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गुरुवार, 4 अगस्त 2011

रिश्ते कुछ ही चलते जन्म भर

मैं रोया हूँ कई बार
टूटे रिश्तों को लेकर
हुआ हूँ रूआंसा कई बार
भांप कर
टूट जाने वाले रिश्तों को लेकर
पहले पता नहीं था
रिश्ता चाहे कैसा भी हो
रक्त या सम्बन्ध का
दोस्ती का या पेशे का
रिश्तों की जमीन होती है
जो हो जाती है बंजर अधिकतर
एक समय के बाद
और सूख जाते हैं रिश्तें
कुछ समय के बाद
रिश्तों की उम्र होती है
रिश्ते कुछ ही चलते हैं जीवन भर
हर रिश्तों को सहेजना नहीं होता है संभव
हर एक के लिए


- नीरज कुमार झा

6 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही कहा यही है यथार्थ्।

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  2. आज के परिवेश को देखते हुए तो आपकी कविता एक दम सटीक है... लेकिन मेरा व्यक्तिगत मत है की रिश्तों की ज़मीन होती है... जो संतुलित बारिश से एक समय बाद और अधिक उपजाऊ हो जाती है... हा रिश्तों को सहेजना हर किसी के बस की बात नहीं ये सही है... क्योंकि रिश्ते समय और साथ चाहते हैं....

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  3. आज कल रिश्ते निभाना जानता ही केन है सबको अपनी अपनी पड़ी है ..अच्छी प्रस्तुति

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  4. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  5. Rishto ki vyskhya karti sundar kavita.
    Badhai
    agar aapko bhi hai talaash rishton ki khoi hui nadi ki to
    use
    http://fresh-cartoons.blogspot.com
    par jaroor khoje.
    Sundar kavita ke liye punah badhai.

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  6. जीवन की कटु सच्चाईयों से रूबरू कराती, मर्म स्पर्शी सुंदर रचना. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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