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रविवार, 31 मार्च 2024

Capitalism and Inequality

Inequality as such is there in every walk of life. Too many kids aspire to play cricket for India, but only one or two enter the national team in a year. An impoverished and deprived community may have high inequality among their members. Even the non-existence of private property is not a guarantee of equality anyway. Capitalism also causes inequality but, at the same time, it prevents poverty and deprivation in society. Equality in deprivation is a dehumanising condition.

If a capitalist order produces disproportionate inequality, it means that the market is not free enough, and competitiveness is compromised there.

The solution to capitalist problems is more capitalism.

NIraj Kumar Jha

मंगलवार, 26 मार्च 2024

Avoidance of Things

Vacuous is the most discoursed. This is due to the lack of existential courage. It takes place primarily in two forms: first, it not being so and second, the denial of this claim. Ideating a total makeover is also a vacuous discourse.
 
Vacuousness anyway is not without repercussions. Rather, they have serious repercussions.
 
Niraj Kumar Jha

Ease of Doing Business

Sanjeev Sanyal has rightly pointed out that a colossal number of young people, relatively more talented, end up wasting the prime years of life trying to qualify for the civil services examinations conducted by the UPSC. This is a personal loss for those youths and a humongous loss for the nation.

In the Western part of the country, the craze for government jobs is less as they came under colonial rule later and the fabled Indian business traditions survived to some extent.

The only way, we can save the prime years of so many talented youths and put those to social use is by enhancing the ease of doing business. Whoever is willing, must have a conducive and encouraging system and ecology in place to carry out whatever business they choose.
 
Niraj Kumar Jha

सोमवार, 25 मार्च 2024

होली है आज

सच  रंग-बिरंगा  
मानव बीच नहीं  भेद 
सत्य की जीत का 
इससे नहीं बड़ा 
त्योहार कोई एक 
भक्त प्रह्लाद 
सनातन भक्ति 
सुमिरे आज 
कहे जीवन सच 
उमंग सच  
मोद सच 
देह सच 
माटी सच 
झूमे  पंचभूत 
मनाए सृष्टि का उत्सव 
उच्छृंखल आज  
जल विशेष 
मस्तिष्क की सत्ता
आज़  नहीं 
संप्रभु  हृदय आज 
होली है आज 

नीरज कुमार झा 





रविवार, 24 मार्च 2024

Scholarship and Pseudo-scholarship

What we know as scholarly in the domains of social and human knowledge may be just the opposite of being scholarly. I am not talking here about the formalism of the presentation but about the substance and more about its consequentialism. Scholarly presentations and performances enthralling their readers and audiences respectively may be inconsequential or seriously harmful. 

At first, what we feel and judge as scholarly or stupid is more about obedience to some commandment and managed consensus. And, in a more nuanced state, a piece of scholarship may be a handiwork of craft rather than an effort for some genuine factual, not make-believe, concern. Long-held values or power matrices determine what a community or a political community accept or rejects as a scholarship rather than their intrinsic worth doing the same.  

The worth of scholarship can be known by comparative histories and sociologies and their applications can even be tested in advance, and thereby it may be known whether any scholarly statement serves the general good without sacrificing the legitimate interests of any individual person or does not. 

Niraj Kumar Jha

मंगलवार, 19 मार्च 2024

Conversations

Conversations among folks go into holding or advancing social norms and practices. Republicanism bestows citizens the responsibility to hone their conversation skills to the effect of social good. The primary thing is to see the relevance of a conversation, its content and the way we do it, whether it serves or disserves us. We must know that things savoury or unsavoury, the biggest of them spanning nationally or internationally included, exist by existing in the microcosms of interpersonal relations among common folks. We can augment or contain their effect by how we converse. Another point to put here is that a conversation about a condition is basic for the recognition of that condition. My brushes with history introduced me to great and deafening silences over phenomena, which affected humanity and its course very deeply. Avoiding than conversing about some conditions has been the norm. Conversation for advancement is a courageous act.

