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सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

हममें पनपी ही नहीं भावना खुद्दारी की

वे लड़ रहे हमारी बेहतरी के लिए
हमारी गैरत के लिए
फिर भी हम हैं कि
हमें सारा दोष नज़र आता है उनमें ही
हमने खर्च कर दी सारी ऊर्जा 
उनका दोष  ढूढने में 
खुद तो कभी कुछ किया नहीं 
लेकिन सारा दिमाग लगा दिया 
उनको गलत-सही बताने में 
हमें नहीं दिखता दोष उनमें 
जिनके कारण हम नहीं रहे दो कौड़ी के 
और होते  रहे बेइज्जत बात-बेबात के
असल यह है कि 
हममें पनपी ही नहीं 
भावना खुद्दारी की 
कैसे हमें अच्छी लगे 
बातें आत्म सम्मान की 
या परस्पर मान की

- नीरज कुमार झा 


उपलब्धियाँ

मित्र नहीं कहूंगा
मेरे एक परिचित हैं
मिलने पर बताया कि
उन्होंने कार खरीद ली है और 
यह उनके  जीवन की उपलब्धि है
मुझे उपलब्धि वाली बात 
थोड़ी नहीं 
पूरी की पूरी अटपटी लगी
मेरी शिक्षा और संस्कार के अनुसार
घर या कार 
या ऐसी ही किसी भौतिक वस्तु का क्रय करना 
उपलब्धि की श्रेणी में तो कतई नहीं आता है
उपलब्धि का पैमाना
उपभोग की सामग्रियां जुटाना है 
यह समझ 
मुझे अपनी तमाम वंचनाओं के बावजूद 
बेढंगी लगती  है
हँसना चाहता हूँ 
लेकिन ऐसी उपलब्धियों की खोज में 
उन्मत्त भारी भीड़ को देखकर 
खामोश रह जाता हूँ

- नीरज कुमार झा 

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

अमीरी के कटीले झाड़

बेमुरुव्वत  मरुस्थल में 
अमीरी के कटीले झाड़ 
उग रहे तेजी से चारों ओर
चोरी-चकारी
लूट-खसोट 
ठगी और बेईमानी 
का ही जोर 
हर ओर
हैं नखलिस्तान ईमान के भी 
लेकिन दीवारें खड़ी 
उनके चारों ओर 
जमीन होती यदि सही
लगते बाग एक पर एक 
एक से एक
मेहनत के फूल खिलते
उद्यम के वृक्ष उगते
साहस के तरूवर छूते आकाश 
छाया होती घनी 
सुगन्धित होती हवा 
होती खुशी
संतुष्टि 
शांति 
चारों ओर   

- नीरज कुमार झा 

सोमवार, 12 सितंबर 2011

अभी भी दूर है सभ्यता हमसे

तय है 
भविष्य की पीढ़ियाँ
जब लिखेंगी इतिहास 
हमें रखेंगी बर्बरों की श्रेणी में
हमारी तथाकथित सभ्यता 
खर्चती है
सबसे ज़्यादा  संसाधन 
ध्वंस के उद्योगों पर
और हिंसा के प्रशिक्षण पर
मानवता की प्रगति बौनी है 
इसकी अदमित दानवता के आगे
हमारे पंथ और तंत्र के मूल में 
है अभी भी सिर्फ हिंसा
अभी भी उपेक्षित है
भारत का वसुधैव कुटुम्बकम का  सन्देश 
और अहिंसा का दर्शन 
हमारी सभ्यता अभी भी दूर है
सत्य, अहिंसा और अनुराग के
जीवन दर्शन और शैली से 
अभी भी दूर है सभ्यता
हमसे

