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रविवार, 25 अप्रैल 2010

समय वह आ चुका है

समय वह आ चुका है
जब नहीं क्रांति की जरूरत
बदलाव भी नहीं चाहिए आमूल-चूल
न ही खून बहाने की दरकार
और न ही करना है सड़कों पर हाहाकार
इतना भी बहुत है
कि करें इस्तेमाल आप अधिकारों का
जो सहज उपलब्ध हैं आपको
उनसे भी बढ़ेंगी बातें आगे
होंगी परिस्थितियाँ बेहतर
बात ही कुछ और होगी
यदि होगी आपकी सोच सही
यह भी मुश्किल नहीं
सोच सही है वही
जिसमें हो हित आपका औरों के सहित
हो सजगता मामूली भी
थोड़ी सी सचेष्टता
और कुछ सरोकार
तो फ़िर क्या बात है
सोचो दुनियाँ बदल रहे आप
हो गए उदासीन
तो नशा किया है आपने
हो गए मायूस
तो पी लिया जहर आपने
किया उपद्रव
तो हैं आप अपराधी
ऐसा कुछ भी न करें आप
जो मज़बूत करते उनको
जिनके नकारेपन से
और कारनामों से
हैं आप परेशान
वे औकात में रहें
करें ऐसा काम
उनकी ताक़त
आपके व्यक्तित्व की कमियाँ हैं
उनका प्रभुत्व
आपकी सोच की खामियाँ हैं
आप हैं सही तो
ग़लत कुछ भी नहीं है
आप बदल लें अपने आप को
तो किसी क्रांति की जरूरत नहीं है

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