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रविवार, 19 फरवरी 2012

कठपुतले


भले ही दिखूं मैं
कठपुतले सा
यह सीमितता
नहीं है मेरी परतंत्रता
सीमाहीनता होगी समस्या
असीम की
मैं तो हूँ उन्मुक्त सतत
लांघने नई सीमाओं को
सीमाओं का होना ही
अर्थ देता  है अनधीनता को 
कठपुतले को भी
ध्यान से तो देखो
मखौल उड़ाता
मुझे दिखता वह 
देखने वालों का और
उसे नचाती
बेजार उँगलियों का

अनधीन

अधीनता
मेरी त्रासदी नहीं है
समस्या है मेरी प्रकृति
जो चाहती है अनधीनता
स्वाधीनता भी जिसे
स्वीकार नहीं
ऐसे में
मैं मैं नहीं रह पाता
स्वहीनता की समझ
लेकिन अभी नहीं है
मेरे पास

बुधवार, 11 जनवरी 2012

समय लगेगा इस संकट को दूर करने में

फूहड़पन को फूहड़ता से लेना 
नहीं है बुद्धिमानी 
नहीं रह गयी यह पहचान ओछेपन की
यही है अब मुख्यधारा 
इसकी अवहेलना है घाटे का सौदा 
विरोध इसका नहीं खतरे से खाली 


मसखरे, मवाली और शातिर अपराधी
इन्हें इन नामों से अब  नहीं जाना जाता
वे हैं अब कर्णधार 
समाज के अभिभावक  
सामूहिक मामलों के मालिक 


फूहड़ता और उद्दंडता ही खरा है 
बाँकी  के आचार और व्यवहार  
नहीं चलते अब खोटे  सिक्कों की तरह 
यही है  नियति अब
लोगों और समाज की 


उपेक्षा 
साहित्य की 
संस्कृति की 
कला की 
उदासीनता 
निःस्वार्थ सरोकारों के प्रति
अनधीनता के मानदण्डो के प्रति 
समुचित शिक्षा के प्रसार के प्रति 
बौद्धिकता  के  प्रति  
अब भारी  पड़ रही है


तैयार हो चुका है ऐसा बहुसंख्य 
जो है 
मानसिक रूप से विकृत
नैतिक रूप से भ्रष्ट 
और बौद्धिक रूप से दिवालिया 
यह समय है गंभीर संकट का 
समाज की समस्त सकारात्मक ऊर्जा 
लगे तब भी 
समय लगेगा इस संकट को दूर करने में


- नीरज कुमार झा 









रविवार, 8 जनवरी 2012

यह कौन है

मौन 
अतिघनीभूत मौन 
आत्मा को जड़ करता मौन 
वाचलता
खोखली वाचालता
मस्तिष्क को भन्नाती  वाचालता 
जम चुकी है चेतना
तन में घुसा है उन्माद 
लोग हैं पड़े सडकों के किनारे  
दुःख का अंत नहीं 
लेकिन भर नहीं रहा कोई आहें 
घोर पीड़ा में भी न कोई कराह रहा 
दिल भरा है  
लेकिन आँखे हैं बिलकुल सूखी 
देख रहे वे 
वाचालता के झंझावात में उड़ते
संवेदना के सूखे पत्ते
सड़को पर 
अट्टहास करते 
इठलाते मचलते लोग 
उन्मत्त नृत्य कर रहे हैं 
किनारे चीथड़ों में लिपटी 
सूनी आँखों को सड़क पर टिकाये 
यह कौन है

- नीरज कुमार झा 

सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

हममें पनपी ही नहीं भावना खुद्दारी की

वे लड़ रहे हमारी बेहतरी के लिए
हमारी गैरत के लिए
फिर भी हम हैं कि
हमें सारा दोष नज़र आता है उनमें ही
हमने खर्च कर दी सारी ऊर्जा 
उनका दोष  ढूढने में 
खुद तो कभी कुछ किया नहीं 
लेकिन सारा दिमाग लगा दिया 
उनको गलत-सही बताने में 
हमें नहीं दिखता दोष उनमें 
जिनके कारण हम नहीं रहे दो कौड़ी के 
और होते  रहे बेइज्जत बात-बेबात के
असल यह है कि 
हममें पनपी ही नहीं 
भावना खुद्दारी की 
कैसे हमें अच्छी लगे 
बातें आत्म सम्मान की 
या परस्पर मान की

- नीरज कुमार झा 


उपलब्धियाँ

मित्र नहीं कहूंगा
मेरे एक परिचित हैं
मिलने पर बताया कि
उन्होंने कार खरीद ली है और 
यह उनके  जीवन की उपलब्धि है
मुझे उपलब्धि वाली बात 
थोड़ी नहीं 
पूरी की पूरी अटपटी लगी
मेरी शिक्षा और संस्कार के अनुसार
घर या कार 
या ऐसी ही किसी भौतिक वस्तु का क्रय करना 
उपलब्धि की श्रेणी में तो कतई नहीं आता है
उपलब्धि का पैमाना
उपभोग की सामग्रियां जुटाना है 
यह समझ 
मुझे अपनी तमाम वंचनाओं के बावजूद 
बेढंगी लगती  है
हँसना चाहता हूँ 
लेकिन ऐसी उपलब्धियों की खोज में 
उन्मत्त भारी भीड़ को देखकर 
खामोश रह जाता हूँ

- नीरज कुमार झा 

बृहस्पतिवार, 15 सितम्बर 2011

अमीरी के कटीले झाड़

बेमुरुव्वत  मरुस्थल में 
अमीरी के कटीले झाड़ 
उग रहे तेजी से चारों ओर
चोरी-चकारी
लूट-खसोट 
ठगी और बेईमानी 
का ही जोर 
हर ओर
हैं नखलिस्तान ईमान के भी 
लेकिन दीवारें खड़ी 
उनके चारों ओर 
जमीन होती यदि सही
लगते बाग एक पर एक 
एक से एक
मेहनत के फूल खिलते
उद्यम के वृक्ष उगते
साहस के तरूवर छूते आकाश 
छाया होती घनी 
सुगन्धित होती हवा 
होती खुशी
संतुष्टि 
शांति 
चारों ओर   

- नीरज कुमार झा