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सोमवार, 21 सितंबर 2009

उच्च शिक्षा : सन्दर्भ मध्यप्रदेश

नीरज कुमार झा



         भारत के मध्य में एक विशाल राज्य के रूप में मध्यप्रदेश की स्थापना का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता तथा अखंडता को अक्षुण रखने के लिये एक ठोस केन्द्रीय क्षेत्र का निर्माण करना था. १ नवम्बर २००० को छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने से पूर्व क्षेत्रफल के अनुसार यह भारत का सबसे बड़ा राज्य था. यह अभी भी राजस्थान के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है. इसका क्षेत्रफल ३०८,१४४ वर्ग किलोमीटर है. इसका आकार दुनियाँ में क्षेत्रफल के अनुसार क्रमशः ७१वें तथा ७२वें क्रम के इटली तथा फिलीपिंस जैसे देशों से बड़ा है. आबादी के अनुसार भारत में इसका स्थान ७वां है जो विश्व में आबादी के हिसाब से २२वें क्रम के यूनाइटेड किंगडम तथा २३वें क्रम के इटली के बीच का है. हर दृष्टि से मध्यप्रदेश एक विशाल भूखंड है. सभ्यता तथा संस्कृति के दृष्टिकोण से भी इस प्रदेश में भारतीय सभ्यता के अनेक पुरातन केंद्र स्थित हैं. राष्ट्रनिर्माण तथा भारतीय सभ्यता के उत्थान में इस राज्य की महती भूमिका को रेखांकित करना अनावश्यक है, अर्थात् स्वयंसिद्ध है. इस प्रदेश के नागरिकों ने भी सदैव राष्ट्रीय सोच का ही पोषण किया है. मध्यप्रदेश बिरले राज्यों में है जहाँ आज तक कोई राज्य स्तरीय या क्षेत्रीय दल पनप नहीं पाया है.
         राष्ट्र और सभ्यता के ध्येयों की पूर्ति हालांकि मात्र वृहद् आकार से संभव नहीं है. एक पिछड़े राज्य के रूप में मध्यप्रदेश राष्ट्र का मर्मस्थल कदापि नहीं बन सकता है. राष्ट्रीय एकता तथा प्रतिष्ठा को सुदृढ़ करने के लिये मध्यप्रदेश को शक्ति तथा आकर्षण का पुंज बनना होगा. यह शक्ति तथा आकर्षण प्रदेश के आर्थिक विकास तथा सांस्कृतिक उन्नयन से ही संभव है. उन्नति का मानदंड भी राष्ट्रीय न होकर वैश्विक हो, यही आज के दौर में उचित है. आर्थिक विकास से पर्यावरण का मुद्दा भी जुड़ा है. पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए उच्च स्तरीय प्रबंधन की आवश्यकता होती है. विकास के लिए अन्य प्रमुख आवश्यकताएँ उन्नत अधोसंरचना, प्रभावी कानून-व्यवस्था व न्यायप्रणाली तथा स्वच्छ, सक्षम, एवं मैत्रीपूर्ण प्रशासन है. इन सबके लिए जरूरी है योग्य तथा निष्ठापूर्ण नेतृत्व. मध्यप्रदेश में आज गत्यात्मकता है, यहाँ विकास हो रहा है, तथा प्रदेश में सक्षम नेतृत्व भी है लेकिन वैश्विक स्तर पर स्थान बनाने के लिये आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक स्तर पर बहुत कुछ अपेक्षित है. विश्वस्तरीय मानदंडों के लिये जिस सोच, समझ तथा क्षमता की आवश्यकता है, वह तो राष्ट्रीय स्तर पर भी न्यून ही है. इसके लिये उत्कृष्ट नेतृत्व तथा श्रेष्ठ राजनैतिक संस्कृति का संयोग होना आवश्यक है.
          सारी बात जहाँ आकर ठहरती है वह है शिक्षा. एक बेहतरीन शिक्षा प्रणाली के द्वारा ही प्रदेश प्रगति के आवश्यक शर्तों की पूर्ति के लिये जमीन तैयार कर सकता है. आज प्रदेश में शिक्षा का स्तर राष्ट्रस्तरीय भी नहीं है जबकि आज के दौर में जो विश्वस्तरीय नहीं है वह इस विश्वग्राम में बेमानी है. भारत के उद्योग-धंधे चीख-चीख कर कह रहे हैं कि भारतीय शिक्षाप्रणाली के बहुसंख्य स्नातक उनके किसी काम के नहीं है. हालांकि उच्च स्तरीय शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य मात्र सरकार तथा अर्थव्यवस्था के लिये कामगार उपलब्ध कराना नहीं है. इसका प्रभाव सर्वव्यापी है. उदाहरण के लिये समाज में अपराध का भी प्रमुख कारण शिक्षाव्यवस्था की खामियाँ हैं. अधिकतर अपराध दिमाग में पनपते हैं जिसकी औषधि, जैसा कि प्लैटो ने कहा था, शिक्षा है. प्रशासन तथा प्रबंधन में दक्षता तथा यहाँ तक कि समाज में नैतिकता के लिये भी शिक्षा की गुणवत्ता निर्णायक है लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भारत में दिवास्वप्न की तरह है. यहाँ प्रतियोगिता, प्रशिक्षण तथा दक्षता के नाम पर तोता-रटाई ही चलन में है. यह प्रणाली भारतीयों को पहल, प्रयोग तथा परिवर्तन के दृष्टिकोण से अनुपयुक्त बनाती है.
         शिक्षा को उठाने के लिये पहली चुनौती समुचित रूप से शिक्षितों की उपलब्धता की है तथा दूसरी चुनौती शिक्षा को लेकर सही सोच को विकसित करने की है. इनका समाधान तत्कालीन तौर पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात देशी शिक्षाविदों को तथा विदेशी शिक्षाविदों को भी उनकी शर्तों पर स्वायत्त रूप से शिक्षण संस्थानों के निर्माण तथा विकास करने के लिये आमंत्रित कर किया जा सकता है. यह चीन द्वारा शिक्षा के विकास को लेकर अपनायी रणनीतियों में से एक है. दूसरी आवश्यकता इस क्षेत्र में सरकारी सर्वाधिकार तथा नियंत्रण से मुक्ति पाने की है. ज्ञान आयोग तथा यशपाल समिति की सिफारिशें इस संदर्भ में महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं. यह क्षेत्र वास्तव में सबके लिये खुला होना चाहिए. इसमें सरकार, निजी निकाय, परमार्थिक संस्थाएँ, स्वयंसेवी संगठन, लाभ के सिद्धांत पर कार्यशील कारपोरेट प्रतिष्ठान तथा विदेशी संस्थानों आदि सभी की आवश्यकता इस क्षेत्र में है. भारत में शिक्षा के क्षेत्र में लाभ की अनुमति नहीं है. यह शिक्षा में पाखण्ड तथा भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण है. लाभ बिलकुल वाजिब मंशा है. इसका विकल्प अधिकांशतः कपटियों को खुली छूट देना ही है. प्रणाली, दृष्टिकोण, सोच तथा ध्येय की विविधता तथा प्रतियोगिता ही शिक्षा को उपलब्ध की उँचाइयों तथा संभावनाओं की व्यापकता में ले जा सकती है.
         तीसरी आवश्यकता समाज में उपलब्ध श्रेष्ठ प्रतिभाओं को इस क्षेत्र में लाने की है. आज भी देश की श्रेष्ठ प्रतिभाएँ शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं लेकिन वे इस क्षेत्र में दी जाने वाली सुविधाओं की वजह से नहीं बल्कि तमाम असुविधाओं के बावजूद इसमें आते हैं. उनकी प्रतिबद्धता उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में लाती है. आवश्यकता इस अध्यवसाय को सर्वाधिक आकर्षक बनाने की है ताकि श्रेष्ठतम प्रतिभाएँ बेझिझक मानवहित के सबसे महत्वपूर्ण कार्य में सम्मिलित हो सकें. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रदत्त नवीन वेतनमान इस दिशा में प्रारंभिक चरण है. इसके साथ ही शिक्षकों को अध्ययन, अध्यापन तथा शोध हेतु प्रवृत्त करने के लिये उचित सुविधाओं, प्रशिक्षण तथा वातावरण उपलब्ध करवाने की आवश्यकता है. शिक्षा को लेकर तदर्थवादी सोच तथा लापरवाही समाज के लिये घातक है. यहाँ यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि शिक्षा को निजी निकायों के लिये खोलने का मतलब यह कदापि नहीं है कि सरकार अपनी भूमिका को कम करे. इस क्षेत्र में सरकार की प्रतिबद्धता को सघन तथा आवंटन को बढ़ाने की आवश्यकता है लेकिन साथ ही उसकी भूमिका को पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है, जैसाकि ऊपर स्पष्ट किया गया है. यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा सरकार का प्राथमिक दायित्व है.

