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रविवार, 6 जून 2010

अधिकार और अधिनियम

नीरज कुमार झा


जनतंत्र शासनतंत्र में खुलेपन का भी पर्याय है जो भारत में अभी भी दूर की कौड़ी लगती है. देश में शासनतंत्र और नौकरशाही के औपनिवेशिक स्वरूप में परिवर्तन लाने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है. सूचना का अधिकार जनता के हाथों में एक ताक़तवर हथियार तो है, लेकिन वह लगभग वैसा ही है कि घर में नल का पानी बह रहा हो और उसको बंद किए बिना झाडू से पानी हटाने का प्रयास किया जाए. ... जरूरत शासन को सहज, सुगम और मैत्रीपूर्ण बनाने की है, जिससे लोग समस्त सरकारी सेवाओं का लाभ बिना परेशानी के सद्भावपूर्ण माहौल में प्राप्त कर सकें. ऐसे में सूचना के अधिकार की आवश्यकता ही नहीं होगी. वास्तव में हमारी समस्या अतिशासन की है. जरूरत इसके कार्यों को सीमित और मनमाफिक फैसले लेने की ताक़त को कम करने की है. 
...... 

गौर करने की बात है कि अधिनियमों का आधिक्य देश और समाज की कमजोरियों का प्रतिबिम्बन होता है. एक नया अधिनियम प्रायः हमारी उपलब्धि नहीं बल्कि विफलता का परिणाम होता है. निकट भविष्य में ही पीने के पानी का अधिकार, स्वच्छ हवा का अधिकार और अधिकारों को प्राप्त करने का अधिकार जैसे अधिनियम पारित होंगे. ये अधिनियम वास्तव में हमारे सार्वजनिक जीवन के विषयों के प्रबंधन में विफलता के कारण अस्तित्व में आएंगे.

"अधिकार और अधिनियम," बी पी एन टुडे, वर्ष २, अंक ८,  मई २०१०, पृष्ट १४-१५ से उद्धृत 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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