- नीरज कुमार झा 






सोमवार, 5 सितंबर 2011

रामचरितमानस : भारतीय जनतान्त्रिक चेतना का आधार स्तम्भ


डा. नीरज कुमार झा


भारतीय जनतंत्र वैश्विक राजशास्त्रियों के लिये विस्मय का विषय है. भारत का आकार उपमहाद्वीपीय है तथा यहाँ की सांस्कृतिक विभिन्नताएँ अपार हैं. औपनिवेशिक शासक भारतीय राष्ट्रवाद को निरा गल्प मानते थे. उदाहरण के लिए पंजाब, बंगाल, मद्रास या गुजरात आदि प्रदेशों के मध्य भिन्नताएँ इतनी ज़्यादा थीं कि वे भारत को किसी सूरत में राष्ट्र मानने को तैयार नहीं थे. स्वंत्रतता के समय भारत की अतिदरिद्रता तथा विभाजन के कारण व्याप्त अराजकता के माहौल में भारत में जनतंत्र की बात तो दूर, भारत की भौगोलिक अखण्डता भी संदिग्ध मानी जा रही थी. आज आज़ादी के चौंसठ साल बाद न सिर्फ़ भारत की अखण्डता यथावत है बल्कि भारत का जनतंत्र निरंतर नयी बुलंदियों को छू रहा है. जनतंत्र की भारत में ऐसी अप्रत्याशित सफलता को पाश्चात्य राजनीतिक संस्थाओं की प्रभावशीलता के रूप में देखना भारी भूल होगी. आज भी दुनियाँ की  आधी आबादी गैरजनतांत्रिक हुकुमतों के अधीन है. पाश्चात्य राजनीतिक प्रणालियाँ विश्व के अन्य क्षेत्रों में जनतंत्र को स्थापित करने में अभी तक कारगर नहीं हुई हैं. भारतीय  उपमहाद्वीप पर ही ब्रिटिश उपनिवेशवाद की सामूहिक विरासत के बावजूद (नेपाल को छोड़कर) भारत के पड़ोसी देशों में जनतंत्र की स्थिरता कायम नहीं हुई है. वास्तव में भारतीय राष्ट्र व जनतंत्र की पृथक पृष्ठभूमि है. भारत की औपनिवेशिक दासता के कालखंड ने अवश्य ही भारतीय एकता की स्थापना और जनतंत्र के उदय में उत्प्रेरक का काम किया हो लेकिन यह कालखंड भारतीय राष्ट्र या जनतंत्र का प्रणेता नहीं है. भारत की राष्ट्रीयता या जनतंत्र की जड़े इसकी सभ्यता में ही समाहित हैं. तुलसीदास रचित रामचरितमानस ऐसी ही कृति है जो न सिर्फ़ भारतीय सभ्यता के महती मूल्यों को अभिव्यक्त करती है बल्कि उसे पुष्ट भी करती है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन दर्शन पर तुलसी साहित्य का प्रभाव सुविदित है. वास्तव में भारत में जनतंत्र की ग्राह्यता तथा इसकी सफलता के आधारभूत कारणों में रामचरितमानस जैसा जनसाहित्य ही है. मानस में वर्णित राजव्यवस्था का स्वरूप भले ही राजतंत्रीय हो लेकिन इसकी आत्मा पूर्णरूपेण जनतांत्रिक है. राम भले ही राजा हैं लेकिन उनका व्यवहार दूसरों के साथ हमेश सखा भाव का है, चाहे वह शरणागत राक्षस विभीषण हो, कृपाभाजन वानर सुग्रीव हो या वनवासी निषाद. "अधम ते अधम अधम अति नारी" शबरी को वह माता के रूप में देखते है. गिद्ध जटायु का वह पुत्रवत अंतिम संस्कार करते हैं. राम की दृष्टि समदर्शी है. लोक व्यवहार में वह किसी भी तरह की असमानता स्वीकार नहीं करते हैं. शबरी को संबोधित करते हुए वह कहते हैं कि जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल , कुटुम्ब, गुण और चतुरता - इन सबके होने पर भी भक्ति भाव से रहित मनुष्य कैसा लागता है जैसे जलहीन बदल दिखाई पड़ता है. वास्तव में श्रीराम समाज में व्याप्त असमानता के समस्त आधारों को अस्वीकार कर देते हैं. उनके लिये भक्ति ही प्रधान है. ऐसे ही अयोध्याकाण्ड में वसिष्ठ श्री राम को सलाह देते हैं कि पहले भरत की विनती सुनिए, फ़िर उसपर विचार कीजिए. तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदों का निचोड़ निकालकर वैसा ही कीजिए. यह निर्णय लेने की सर्वाधिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है. इस तरह की प्रक्रिया किसी भी तरह के अधिनायकवादी सोच का सशक्त प्रतिकार है. यह प्रक्रिया लोकमत को परिमार्जित कर उसे लोकहित में परिवर्तित करती है. उत्तरकाण्ड में वर्णित संभाषण में श्रीराम के वचन भी जनतांत्रिक भावना की पराकाष्टा है. इसमें श्रीराम कहते हैं कि यह बात मैं ह्रदय में कुछ ममता लाकर नहीं कहता हूँ. न अनीति की बात कहता हूँ और न इसमें कुछ प्रभुता ही है . इसलिए मेरी बातों को सुन लो और यदि तुम्हें अच्छी लगे तो उसके अनुसार करो. वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरे आज्ञा माने. हे भाई ! यदि मैं कुछ अनीति की बात कहूँ तो भय भुलाकर मुझे रोक देना. यह वचन संप्रभु नृप के हैं जो परमब्रह्म विष्णु के अवतार हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इससे स्पष्ट घोषणा क्या हो सकती है! रामचरितमानस का प्रत्येक अंश वास्तव में श्रेष्ठतम जनतांत्रिक चेतना से अनुप्रमाणित है. भारतीयों ने पीढ़ियों से इस महाकाव्य का अध्ययन और अनुशीलन कर इन सिद्धांतों को अंगीकार कर लिया है. रामचरितमानस भारतीय जनतंत्र का प्रबल स्तम्भ है जिसकी वजह से भारत में जनतंत्र न  सिर्फ़ टिका है बल्कि नित नई ऊँचाईयों को छू रहा है.