         मध्यप्रदेश में शिक्षा का स्तर ऐसा होना चाहिए कि शिक्षा ग्रहण करने के लिये देश के कोने-कोने से ही नहीं बल्कि विकसित देशों से भी छात्र यहाँ पहुँचें. यहाँ के स्नातक ऐसे हों जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय के स्नातकों की तरह वैश्विक नेतृत्व में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने में सक्षम हों. मध्यप्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता जब विश्व के शीर्ष पर होगी तब ही प्रदेश राष्ट्रीय एकता तथा प्रतिष्ठा का भी मजबूत केंद्र बन सकेगा. ऐसा करके यह प्रदेश भारत के सभी हिस्सों के लोगों को अपनी भारतीयता को लेकर गर्वान्वित होने के लिये प्रेरित करेगा. ऐसी व्यवस्था सनातन मूल्यों की गरिमा को मानव कल्याण हेतु विश्वस्तर पर भी प्रतिष्ठापित करने के लिये भी आवश्यक है. यह प्रदेश अपने संसाधनों तथा राष्ट्रवादी सोच में प्रखरता के आधार पर ऐसा कर सकता है.

नीरज कुमार झा, "शिक्षा से मप्र बन सकता है सुदृढ़ राज्य," स्वदेश, २८ अगस्त २००९, पृ. ६. 

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