep in mind
That existence means humanity;
And humanity means only
The person before you.

When you value the other,
You gain freedom from
The tyranny of nothingness.
And get rid of suffocation,
Which you may think is life.

Niraj Kumar Jha

सोमवार, 6 नवंबर 2017

... which makes us modern and civilised ...

The understanding, which makes us modern and civilised, and which the barbarians amidst us seek to destroy

We enter into the contract with ourselves in order to preserve ourselves,. The resultant entity does not own us, none of us. Rather each of us has the entity to serve each of us individually as well. The collective will is no more sacrosanct than any individual will. And none's interest can be sacrificed for the sake of any other. Any conflict between the collective and the individual will must be judged independently and with absolute parity. The exercise of paramount powers must be only on the basis of unavoidable or unalterable necessity for the sake of absolute common good. The construction of a highway is such a necessity and the land must be acquired for that. But in such cases, the person parting land must be compensated by regular royalty from the accruals from the road taxes.

Niraj Kumar Jha

शनिवार, 4 नवंबर 2017

स्वतंत्रताओं का अर्जन व अवधारण

ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥

स्वतंत्रताओं का उपलब्ध होना स्वाभाविक स्थिति नहीं है. स्वतंत्रताओं के अर्जन, विस्तार, और अवधारण के लिए निरंतर प्रयास करना होता है. इसके लिए आवश्यक है कि नागरिक विज्ञ, सुधी, और सक्रिय हों. सबसे महत्वपूर्ण है आचरण में दायित्व भाव. नितांत निजी जीवन, यहाँ तक कि मनन में भी, से लेकर सार्वजनिक जीवन तक प्रत्येक जन का आचरण दायित्वबोध से पूर्ण और गरिमामय हो. जब स्वतंत्रताओं का दुरुपयोग होता है या स्वतंत्रताओं के प्रति उपेक्षा का भाव प्रबल हो जाता है तो स्वतंत्रताओं का क्षरण रोका जाना संभव नहीं होता है. जीवन में गंभीरता का अभाव, जो विचार और व्यवहार में फूहड़ता और उच्छृंखलता के रूप में परिलक्षित होता है, पराधीनता को स्पष्ट निमंत्रण है.

अनधीनता की स्थिति और प्राप्ति के हेतु की समझ के लिए दृष्टिकोण में वैज्ञानिकता की विद्यमानता अपरिहार्य है. चुनौती और भी विकट हो जाती है जब छद्मज्ञान प्रबल स्थिति में हो. छद्मज्ञान का कुचक्र दुष्टों तथा प्रपंचियों के दुष्प्रचार और हिंसावाद के द्वारा रक्षित होता है. ऐसी स्थिति में लोग ज्ञान से ही भयभीत रहते हैं. ज्ञान की व्यापकता ही अनधीनता का जीवन संभव बनाती है. ज्ञान की व्यापकता के लिए ज्ञान के प्रति हमारी सजगता और इसकी स्थापना के लिए तत्परता में किसी तरह की कमी और या उनको लेकर किसी तरह का प्रमाद या भीरूता हमारे स्वयं और समाज दोनों के लिए ही घातक है.

नीरज कुमार झा