रविवार, 14 अगस्त 2011

जिसे नहीं गवारा मेरा गुलाम होना

गुलाम मैं भी हूँ 
गुलाम तुम भी हो
मजे में हो तुम
लेकिन मैं हूँ बेचैन 
जिसका तुम्हें भान भी नहीं
उसके मारे मैं हूँ परेशान 
ऐसा क्यों है
शायद तुम पड़े हो जन्म से ही 
ऐसी कालकोठरी  में 
जिसमें कोई रोशनदान भी नहीं
मैं जहाँ हूँ नज़रबंद 
वहाँ खुली खिड़कियाँ तो हैं ही सही 
रोशनी तो कभी न कभी तुमने भी देखी होगी
लेकिन तुमने झूठला दिया होगा देखे का
बहला लिया होगा अपने-आप को 
समझ कर उसे छलावा 
दिमाग पर जोर डालना 
शायद नहीं  तुम्हारी फितरत 
लेकिन मेरे मन का एक कोना है
जिसे नहीं गवारा 
मेरा गुलाम होना

- नीरज कुमार झा 

शनिवार, 13 अगस्त 2011

जन-जन संप्रभु

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यह जनतंत्र है
यहाँ कोई राजा नहीं है 
कोई प्रजा भी नहीं
हम सभी नागरिक हैं
और तय है कि
हम चुनते हैं अपने प्रतिनिधि
स्वामी नहीं
उचित तो यह भी नहीं कि 
कहा जाए किसी को शासक या प्रशासक 
जीविका चलती उनकी 
हमारे अंशदान से 
मात्र  हैं  वे प्रबंधक 
हमारे सामूहिक हितों के 
यह जनतंत्र है
और हर जन संप्रभु है
बंदिशें हैं और रहें 
लेकिन सिर्फ इसलिए कि
हमारी अनधीनता नहीं बदले अराजकता में
बंदिशों का है लक्ष्य मात्र एक
कि हो हमारी स्वतंत्रता अधिकतम 
और प्रतिबंध रहे हम पर कम से कम
हर जन है बड़ा 
तंत्र के किसी भी अंग
या उसके किसी कर्मी से
याद रहे हमेशा कि
यह जनतंत्र है
और जन-जन संप्रभु है
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नीरज कुमार झा
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मालिक मेरे कुत्ताजी