Niraj Kumar Jha

रविवार, 17 मार्च 2024

बड़ा आदमी

बड़ा आदमी वह है जिससे मिलने पर किसी को स्वयं के बड़प्पन का अहसास हो, तुच्छता का नहीं।

नीरज कुमार झा

सामाजिकता

सामाजिकता का ह्रास आज की कटु सच्चाई है। सामान्य समझ यह है कि इसका कारण मोबाईल और इंटरनेट है। लोग ऐसा मानते हैं कि सामाजिकता की जगह ऑनलाइन संलिप्तता ने ले ली है। यह प्रगट कारण है लेकिन मूलभूत नहीं। यह मेरी सोच है और एक परिकल्पना है। इसपर गंभीर चिंतन और शोध की आवश्यकता है।
 
स्‍कैन्‌डिनेव़िअन देशों में सामाजिकता अत्यंत न्यून है। वहाँ व्यक्ति हेतु सुरक्षा और सुविधाएँ बहुत ही अच्छी हैं। वहाँ लोगों को एक-दूसरे की जरूरत ही नहीं है जैसा कि सार्वजनिक अभिकरण उनकी हर जरूरत को बखूबी पूरा करते हैं। इन देशों में लोग सम्पन्न हैं और उनका जीवन निरापद है। लेकिन मेरा मानना है कि सामाजिकता का अभाव इस स्थिति में भी आदर्श नहीं है। व्यक्ति एकाकीपन में जीवन की सार्थकता प्राप्त करे, अस्वाभाविक प्रतीत होता है।

भारत के वर्तमान दौर में सामाजिकता को सघन, स्वस्थ और सुखद बनाने की आवश्यकता है। इसकी कमी के कारणों और इसमें विस्तार हेतु उपायों को लेकर व्यापक विमर्श होना चाहिए। मैं इस विषय (स्थिति, कारण, और समाधान) पर अपने विचारों को क्रमशः लिखता रहूँगा। मित्रों से आग्रह है कि इस विषय पर विचार करें और उन्हें साझा करें।

नीरज कुमार झा

गुरुवार, 14 मार्च 2024

धार्मिक, रीलिजस नहीं

दो बड़े बौद्धिक नेता यूट्यूब पर अंग्रेजी भाषा में प्रदर्शन वार्तालाप कर रहे हैं। दोनों इस जानकारी को साझा कर रहे हैं कि एक सर्वे में भारत के अधिकतर लोगों ने बताया कि वे रीलिजस हैं। असल में, भारत के बहुसंख्यक जन धार्मिक हैं। दोनों यह समझ नहीं रख रहे हैं कि धार्मिक और रीलिजस होना सर्वथा भिन्न है।

इस विषय पर अधिकतर लोग भ्रमित रहते हैं। इसका कारण है कि एक बात धर्म और रीलिजन में दोनों में केंद्रीय महत्व का है, वह आस्था है।हालाँकि धार्मिक होने के लिए आस्थावान होना अनिवार्य नहीं है।

जिसको लेकर अंतर है वह मानव मस्तिष्क का एक दूसरा आयाम, विवेक, है। धर्म में विवेक और आस्था सहचर हैं और रीलिजन मे विवेक आस्था का अनुचर है। विवेक की स्थिति दोनों को विपरीत बनाता है।

नीरज कुमार झा

रविवार, 10 मार्च 2024

Democratisation of Knowledge

The availability of and access to knowledge has never been so widespread. Most of the things one needs to know are online, always ready to be accessed and even curated with the help of AI. At the same time, now again with the help of the internet and AI, one can articulate better and always be present before an audience.

This vital aspect of existence so democratised along with others strengthens democracy in a manner, which we cannot make out right now. We may be in a transformational phase little realising it. We can see right now a definitiveness in the political cultures in the world. This may be an age of denial of old consensus or its lack wherein the fresh consensus remains elusive. The world lacks a common set of values leading to any collective idea of good. The age has yet to give birth to its philosophers. We will have to wait.

Niraj Kumar Jha

शुक्रवार, 8 मार्च 2024

दार्शनिक

जन अथवा समाज मंगल  गंभीर और जनहितैषी दार्शनिकों की उपस्थिति की मांग करता है। 

हालाँकि दर्शन के साथ गंभीर और जनहितैषी विशेषण अनावश्यक हैं, लेकिन दर्शन के नाम से जो चलन में रहता है, उसको लेकर सचेत करने के लिए  यहाँ इन विशेषणों का प्रयोग किया गया है। 

