धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद् धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
जनतंत्र को पुष्ट करने निमित्त जन को सम्यक आचरण और उपक्रम अपनाने से पहले तंत्र के व्यवस्थित बोध को प्राप्त करना अभीष्ट है, अन्यथा ऐसे प्रयास विपरीत प्रभाव डाल सकते हैं। इसके लिए लोग प्रश्न करें, और जिनके लिए संभव हो, वे अध्ययन करें। यहाँ यह उल्लेख भी प्रासंगिक है कि वैश्विक संदर्भ में (अन्य सभ्यताओं की तुलना में) दृष्टिगत करने से यह स्पष्ट है कि भारतीय परंपराओं में मानवता और मानवीय गरिमा को अतुल्य रूप से श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है, जिसका अध्ययन सम्यक बोध प्राप्ति हेतु ठोस आधार प्रदान करता है।
नीरज कुमार झा
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