चोरी की बढ़ती वारदातों को लेकर मैं परेशान था
दोस्तों ने सलाह दी 
मैंने एक कुत्ता पाल लिया 
शुरू में उसने कुछ संदेहास्पद लोगों को देखकर तेवर दिखाए 
लेकिन यह कुछ ही दिन चला
अब वह सारे रूआब मुझ पर ही झाड़ता है 
वह मेरे बिछावन पर लेटता है 
मेरी कुर्सी  पर बैठता है
म्रेरे भोजन का बड़ा हिस्सा 
मुझसे पहले डकार जाता है
और मैं यदि विरोध करूँ  तो 
मुझ पर गुर्राता है 
मैं एक दिन पूछ ही बैठा 
मालिक तू है या मैं 
कुत्ते ने कहा 
मैं हूँ मालिक 
मैं हैरत में पड़ गया 
वह कैसे 
तू काम करता है 
हाँ 
मैं काम करता हूँ 
नहीं 
कौन मालिक हुआ 
तुम 
मेरा नाम सम्मान से ले 
क्या कहूँ आपको 
मालिक मेरे कुत्ताजी 
ठीक है मालिक मेरे कुत्ताजी
मैं उसके तगड़े जबड़ो से झांकते 
मजबूत दांतों को देखकर सहम गया था
खाना तो आप मेरा दिया खाते हैं 
यह तेरा भ्रम है 
कैसे 
मैं पहले खाता हूँ 
हाँ 
तू मेरा छोड़ा खाता है 
हाँ 
फिर बता कौन किसको खिलाता है 
आप मुझे खिलाते  हो 
लेकिन काम तो मैं अपना करता  हूँ 
यह भी तेरा भ्रम है 
काम भी तू मेरी वजह से कर पाता है 
वह कैसे 
मैं सुबह-सुबह तुझ पर भूँकता हूँ 
तभी तो तू काम पर जाता है 
और काम कर पाता है 
हाँ मालिक मेरे कुत्ता जी 
मेरे पास कोई चारा नहीं था 
कुछ दिनों के बाद तो उसने अति कर दी 
उसने सर पर चमकने वाला सीसा बाँध लिया 
और चलते वक्त सीटी बजाने लगा 
अब यह क्या है 
समझा नहीं 
सिटी जैसे मैं बजाऊँ तू जहाँ  का तहाँ  खड़ा हो जा 
संडास भी जा रहा तो बिलकुल ठहर जा 
कुछ भी करूँगा तो मैं पहले करूँगा  
जब तक मैं कुछ करूँगा
तू कुछ नहीं करेगा और चुपचाप रहेगा 
मेरी अक्ल अब ठिकाने लग चुकी थी 
मालिक मेरे कुत्ताजी 
कहकर मैंने सलाम बजाया 
शाबाश 
शाबाशी पा 
सच कहूँ मुझे अच्छा लगा 
मजे से मैं 
घर के कोने में उसका  जूठन खाने बैठ गया

- नीरज कुमार झा 





गुरुवार, 4 अगस्त 2011

रिश्ते कुछ ही चलते जन्म भर

मैं रोया हूँ कई बार
टूटे रिश्तों को लेकर
हुआ हूँ रूआंसा कई बार
भांप कर
टूट जाने वाले रिश्तों को लेकर
पहले पता नहीं था
रिश्ता चाहे कैसा भी हो
रक्त या सम्बन्ध का
दोस्ती का या पेशे का
रिश्तों की जमीन होती है
जो हो जाती है बंजर अधिकतर
एक समय के बाद
और सूख जाते हैं रिश्तें
कुछ समय के बाद
रिश्तों की उम्र होती है
रिश्ते कुछ ही चलते हैं जीवन भर
हर रिश्तों को सहेजना नहीं होता है संभव
हर एक के लिए


