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शनिवार, 11 दिसंबर 2010

भारती का भविष्य (११ व अंतिम)


यहाँ यह भी स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जब भी हिन्दी के प्रसार का प्रयास हो तो उसमें किसी तरह के वर्चस्व की भावना बिलकुल नहीं होनी चाहिए. हिन्दी का प्रत्येक भारतीय भाषा से सहयोगात्मक रवैया होना चाहिये तथा नीति सहविकास की होनी चाहिये. यहाँ तक कि हिन्दी भाषी क्षेत्र में भी हिन्दी को शिक्षण संस्थानों पर थोपना भी अनुचित होगा. यह हर सामान्य शिक्षण संस्थान का - विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक - अधिकार होना चाहिए कि वह आवश्यकतानुसार अपने शोध तथा शिक्षण के माध्यम का चयन करे. आज अँगरेज़ी का विरोध वास्तव में अप्रासंगिक हो चुका है। इस भाषा में भारतीयों की प्रवीणता देश के लिये लाभदायक सिद्ध हो रही है. आज देश में जरूरत है कि ज्यादा लोग अच्छी अँगरेज़ी सीखें.यह देश की आर्थिक प्रगति के लिये आवश्यक है. लेकिन यह ध्यान रखना नितांत आवश्यक है कि अँगरेज़ी एक साधन है न कि साध्य. अँगरेज़ी सीखना चाहिए लेकिन एक उपकरण के रूप में. सीखना गलत नहीं है, गलत है अँगरेज़ी के प्रति समर्पण, उसकी अराधना. गलत है भारती का तिरस्कार, उसकी अवमानना.

जहाँ तक विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बात है उसमें भी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति लेशमात्र नहीं होनी चाहिए. इसके विपरीत भारती के प्रसार का उद्देश्य भाषाई साम्राज्यवाद, जो वृहत्तर साम्राज्यवाद का ही हिस्सा है, का प्रतिकार होना चाहिए. साम्राज्यवाद का प्रतिकार वैकल्पिक साम्राज्यवाद नहीं वरन्‌ अन्य भाषाओं का संरक्षण है. आज यदि विश्व की पारिस्थितिकी की आवश्यकता जैव विविधता है तो विश्व समाज की जरूरत इसकी सांस्कृतिक विविधता की रक्षा है. भारती के प्रसार का प्रयास परस्पर आदान प्रदान के आधार पर हो. हिन्दी भाषी विश्व के तमाम संस्कृतियों से उनकी भाषा सीखकर सीधा सम्पर्क कायम करें तथा उसके साथ ही भारती के प्रसार का प्रयास करें, यही उचित होगा.

भारती के सशक्त बनाने के लिये आधारभूत आवश्यकता है कि हिन्दी भाषी क्षेत्र का आर्थिक विकास तीव्र गति से हो. भाषा की प्रतिष्ठा के लिये मात्र यह आवश्यक नहीं है कि वह भाषा कितने बड़ी संख्या में लोगों के द्वारा बोली जाती है. महत्वपूर्ण यह है कि भाषियों की आर्थिक स्थिति क्या है? आर्थिक विकास के लिये राजनीति तथा प्रशासन को इस दिशा में प्रवृत्त करने की आवश्यकता है. प्रवृत्त करने से अभिप्राय है कि राजनीतिक तथा मेजतंत्री स्वयं को आर्थिक विकास को बाधित करने से रोकें.

उपर्युक्त तथ्य तो मूलभूत है लेकिन जो विषय प्राथमिक तथा ज्वलंत है, वह इस क्षेत्र में शिक्षा की खासकर उच्च शिक्षा की त्रासद स्थिति है. आज इस क्षेत्र में निम्न स्तरीय राजनीति के कारण शिक्षा व्यवस्था पतन के गर्त में है. इस क्षेत्र में शिक्षा का विश्वस्तरीय उन्नयन भारती के विकास में भी सहायक होगा. भाषा के उपादेयता तथा प्रतिष्ठा के लिये नितांत आवश्यक शर्त है कि किसी भाषा में किस तरह का ज्ञान सृजित, किस तरह का ज्ञान संग्रहित तथा किस तरह का ज्ञान प्रसारित हो रहा है? ऊपर जैसा कि लिखा गया है कि हर विश्वविद्यालय को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने यहाँ शोध, अध्यापन तथा प्रशासन के लिये आवश्यकतानुसार अपनी इच्छा से माध्यम का चयन करे लेकिन साथ ही जरूरी है कि प्रत्येक हिन्दी भाषी राज्य में कम से कम एक उत्कृष्ट विश्वविद्यालय ऐसा जरूर हो जहॉ ज्ञान के हर विधा का स्थान हो तथा वहाँ अध्यापन तथा शोध की आधार भाषा मात्र हिन्दी हो. इस तरह के विद्यापीठ हिन्दी में ज्ञान के उद्‌गम स्थल होंगे.

