जिसने पहचाना होगा
सबसे पहले
कि झूठ के पाँव नहीं होते।
यदि यह सच है कि
झूठ के पाँव नहीं होते,
तो फिर झूठ पहुँचता कैसे है
हर जगह?
झूठ के पाँव नहीं होते,
पर उसमें फरेब होता है।
वह सच की पीठ पर चढ़ जाता है,
यह कहकर
कि वही उसे ले जाएगा
सही जगह।
और इस तरह
झूठ पहुँच जाता है
हर जगह।
पहुँचकर जहाँ पहुँचना होता है उसे,
सच को बाहर
खूँटे से बाँधकर रखता है वह।
पाँव नहीं होते झूठ के,
पर उसका मुँह बड़ा होता है,
और पेट भी।
वह निगल जाता है
संघर्षरत सच की संपत्तियाँ—
मानवीय सरोकार,
उद्यमिता,
सृजनशीलता
और क्रांतियाँ।
डकार भी नहीं लेता।
नीरज कुमार झा
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