- नीरज कुमार झा

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

बंदी जीवन की विरासत

हम संस्कार के नाम पर 
बच्चों को देते हैं ऐसी शिक्षा और माहौल 
जिससे मजबूत होती हैं 
दीवारें उस कारा की 
जिसके अन्दर हम कैद हैं 
बच्चों से हम नहीं कहते 
कि हम आदर्श नहीं हैं 
आदर्श कोई और भी नहीं है 
हम नहीं कहते उन्हें 
कि मत पड़ो इन झमेलों में 
उनकी ही जिम्मेदारी है
कि वे  चुने अपना रास्ता 
और तय करें 
क्या है अच्छा या बुरा 
हम नहीं कहते 
कि हम नहीं हैं पूज्य 
मत हो नतमस्तक हमारे सामने 
और न ही प्रयास करो आज्ञा पालन की 
वे ले निर्णय अपने 
और निर्धारित करें अपने कृत्य-अकृत्य
मत करें अनदेखी हमारी कमियों की 
हिकारत से देखें हमें भी 
और लौटाए जैसा का तैसा 
हमारे अस्वीकार्य किए का 
ईज्जत करें बिना झुके
सिर्फ़ नेकनीयती की 
हमें होना चाहिए साहस कहने के लिए
कि नहीं है हम अनुकरणीय
या कोई और भी 
करना है उन्हें अनुसरण सिर्फ अपने विवेक का 
और रखना है स्वविवेक को भी संदेह के घेरे में 
हम नहीं सिखाते उन्हें  
कि वे करें प्रतिकार हमारा 
हमसे करें प्रश्न 
और रहे कोशिश में हमेशा 
हमें नकारने की
हममें होनी चाहिए ईमानदारी कहने की 
कि प्रभुता और दासत्व की दुनियाँ में रहकर 
प्रवृत्ति बन चुकी है हमारी 
सल्तनत अपनी खड़ी करने की 
घर में भी 
बच्चों से हम कहें  कि सब हैं  बराबर 
और गैरबराबरी की हमारी हर चेष्टा पर 
वे करें प्रहार
बिलकुल बेहरमी और नफ़रत से
बड़प्पन के थोपने की हर हमारी कोशिश को 
वे  उधेड़  दें बिलकुल बेपरवाही से 
जब तक हम नहीं छोड़ेंगे 
हक़ अपनी छोटी मिल्कियत की 
बच्चों को नहीं बनायेंगे प्रतिगामी 
हम अपनी सामंती के 
तब तक हम नहीं तोड़ पायेंगे 
दीवारें उस कारा की 
जिसमें हम  कैद हैं 
और हम बाध्य होंगे 
छोड़ने को विरासत 
उसी बंदी जीवन की 
जो चली आ रही है 
सनातन से 

- नीरज कुमार झा 

मैं कवि नहीं कौआ हूँ

मैं कवि नहीं कौआ हूँ
जब भी मौका मिले 
कांव-कांव करने लगता हूँ  
वैसे मारा-मारा फिरता हूँ 
कुछ भी खा लेता हूँ 
जूठा-कूठा
सामिष-निरामिष 
मुर्दा-ज़िंदा
सड़ी-गली लाशें 
गिद्धों-कुत्तों से लड़कर खाता हूँ 
अंडे, छोटे पंछी और चूहे
भी डकार जाता हूँ 
जिन इंसानों के मारे भगता हूँ 
मरा या मरणासन्न भी मिले 
उसे भी नहीं बख्शता हूँ 
कुछ भी खा लेता हूँ 
विष्ठा भी नहीं छोड़ता हूँ 
कुछ भी खाता हूँ 
कैसे भी खाता हूँ 
चालाकी से 
चोरी से
डरकर 
या कभी साहस भी दिखाकर 
कोंई जुगत नहीं छोड़ता हूँ 
क्योंकि मैं कौआ हूँ
और कांव-कांव करने से भी 
कभी बाज नहीं आता हूँ 
एक से अधिक हो तो 
कांव-कांव की समा बंधती है 
दुनियाँ जाए भाड़ में 
मैं तो रहता अपनी ताक़ में 
और मौक़ा मिलते ही 
कांव-कांव करने लगता हूँ 

- नीरज कुमार झा 






शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

बिहार भ्रमण


बिहार में अंतराल पर भ्रमण करते समय सड़क, विद्युत आपूर्ति, कानून-व्यवस्था में सुधार स्पष्ट दिखता है. सरकारी स्वास्थ्य तथा शिक्षा सेवाएँ वापस कार्यशीलता की ओर लौट रही  हैं. शहरों और गाँवों में सफाई भी बेहतर है  और पहले की तुलना में नवीन सम्पन्नता के दर्श भी  जहाँ-तहाँ होते हैं. फिर भी मामला इस बार  कुछ-कुछ ठहरा सा लगा. बिहार की गति थमनी नहीं चाहिए, बिहार ने बहुत कुछ झेला है और अंधकूप से निकल कर अभी गहरी साँसें भरने  में ही लगा है.