हिन्दी भाषा में साहित्य तथा ज्ञान-विज्ञान में लेखन को हर स्तर पर प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है. इसके लिये भरपूर संख्या में पुरस्कारों, अनुदानों, कार्यक्रमों तथा परियोजनाओं की व्यवस्था स्थानीय, प्रांतीय, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर होनी चाहिये. विश्व के प्रत्येक देश, बड़े शहरों तथा अधिक से अधिक शिक्षण संस्थानों में हिन्दी के/में अध्यापन तथा शोध की व्यवस्था होनी चाहिये. खासकर अहिन्दीभाषी क्षेत्रों में तथा विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार को अभियान के तहत चलाना चाहिए.

लेखन की मात्रा तथा गुणवत्ता में विस्तार के साथ ही हिन्दी पढ़ने वाले की संख्या तथा पढ़ने वालों के लिये ज्यादा पढ़ने हेतु सुविधाएँ तथा अवसरों को बढ़ाने की आवश्यकता है. इसके लिये सर्वप्रथम आवश्यक है कि हिन्दी भूभाग से निरक्षरता को अविलम्ब मिटाया जाए तथा हिन्दी में प्रकाशन को प्रोत्साहित किया जाय। हिन्दी के पुस्तकों के प्रकाशन पर तथा उस प्रक्रिया में प्रयुक्त हर सामग्री तथा चल-अचल सम्पत्ति कर मुक्त हो तथा यथासम्भव सब्सिडी भी हिन्दी प्रकाशन उद्योग को मिले. भारत तथा समस्त विश्व के कोने-कोने में जितना ज्यादा सम्भव हो हिन्दी पुस्तकालयों की स्थापना की जानी चाहिये. इसके अलावा ऐसे प्रतियोगिताओं का आयोजन हो जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग हिन्दी पढ़ने तथा हिन्दी में पढ़ने को प्रेरित हों. 

हिन्दी भाषी राज्यों के प्रशासन की भाषा हिन्दी मात्र होनी चाहिए. विदेशी आगतों, पर्योटकों तथा निवेशकों से संवाद के लिये दुभाषिये रखे जा सकते हैं. राजकीय सेवाओं में भर्ती के लिये हिन्दी का यथेष्ठ ज्ञान अनिवार्य अर्हता होनी चाहिये. यहॉ यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार की प्राथमिक भूमिका हिन्दी भाषी राज्यों की है न कि केंद्र सरकार की.

उपर्युक्त त्वरित सुझाव तो मूलभूत हैं लेकिन आवश्यकता इस विषय पर घोर चिंतन तथा शोध की है जिससे हिन्दी को विश्वभाषा के रूप में स्थापित किया जा सके. जहॉ तक इस मुद्दे को लेकर व्यय की बात है, जैसा कि ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि भारती का प्रसार मात्र भावनात्मक प्रश्न नहीं है; इसका महत्व आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा अंतर्राष्ट्रीय है. अतएव इसके प्रचार पर खर्च को निवेश तथा सामाजिक कल्याण के तहत अनिवार्य मानना चाहिए.

- नीरज कुमार झा 

(मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका रचना के मई- अगस्त २००६ अंक में प्रकाशित मेरे आलेख का अंश)

1 टिप्पणी:

  1. bahut hi sakaratmak drashtikon se likha gaya aalekh .vastav me yadi hindi ka prachar prasar karna hai to ise aarthik ,rajneetik,sanskratik-sabhi morchon par majboot karna hoga .

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