विश्वभर में लोकतंत्र को टिकाए रखने के लिए आवश्यक ज्ञानमीमांसीय आधार अपनी गहराई और प्रतिबद्धता, दोनों में क्षीण हुए हैं। इस क्षरण की पहली बड़ी अभिव्यक्तियों में से एक नवउदारवादी व्यवस्था की पराजय थी, जिसे लोकप्रिय रूप से एलपीजी अर्थात उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के नाम से जाना गया। दूसरे, विभिन्न महाद्वीपों और सभ्यताओं में अनेक जनांदोलन, ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट से लेकर अरब स्प्रिंग तक, या तो निष्फल हो गए या ऐसे परिणामों में परिणत हुए जिनसे समाजों की स्थिति बेहतर नहीं हुई और कुछ मामलों में पहले से भी बदतर हो गई।
अब सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उदय लोकतांत्रिक जीवन-पद्धति के सामने इससे भी अधिक गहरी चुनौती प्रस्तुत कर रहा है, जिसका मूल मानवतावाद और मानवीय गरिमा में निहित है। केंद्रीय प्रश्न केवल व्यवस्था-विचलन का नहीं है, बल्कि मानवता के एक बड़े हिस्से के लिए मानवीय अभिकरण और मेधा के क्रमशः अप्रासंगिक या अनावश्यक होते जाने का है। जब लोग स्वायत्त अभिकर्ता के रूप में कार्य करने की अपनी क्षमता, अवसर या प्रासंगिकता को क्रमशः खोने लगते हैं, तब लोकतंत्र की स्वयं की ज्ञानमीमांसीय आधारशिला कमजोर होने लगती है।
इसके लिए हमें अधिक गहन ‘प्रणाली-चिंतन’ की आवश्यकता है। हमें लोकतंत्र को केवल शासन-व्यवस्था या संस्थाओं के एक समूह के रूप में नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व को जानने, उसका मूल्य निर्धारित करने और उसे व्यवस्थित करने की एक पद्धति के रूप में समझना होगा। अंततः लोकतंत्र का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करेगा कि हम मनुष्य के पुरुषार्थ को संरक्षित कर पाते हैं या नहीं, और उसे केवल अधिष्ठानावलंबी प्रजा, उपभोक्ता अथवा लगातार अधिक स्वायत्त होती जा रही प्रणालियों के किसी स्वायत्त-प्रणालीगत प्रतिस्थाप्य घटक में बदलने से रोक पाते हैं।
नीरज कुमार झा
नीरज कुमार झा
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