बिहार क्या कर सकता है? पहले बिहार को उन गलतियों पर विचार करना होगा जिनके कारण वह गर्त में गया. बिहार अपने विगत पर गंभीरता से मनन करे और उसे शिद्दत से समझे और पूरी सतर्कता से उस समझ को  स्मरण रखे. यदि वे वैसा नहीं करते हैं तो भविष्य में उन्हीं गलतियों को दुहारएंगे और पुनः उसी वंचना, उत्पीड़न  और अपमान के भुक्तभोगी बनेंगे.

चुनौती सिर्फ एक सामान्य जीवन शैली को हासिल करना नहीं है जहाँ लोगों को भोजन, वस्त्र, छत, चिकित्सा, शिक्षा और  सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं साधारण रूप से प्राप्त हों. कहने का मतलब है कि लोगों को अमानवीय जीवन शैली से निजात दिलाने तक ही बिहार का उद्देश्य सीमित नहीं हो सकता है. बिहार की भूमि विश्व की महान सभ्यताओं में से एक की उद्गम भूमि रही है. प्राचीन यूरोप के इतिहास में तीन स्थानों का बहुत ही महत्व है. ये हैं, यूनान, रोम और जेरुसलम. अंतिम हालांकि  यूरोप से बाहर है. प्राचीन भारत के लिए  बिहार का  क्षेत्र यूनान , रोम और जेरूसलम तीनों ही था. इस भूमि से उत्सर्जित और विकसित हुए अद्वितीय ज्ञान-विज्ञान, साम्राज्य निर्माण की प्रक्रिया और विश्व के सर्वाधिक मानवीय आस्था के पंथ.

आज जिसे भारतीय  सभ्यता कहते हैं, को अवसर मिला है कि यह विश्व समाज में अपने उस मान को स्थापित करे जिसका वह अधिकारी है. यह अवसर तेजी से फिसल भी रहा है. अधिकतर लोग इस उपस्थित अवसर और इसकी  समाप्त होती सीमित कालावधि से अनजान हैं. कम ही लोग हैं जो इसे समझते हैं और  वे अवश्य ही व्यथित होंगे. सहस्त्राब्दियों में ऐसे अवसर गिने-चुने ही आते हैं. दिनों और पहरों में इतिहास बदलते हैं. तराइन, तालीकोटा,  पानीपत, प्लासी, बक्सर आदि स्थानों पर पहरों में घटित घटनाओं ने  करोड़ो लोगो के जीवन को शताब्दियों के लिए बदल दिया. इस विडम्बना की तुलना नहीं हो सकती है कि जिन लोगों का इतिहास इतना त्रासद हो, वे लोग   उस इतिहास को फसानों से भी कम तवज्जो देते हैं.  बिहार का दायित्व है कि वह अपने उस प्राचीन मेधा और शौर्य को जागृत करे और इस महान सभ्यता को इसके सहस्त्राब्दियों के पराभव से मुक्त कराए.  शौर्य का मतलब आज के युग में तलवारबाजी नहीं है. आज शौर्य का अभिप्राय है नई सोच और उसके प्रयोग का साहस.  
- नीरज कुमार झा 