गंभीर इसलिए कि एक तथाकथित दार्शनिक हवाई किले बनाने वाला हो सकता है; बिना इतिहास बोध, समाज और मानवीय प्रकृति की समझ के वह निरर्थक स्वप्नों का द्रष्टा और प्रसारक हो सकता है। ऐसे दार्शनिक बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और समाज अपनी तमाम विसंगतियों के साथ यथास्थिति में रहता है। किसी भी साधन-संपन्न संप्रभु देश में विपन्नता की विद्यमानता इस तरह की कुबुद्धि के आधिक्य का ही प्रमाण है। 

दूसरा कि अनेक आधिकारिक विद्वान द्वारा बाह्य संस्कृति से उत्पन्न विचारधाराओं को स्वयं के परिवेश में अनुकूलन की क्षमता की बिना परख किए उसके आरोपण की पैरोकारी करते हैं। यहाँ तक कि जहाँ से उनका आयात किया गया है, वहाँ भी उसे स्वीकार नहीं किया गया हो। ऐसे विद्वानों को भी दार्शनिक की श्रेणी में रखा जाता है। विदेशीकृत विद्वान अपनी गठरी में संग्रहीत सामग्रियों को लेकर उलझन का प्रदर्शन कर भी इस श्रेणी में स्थान पा लेते हैं। 

जनहितैषी इसलिए कि दर्शन संज्ञा का दुरुपयोग होता है। कोई व्यक्ति अस्तित्व के अज्ञेय पक्षों को लेकर भय  और  मानवीय मानसिकता में अंतर्निहित दुर्बलताओं को आधार बनाकार  शब्दाडंबर अथवा भाषाई जाल के माध्यम से लोगों को भ्रमित कर सकता है। मानव इतिहास में मानव निर्मित त्रासदियों की भरमार ऐसे ही विकृत बुद्धिप्रयोगों का दुष्परिणाम रहा है। 

दर्शन और विज्ञान में अंतर है। दर्शन की प्रकृति समग्रता मूलक अथवा व्यापक दृष्टि है। इस दृष्टि की व्यापकता अज्ञेय और ज्ञेय का भी मेल कराती है। इसका बिन्दु संकेन्द्रण भी व्यापक दृष्टि का ही सघन संकुचन है। यह जीवन को अर्थयुक्त बनाती है। विज्ञान प्रधानतया एकलता से व्यापकता की ओर जाता है और इसकी मूल प्रकृति संकेन्द्रण की है। 

दर्शन मानव जीवन का विज्ञान की तुलना में अधिक सशक्त मार्गदर्शक है।  दर्शन विज्ञान को अधिगृहीत रखता है। विज्ञान की स्थिति दर्शन सेवी की  है। 

यह दर्शन ही है जो मानव को बर्बर से सभ्य बनाता है, और दर्शन के अभाव में भौतिक तथा वैज्ञानिक साधनों से युक्त होते हुए भी  समुदाय प्रवृत्ति और आचरण से असभ्य ही बने रहते हैं। ऐसा नहीं लगता है कि मानव बिना दर्शन के हो। वास्तव में बर्बरता प्रवृत्ति होती है, जो दर्शन की जगह काम करती है।  यही प्रवृत्ति दर्शन विकृति का स्रोत और दर्शन की चुनौती है। 

भारत ने दर्शन में महती योगदान दिया है। वसुधैव कुटुंबकम, सर्वमंगल, जीवन की  विविध शैलियों का अभिनंदन, शांति  और सुबुद्धि हेतु सतत प्रार्थना इस दर्शन की अनन्य सीखें हैं। आज भारत अपनी मौलिक मेधा को जागृत कर पुनः इस नए युग में मानवहित के पोषण में भूमिका निभाए, यह अभीष्ट  है।  

नीरज कुमार झा 

रविवार, 3 मार्च 2024

Business Leadership

A new kind of business leadership is in the offing. Generally, business leadership may mean leading a business enterprise, but what can be seen in a very embryonic stage is that businesspeople speak for the public good. In the most likelihood, they would be in the public leadership role like elites in other walks of life. This is the rise of the new India, which is moving away from the slavish mentality instilled by a very prolonged period of subjugation. During the alien regimes, the Indian society lost much of its vitality and positivity, and now India is on the path of redeeming itself. The redeeming process however needs a lot of vetting, institution building and structuration. The intellectual leadership must reinvent their role to the spirit of the new era of India being itself and in ascendance. 

Niraj Kumar Jha