कर्ज है हमारे ऊपर
पुरानी पीढ़ियों का।
अधिकतर पीढ़ियों ने
दी है बेहतर दुनियाँ
आने वाली पीढ़ियों को।
गौर करें हम भी
अपनी विरासतों पर।
वैसे यह बात नहीं है
सिर्फ़ नैतिकता की;
है यह बात
स्वार्थ की भी।
अधिकतर लोग जोड़ते हैं
ज़मीन और ज़ायदाद
औलादों के लिये।
वे नहीं सोचते कि
आखिर वे रहेंगे कहाँ।
समाज में ही तो !
क्यों नहीं वे कोशिश करते
उसी शिद्दत से
छोड़ने को एक बेहतर समाज
अपने बच्चों के लिये?
- नीरज कुमार झा