रविवार, 3 अप्रैल 2011

बिहार मंथन

बदलता बिहार : पुल पुराना और नया 
जिस देश का नाम भारत है उसके उद्भव, विकास और उसकी अवधारणा को स्वरूप देने में, जो क्षेत्र आज बिहार की सीमा में आता है का अहम् योगदान है. बिहार की राजनीतिक, सांस्कृतिक और यहाँ तक की आर्थिक विरासतें सिर्फ़ प्रांतीय या  राष्ट्रीय महत्व की नहीं वरन वैश्विक है. ज्ञान, विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में इसकी उपलब्धियों ने उस ऊँचाई  को छूआ जिसकी  समतुल्यता आज भी दुर्लभ है. दुर्भाग्य से आक्रान्ताओं के प्रकोप, सहस्त्राब्दियों की दासता, कुशासन और अराजकता ने इस प्रांत की सभ्यतामूलक स्वरूप को विछिन्न तथा सांस्कृतिक संवेदना को विकृत कर दिया. फिर भी बिहार में उस महान विरासतों के अवशेष वहाँ के अनेक व्यक्तियों के आचरणों में परिलक्षित होते रहे हैं. कुछ वर्षों पूर्व बिहार ने पराभव की पराकाष्ठा देखी और  वहाँ के वर्ग विशेषों की सामंती मानसिकता की विकृति बढ़ी तथा  एक अजीब सी लम्पटता बिहार के सामान्य जन-जीवन पर हावी हो गयी. सभ्य आचरण के सर्वोच्च मानदंड जो बिहार के लोकाचरण में जहाँ-तहाँ दृष्टिगोचर होते थे विलुप्तप्राय हो गये. अब  बिहार विकास के खोये वर्षों की क्षतिपूर्ति में लगा है और वहां एक नवीन जागरण स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है.

बिहार में जो कुछ हो रहा है उससे बिहार के लोगों  के साथ-साथ अन्य प्रान्तों के लोग भी प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं. ऐसे दौर में संतुष्टि जनित निष्क्रियता का प्रबल होना स्वाभाविक है जबकि इस समय सबसे ज्यादा जरूरी  विकास की दशा और दिशा को लेकर मूल्यांकन और चर्चा  की सततता की है. वर्तमान सरकार की सराहना जहाँ बिलकुल वाजिब है वहीं सुधि जनों को सरकार की  नीतियों और कार्यकरण में परिष्कार हेतु सदैव सजग रहना होगा.

इस बिंदु पर यह रेखांकित करना समीचीन है की बिहार में विकास की प्रभावी धारणा परम्परागत है. सुधार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन में वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप उनमें समसामयिकता परिलक्षित नहीं होती हैं. यह दौर वैश्वीकरण का है.  अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर घोर प्रतियोगिता के इस दौर में अस्तित्व और अस्मिता का प्रश्न समस्त राजनितिक इकाइयों के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती है. यह समय नित नवीन और परिष्कृत प्रौद्योगिकी के आगमन का भी है. ऐसे में विकास की कोई भी नीति वैश्विक मानदंडों के अनुसार हो, तभी प्रासंगिक है. बिहार को विकास के लिए भारत के परे विश्व स्तर पर प्रौद्योगिकियों, प्रक्रियाओं, संस्थाओं  और सभ्यता के सिद्धांतों और व्यवहारों का अध्ययन, विश्लेषण, आकलन कर परिष्कृत नीतियों और कार्यकरण के प्रतिमानों को गढ़ना होगा. नवीन प्रतिमानों का निर्माण आज के दौर में विश्व में हर जगह आवश्यक हो रहा है क्योंकि इस सदी में जिस तरह के अभूतपूर्व तकनीकी और व्यवस्थागत परिवर्तन सामने आये हैं उनकी कोई मिसाल नहीं है. बिहार की समस्या तो और भी विकट है. इसे गर्त से निकलकर सम्पन्नता और सभ्यता के स्वप्न को साकार करना है. 

