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गुरुवार, 28 मई 2026

साम्राज्य और एम्पाइअर

अनुवाद प्रायः भाषाओं के समांतर शब्दों के माध्यम से किया जाता है, किंतु ऐसे समांतर शब्द अनेक बार सभ्यताओं के मौलिक अंतर को ढक देते हैं। उदाहरण के लिए भारत में अब यह समझ एक सीमा तक विकसित हुई है कि ‘रीलिजन’ और ‘धर्म’ में मौलिक भेद है। इसी प्रकार ‘साम्राज्य’ और ‘एम्पाइअर’ (अथवा अन्य सभ्यताओं के समांतर शब्दों) के बीच भी मौलिक अंतर है, जिसे मेरी जानकारी के अनुसार अभी तक सामान्य बोध के क्षेत्र में पर्याप्त रूप से दृष्टिगत नहीं किया गया है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में साम्राज्य का मूल उद्देश्य धर्म का विस्तार, न्याय की स्थापना, शांति और संपर्क को निर्बाध बनाना तथा सामान्य समृद्धि के मार्गों को निष्कंटक करना था। यह व्यापक सामूहिक शक्ति का लोककल्याण और विपत्तियों के निवारण हेतु व्यवस्थित उपयोग था। चक्रवर्ती का ध्येय आदर्श और न्यायप्रिय धर्मराज के रूप में शस्त्र और शास्त्र, दोनों के माध्यम से संसार में धर्मचक्र की स्थापना करना था।

इसके विपरीत, एम्पाइअर प्रायः किसी व्यक्ति अथवा संगठित समूह की सर्वोच्चता और लिप्सा-पूर्ति के उद्देश्य से व्यापक स्तर पर लोगों के दमन और दोहन की व्यवस्था रहा है। निश्चय ही दोनों ही स्थितियों में अपवादों की बहुलता मिलती है, किंतु रामराज्य का आदर्श तथा अशोक और चंद्रगुप्त द्वितीय के साम्राज्य जैसे उदाहरण भारतीय अवधारणा की विशिष्टता को स्पष्ट करते हैं।

पुनश्च : उक्त संदर्भ में मेरा आग्रह है कि हिंदी में सम्प्रेषण के लिए ‘एम्पाइअर’ तथा ‘इम्पीरियलिज़्म’ शब्दों का यथावत प्रयोग किया जाए। उदाहरणार्थ, ‘ब्रिटिश एम्पाइअर’ और ‘ब्रिटिश एम्पाइअरवाद’ कहा जाए, न कि ‘ब्रिटिश साम्राज्य’ और ‘साम्राज्यवाद’।

नीरज कुमार झा 

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