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शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

दीप आस्था के






अरण्य में कोई दीप जला जाता है
घटाटोप अंधकार में राहगीर का
विश्वास जब डगमगाता है
यह टिमटिमाती रोशनी
बन जाती है उसकी आस्था 

अमावस की स्याह रात
जब दीप असंख्य जलते हैं
अंधकार के अति की उस रात में 
आस्था एक सभ्यता की रोशन होती है
राह दिखाती संशय में पड़े कदमों को

रूग्णता, शैथिल्य, दुःख, या बिछोह
होता जब जीवन में उछाह कम
काटता यह तिमिर नैराश्य का
लौटा लाता यह उत्साह-उमंग 
पुनर्नवा करता मानव मन को

देश और दुनिया में कहीं भी
जब हम प्रकाश को लड़ियों में पिरोते हैं
हमारी प्रतिबद्धता है प्राचीन 
सत्य में हमारा विश्वास है अडिग
उस रात ये जगमग लड़ियाँ कहती हैं 

एक संस्कृति देती है चुनौती
अन्याय, अनीति और अनाचार को 
विकार, विद्वेष व विषाद के अंधकार को 
असत का रहा हो कितना भी जोर 
अखंडित है यह हमारा प्रकाश पर्व 

- नीरज कुमार झा

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