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मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

The Non-existent Coins

Why is worthlessness soaring?
The answer is so obvious, my friends!
When toil is demeaned,
Goodness is devalued,
It is only the worthlessness,
Which is left to hanker after.

When the blind pursuit of moolah,
The craving to control others, and
The exhibition of self,
Become religion,
It is the worthlessness,
Which makes the spheres.

There is nothing we can do,
Except to keep in mind
That existence means humanity;
And humanity means only
The person before you.

When you value the other,
You gain freedom from
The tyranny of nothingness.
And get rid of suffocation,
Which you may think is life.

Niraj Kumar Jha

सोमवार, 6 नवंबर 2017

... which makes us modern and civilised ...

The understanding, which makes us modern and civilised, and which the barbarians amidst us seek to destroy

We enter into the contract with ourselves in order to preserve ourselves,. The resultant entity does not own us, none of us. Rather each of us has the entity to serve each of us individually as well. The collective will is no more sacrosanct than any individual will. And none's interest can be sacrificed for the sake of any other. Any conflict between the collective and the individual will must be judged independently and with absolute parity. The exercise of paramount powers must be only on the basis of unavoidable or unalterable necessity for the sake of absolute common good. The construction of a highway is such a necessity and the land must be acquired for that. But in such cases, the person parting land must be compensated by regular royalty from the accruals from the road taxes.

Niraj Kumar Jha

शनिवार, 4 नवंबर 2017

स्वतंत्रताओं का अर्जन व अवधारण

ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥

स्वतंत्रताओं का उपलब्ध होना स्वाभाविक स्थिति नहीं है. स्वतंत्रताओं के अर्जन, विस्तार, और अवधारण के लिए निरंतर प्रयास करना होता है. इसके लिए आवश्यक है कि नागरिक विज्ञ, सुधी, और सक्रिय हों. सबसे महत्वपूर्ण है आचरण में दायित्व भाव. नितांत निजी जीवन, यहाँ तक कि मनन में भी, से लेकर सार्वजनिक जीवन तक प्रत्येक जन का आचरण दायित्वबोध से पूर्ण और गरिमामय हो. जब स्वतंत्रताओं का दुरुपयोग होता है या स्वतंत्रताओं के प्रति उपेक्षा का भाव प्रबल हो जाता है तो स्वतंत्रताओं का क्षरण रोका जाना संभव नहीं होता है. जीवन में गंभीरता का अभाव, जो विचार और व्यवहार में फूहड़ता और उच्छृंखलता के रूप में परिलक्षित होता है, पराधीनता को स्पष्ट निमंत्रण है.

अनधीनता की स्थिति और प्राप्ति के हेतु की समझ के लिए दृष्टिकोण में वैज्ञानिकता की विद्यमानता अपरिहार्य है. चुनौती और भी विकट हो जाती है जब छद्मज्ञान प्रबल स्थिति में हो. छद्मज्ञान का कुचक्र दुष्टों तथा प्रपंचियों के दुष्प्रचार और हिंसावाद के द्वारा रक्षित होता है. ऐसी स्थिति में लोग ज्ञान से ही भयभीत रहते हैं. ज्ञान की व्यापकता ही अनधीनता का जीवन संभव बनाती है. ज्ञान की व्यापकता के लिए ज्ञान के प्रति हमारी सजगता और इसकी स्थापना के लिए तत्परता में किसी तरह की कमी और या उनको लेकर किसी तरह का प्रमाद या भीरूता हमारे स्वयं और समाज दोनों के लिए ही घातक है.

नीरज कुमार झा

बुधवार, 23 अगस्त 2017

आओ! हम वाद-विवाद करें !

आओ! हम वाद-विवाद करें !
मुझे पता है कि तुम हो अटल अपने मत पर,
मैं भी प्रतिबद्ध अपने दर्शन को लेकर।
तुम पूछोगे कि क्या लाभ फिर इस वाक्-युद्ध का ?
मैं कहता हूँ कि भले ही हम नहीं स्वीकारें,
लेकिन वाद-विवाद की आग में असल चमक उठता है,
और मिलावटी पर जाता है काला।
कालिमा किसी पक्ष के हिस्से में हो,
लेकिन असल का चमकना जरूरी है ।
हाँ, समस्या एक रह ही जाती है।
वाद-विवाद रह जाता है निष्प्रभावी,
यदि किसी की मानवता गिरवी 
पर हो। 


नीरज कुमार झा

रविवार, 30 जुलाई 2017

Lord Vibhishana

I found a commentator on facebook invoking the role Lord Vibhishna played in restoring Lanka to dharma in a very pejorative way in the context of events which unfolded in Bihar. As per a popular maxim Lord Vibhisana is depicted as a traitor who led to the destruction of his homeland Lanka. This is the most inappropriate and mischievous way of looking at the role of the great sage - Lord Vibhishana. The Lord was a great devotee and knew exactly what dharma was and had unfailingly put his wisdom and might on the side of dharma and only it was his sagacity that earned him the most affectionate friendship of Lord Ram, the Supreme Being Himself. The nutshell of the saga is simple - the greater dharma supersedes smaller dharma. This is the message one should imbibe and refrain from going after naughty or non-nonsensical popular sayings. The so-called Vibhishana of Bihar today deserves only our praises as he restored Bihar to the prospect of better governance.

Niraj Kumar Jha

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

भारत का लक्ष्य मात्र एक महाशक्ति बनना नहीं हो सकता है। इसका कारण है कि भारत को प्रत्यक्ष चुनौती उस सभ्यता और राष्ट्र से मिल रही है जो अत्यन्त व्यवस्थित तरीके से विश्व की प्रथम शक्ति बनने के लिए एक लम्बे समय से क्रियाशील है और कई क्षेत्रों में यह देश अपने सर्वोच्च स्थान को निर्विवाद रूप से स्थापित कर चुका है। इसके साथ ही भारत का कट्टर शत्रु और विश्व का सबसे बड़ा उपद्रवकारी देश भी उससे जा मिला है। भारत परमशक्ति बनकर ही सभ्यता के इन शत्रुओं का प्रभावी प्रतिकार कर सकता है। अन्यथा, भारत की अस्मिता, प्रतिष्ठा, सुरक्षा, और सम्प्रभुता सभी हमेशा खतरे में रहेंगी। हमारे पास विकल्प मात्र यही है कि हम परमशक्ति बने या एक आक्रांत देश के रूप में अपनी नियति को कोसते रहें।

भारत को परमशक्ति बने, इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक भारतीय की मेधा और क्षमता चरम पर हो। इस हेतु प्रत्येक नागरिक के प्रतिभा, शौर्य, और उद्यम को पराकाष्ठा तक ले जाना होगा। हर भारतीय वैश्विक स्तर पर श्रेष्ठता का प्रदर्शन कर सके, ऐसी हमारी नीति हो।


नीरज कुमार झा

रविवार, 2 जुलाई 2017

The Grand Project of Self Defeatism

The people I considered fool earlier, I find their beliefs to be correct now. I had to overcome my education to realize this. One of such realizations is that the past is not there in the history texts but it remains the most formidable determinant of our genetic coding, which in turn determines how we behave. Our intellectualism lacks utterly in addressing the existential, and I realize that to be the chief factor for the trivialization of intellectualism in the country. It is our genetic coding which makes us hyper aggressive sometimes and keeps us abominably subservient most of the times. This may also be the reason for our intellectualism being a grand project of self defeatism.

Niraj Kumar Jha