- नीरज कुमार झा 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

आँखें

उथली आँखें लोलुपता की
धंसी बेचारगी की आँखें
सही जगह की आँखें
बेपरवाही की
आँखें  दे रहीं गवाही
आज की हालात के

- नीरज कुमार झा 

अंधेरा (कविता)

जगमगाहट ऐसी
कि नज़रें ठहरती नहीं
अंधेरा ऐसा कि
खो जाता अहसास
आँखों के होने का ही
कहीं कैद रोशनी अंधेरे में
कहीं झीनी रोशनी के पीछे ठोस अंधेरा
याद आती है ऐसे में
पसरी दूर-दूर तक
शांत शीतल चाँदनी

- नीरज कुमार झा


मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

यह तरक्की कैसी

नफ़रत से आँखें फेर लो
बेशर्मी की बेहिसाब अमीरी ऐसी
नज़रें ना मिला सको
बेज़ार करती गरीबी ऐसी
यह  तरक्की कैसी कि
नैतिकता का निकल गया फलूदा
और मरणासन्न है मानवीयता

- नीरज कुमार झा

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

कल्पना का सच

अस्तित्व का अर्थ समझना
संभव नहीं,
यह तय है। 
अस्तित्व का कोई सत्य नहीं,
यह विचित्र सत्य है। 
अर्थहीनता के इस अनादि अनंत विस्तार में
विचरता हमारा विवेक भयाकुल है। 
भयाकुल मन रचता है
कल्पना का सच। 
लेकिन सच की कल्पना का संबल
जो है
जो हमारी जद में  है
कभी-कभी उसे ही उजाड़ देता है। 
यह नहीं होना चाहिए। 

- नीरज कुमार झा

रविवार, 23 जनवरी 2011

सहजता का पागलपन


पागल न हों
इसलिये हम सहज रहना चाहते हैं
सहज रहने की यह हमारी कोशिश भी
पागलपन के हद तक जा चुकी है
निरर्थक में अर्थ ढूढ़ना  और
सार्थक को समझने से बचना
हमारी प्रवृत्ति बन चुकी है

संवेदना से दूर हो चुके हम इतने कि
सुपची संस्कृति हमें स्वाभाविक लगती है
और मत्स्य न्याय को नियति हमने स्वीकारी है

फ़सानों  और तमाशों को दी हमने अहमियत ऐसी
कि वे असलियत का मुँह चिढ़ा रहे हैं
हमने किया है कुछ ऐसा कि
नक़ल की दुनियाँ में चल रहा हमेशा जलसा है
और इठला रहे लोग नक़ली हैं

असल की दुनिया के लोग हम असली
छायाओं की दुनियाँ में अपने को तलाश रहे हैं
अपने खोखले व्यक्तित्व और निरंक  कृतित्व का मुखौटा साथ रखते हैं
रजतपट पर चलते चित्रों को उस मुखौटे को पहना कर खुश होते हैं
और अपनी मानवीयता की कब्र पर उगे अहम् के कटीले झाड़ को सींचते हैं

कल्पना भी उधार की
ऐसे में क्या  जीवन की कोई नई कहानी गढ़ी जा सकती है
स्थिरजन्मा बौद्धिकता के सड़ते शरीरों के बीच
क्या किसी नई सभ्यता की बातें की जा सकती हैं

- नीरज कुमार झा

रविवार, 16 जनवरी 2011

अपेक्षाएँ


अपेक्षाएँ 
समाज से, 
व्यवस्था से,
दूसरों से, 
और उम्मीदें 
बेहतरी की 
हमारी मानसिकता के 
अहम् हिस्से हैं. 
लेकिन हम नज़रअंदाज कर देते हैं 
पूरी तरह कि 
हमारी हर उम्मीद बेमानी है
बिना हमारी सक्रियता के.
हमारी उम्मीदें मांग करती हैं
हमारे प्रयासों की. 
सोचना है हमें कि 
जरूरत  हमारी है तो 
पूरी करनी होंगी हमें ही. 
व्यक्तिगत आवश्यकताएँ
हम पूरी करते हैं स्वयं ही.
सार्वजनिक हित के लिये भी
सर्वजन की इकाई के रूप में 
प्रयास होंगे हमारे ही.
इंतजार  दूसरों के पहल की 
इंतजार ही रहेगा.
कुछ तो करें हम भी 
यदि चाहते हैं अच्छा समाज. 
और यदि नहीं कर पाते  कुछ भी 
तो  भी इतना तो कर ही सकते हैं 
कि जितना बन पड़े 
करें न बुराई 
और न बने भागीदार दूसरों की
बुराइयों  में.

- नीरज कुमार झा