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रविवार, 1 दिसंबर 2024

दर्शन और समाज

मेरा यह विश्वास समय के साथ दृढ़ होता जा रहा है कि किसी भी सभ्यता अथवा राष्ट्र की स्थिति, उत्कर्ष, अथवा अपकर्ष का प्रधान निर्धारक समुदाय में क्रियाशील विचारधारा होती है। हर समुदाय की एक प्रधान विचारधारा होती है जिसमें परंपरा, आंदोलन अथवा आरोपण का योग होता है।

किसी जनपद की भौतिक परिस्थितियों का प्रभाव वहाँ की विचारधारा पर हो सकता है लेकिन ये विचारधारा के निर्धारक नहीं होते हैं। ऐसे मानव होते हैं जिनकी बौद्धिक क्षमता और ऊर्जा उनके द्वारा लक्षित समुदाय की नियति बदल देती है और जिनका प्रभाव पूरी मानवता अथवा इसके बड़े हिस्से पर पड़ता है।

विचारधारा का प्रधान निर्धारक वास्तव में दर्शन है। इस संदर्भ में दर्शन के वैश्विक इतिहास के अध्ययन की आवश्यकता है, विशेषकर उनसे उत्पन्न प्रणालियों की और उनके प्रभावों और दुष्प्रभावों की।

प्रत्येक समाज को उत्कर्ष हेतु और अपकर्ष से रक्षार्थ दार्शनिकों की आवश्यकता होती है। आज कृत्रिम बुद्धि के दौर में सक्षम प्राकृतिक बुद्धि के पोषण की आवश्यकता और बढ़ गयी है।

दर्शन और दार्शनिकों का पोषण अपने-आप में पर्याप्त नहीं है। समाज को निःशंक दार्शनिकों से कठिन प्रश्न करने  चाहिए। यह दार्शनिकों और समाज के हित में है कि लोग अपने अनुभवों के आधार पर दार्शनिकता का गहन परीक्षण करें। उनसे मांग करें कि वे ऐसी बातें भी करें जो व्यावहारिक और बोधगम्य हों ।

नीरज कुमार झा

बुधवार, 22 नवंबर 2023

ज्ञान शक्ति और विश्वविद्यालय

पुरानी समझ है कि ज्ञान शक्ति है। आज के दौर का सबसे बड़ा सच यह है कि ज्ञान की शक्ति अत्यधिक बढ़ चुकी है और बढ़ रही है। पहले अधिकतर तकनीकें और उपकरण मांसपेशियों के बल को बढ़ाते थे अथवा उसका अधिक शक्तिशाली विकल्प देते थे । अब नई तकनीकें बौद्धिक क्षमता को बढ़ाते हैं और उत्तरोत्तर उसका शक्तिशाली विकल्प दे रहे हैं। अंततोगत्वा कोई भी प्रौद्योगिकी और उपकरण आमतौर पर आमजन को सशक्त बनाते हैं लेकिन इसके इस स्थिति तक इसे पहुँचने में एक अंतराल होता है। लोकहित के दृष्टिकोण से यह अवधि विपत्ति का कारण हो सकता है और सजगता की मांग करता है। इस संदर्भ में कृत्रिम बुद्धि को लेकर आम जागरूकता और सजगता की आवश्यकता आज का सर्वाधिक संवेदनशील मुद्दा है।

इस उद्देश्य से भारत में विश्वविद्यालयों की भूमिका को गंभीरता और प्रासंगिकता से युक्त करना होगा। आज की चुनौतियों का समाना करने के लिए ज्ञान संसाधन की आवश्यकता आधारभूत है। इसके उत्पादन हेतु विश्वविद्यालय सहज कार्यशाला हो सकते हैं। विशुद्ध शोधसंस्थानों अथवा प्रयोगशालाओं की तुलना में विश्वविद्यालय की विशिष्टता इसका समाज से सृजनात्मक जुड़ाव है।

इस परिदृश्य में नवीन शिक्षा नीति विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर जोर देती है लेकिन लोकहित रक्षण और राष्ट्रशक्ति के विस्तार हेतु इस व्यवस्था में सतत परिमार्जन की आवश्यकता होगी। आज कृत्रिम प्रौद्योगिकी और पर्यवावरण क्षरण की चुनौतियों के बीच विश्वविद्यालयों की भूमिका रणनीतिक है और इसकी प्रभावी भूमिका का विकल्प नहीं है।

नीरज कुमार झा

रविवार, 14 मई 2023

इसे ध्यान में रखना

 तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है,
नया संचारतंत्र  तुम्हारा माध्यम और मंच है। 
कृत्रिम बुद्धि देगी तुम्हें भाषा,
गढ़ेगी तुम्हारे लिए अवधारणाएँ और विचार 
कहे तुम्हारे,
तुम्हारी अनुभूत भावनाओं से । 

तुम्हें भाषा मिलेगी,
मिलेगी अभिव्यक्ति, 
अवधारणाएँ होंगी तुम्हारी,
विचार तुम्हारे होंगे, 
तुमसे होंगे। 

आभिजात्य वर्ग का विशेषाधिकार 
साहित्य और दर्शन का विलास; 
हाँ, तुम्हें पता है,
अब तुम भी कर सकते हो,
यंत्र है तुम्हारी मुट्ठी में। 
 

समझो, होगा ऐसा पहली बार,
तुम रहे हो अभी तक,
बिना सुने-सुनाए, 
सोच ही नहीं पाए क्या बताना है, 
इतना सब सहते हुए। 

तुम्हें मिलेगी फुरसत भी पहली बार,
उबाऊ,  कमरतोड़ 
और जानलेवा भी,
 काम करेंगे अब बोट, 
तुम अपने  मशीनीकरण से 
उबरोगे पहली बार। 

मत भी रहेगा तुम्हारे पास, 
आजीविका का साधन भी, 
प्राप्त होगा सबको आधार आय; 
उत्पादन की क्षमता के  विस्तार से 
होगा सबका निर्वाह, 
और जो यत्न करेगा,
होगा हिस्सेदार भी। 

तकनीक पराप्रकृतिक नहीं 
यह तुम में ही निहित है, 
यह तुम्हारी ही क्षमता है 
जो उत्तरोत्तर करती 
सभ्यता का परिष्कार है,
बनाती मानव को और मानव है। 

हाँ, तुम बढ़ाओगे पूँजीवाद को जितना, 
पूँजीवाद सशक्त करेगा तुम्हें उतना,
जनतंत्र पूँजी की उपज है, 
दोनों अन्योन्याश्रित हैं, 
बस, इसे ध्यान में रखना। 

नीरज कुमार झा