What one is made to believe is the fountain of all their reasonings. One can endlessly argue logically, that is being faithful to one's faculty, for what they do not reason but believe to be true. Rationality ends up serving beliefs. Therefore, ...
'तमसो मा ज्योतिर्गमय'
Concerned people always work for a clearer view. Darkness is the natural state, light is an endeavour.
Niraj Kumar Jha
सोमवार, 7 अक्टूबर 2024
रविवार, 6 अक्टूबर 2024
सम्मान
अभी मेरे एक व्याख्यान का विषय 'सम्मान' था। मैंने उसमें इसके सैद्धांतिक पक्षों के साथ फेसबुक पर बारम्बार अपनी लिखी कई बातों को रखा।
1. सम्मान मानवमात्र की गरिमा और समतावादी दृष्टिकोण जनित भावना और अभिवादन है।
2. प्रत्येक अन्य के प्रति सम्मान की भावना आत्मसम्मान का प्रकट रूप है।
3. आत्मसम्मान और अहंकार में अंतर है। दंभी दूसरे को नीचा दिखाना चाहता है और स्वयं को ऊँचा दिखाता है।
4. अधिकतर लोग सम्मान को लेकर सहज नहीं होते हैं। वे अन्य को अपने से नीचे अथवा ऊपर देख पाते हैं।
5. इसका कारण मानववाद की समूहवाद के विचारधारात्मक प्रतिरोध के कारण तदनुरूप अर्थव्यवस्था की असावयवी प्रकृति और जनवैचारिकी में अपर्याप्त मान्यता है।
6. सम्मान के दृष्टिकोण से शिक्षाशास्त्र की प्रकृति में संशोधन और अन्य के साथ संस्थाओं में पदस्थ सुधी जनों की संस्था के माध्यम से सक्रियता अभीष्ट है।
नीरज कुमार झा
1. सम्मान मानवमात्र की गरिमा और समतावादी दृष्टिकोण जनित भावना और अभिवादन है।
2. प्रत्येक अन्य के प्रति सम्मान की भावना आत्मसम्मान का प्रकट रूप है।
3. आत्मसम्मान और अहंकार में अंतर है। दंभी दूसरे को नीचा दिखाना चाहता है और स्वयं को ऊँचा दिखाता है।
4. अधिकतर लोग सम्मान को लेकर सहज नहीं होते हैं। वे अन्य को अपने से नीचे अथवा ऊपर देख पाते हैं।
5. इसका कारण मानववाद की समूहवाद के विचारधारात्मक प्रतिरोध के कारण तदनुरूप अर्थव्यवस्था की असावयवी प्रकृति और जनवैचारिकी में अपर्याप्त मान्यता है।
6. सम्मान के दृष्टिकोण से शिक्षाशास्त्र की प्रकृति में संशोधन और अन्य के साथ संस्थाओं में पदस्थ सुधी जनों की संस्था के माध्यम से सक्रियता अभीष्ट है।
नीरज कुमार झा
शनिवार, 5 अक्टूबर 2024
भाषा चातुर्य और मर्मज्ञता
भाषा चातुर्य और मर्मज्ञता दो भिन्न परिघटनाएँ हैं और आवश्यक नहीं कि कोई व्यक्ति दोनों से युक्त हो। भाषाई व्यूह से असंपृक्त रहते हुए प्रासंगिक मंगलकारी तथ्यों का बोध प्राप्त करना भी गहन शिक्षा से ही संभव है। यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि शिक्षा व्यक्ति के स्वयं का प्रयास है। जो व्यक्ति सीखने से विमुख है, उसका मार्गदर्शन कोई गुरु नहीं कर सकते।
नीरज कुमार झा
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मर्मज्ञता
शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024
सुनना
लोग बोलना चाहते हैं। इससे इनके अस्तित्व की पुष्टि होती है। बोलने से उन्हे अपने व्यक्तित्व और कृतित्व की मान्यता का बोध होता है। वे अपनी पीड़ा अथवा कुंठा से राहत पाते हैं। लोग अपनी खुशी की बातें साझा कर अपनी खुशी को विस्तार देते हैं। कुछ लोग बोलकर दूसरे को दुखी कर अथवा उनपर अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर अपने अहम का पोषण करते हैं।
सुनना किसी भी स्थिति में बोलने वाले की सहायता करना है। दंभी लोगों को सुनना अत्यंत कष्टप्रद होता है। मुझे यहाँ साधु और बिच्छू की कहानी याद आती है। हालाँकि सिर्फ किसी व्यक्ति को सुनना, बनायी बातों को नहीं, अधिकतर सहज नहीं होता है। अतएव सुनना सेवा है।
नीरज कुमार झा
सुनना किसी भी स्थिति में बोलने वाले की सहायता करना है। दंभी लोगों को सुनना अत्यंत कष्टप्रद होता है। मुझे यहाँ साधु और बिच्छू की कहानी याद आती है। हालाँकि सिर्फ किसी व्यक्ति को सुनना, बनायी बातों को नहीं, अधिकतर सहज नहीं होता है। अतएव सुनना सेवा है।
नीरज कुमार झा
सुनना
सुनना सेवा है।
बुधवार, 2 अक्टूबर 2024
बौद्धिक पारितंत्र
बौद्धिकता एक पारितंत्र हैं जिसके अंतर्गत ही बुद्धिमत्ता क्या है, निर्धारित होती है। विलक्षण जन विशिष्ट पारितंत्र के निर्माण के सूत्रधार होते हैं। आधुनिक युग में ऐसे पारितंत्रों के सूत्रधारों के रूप में महात्मा गांधी, जॉन लॉक, और कार्ल मार्क्स को देखा जा सकता है। महात्मा गांधी संवेदनायुक्त मानववाद, जॉन लॉक क्रियात्मक मानववाद, और कार्ल मार्क्स समूहवाद के पैरोकार हैं। आधुनिक समाजों में ये तीन पारितंत्र प्रभावी हैं। वर्तमान में तीनों का प्रभाव है, लेकिन प्रथम भविष्य है, द्वितीय वर्तमान, और तृतीय भूत।
नीरज कुमार झा
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बौद्धिक पारितंत्र
मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024
कल्याण सूत्र
राष्ट्रों की सुख-समृद्धि का यत्न वास्तव में एक निरंतर चलाने वाला युद्ध है। सुख-समृद्धि की दशा में यथास्थिति का विकल्प नहीं होता; विकास के लिए सक्रिय रहना होता है अथवा ह्रास की पीड़ा में तड़पना पड़ता है। अनेक बुद्धिवृत्तिक मस्तिष्क के प्रयोग में प्रमाद के कारण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को ही सकल मान लेते हैं। वास्तव में विकास असंपृक्त द्वीपीय प्रयास नहीं है; यह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में बढ़त लेने हेतु सघन उद्यम की निरन्तरता है। इसमें प्रतियोगियों की क्षमताओं और निर्बलताओं को समझने का नैदानिक (क्लिनिकल) तरीका रखना पड़ता है और उसको दृष्टिगत करते हुए अपनी जयी रणनीति रचनी पड़ती है। दूसरी तरफ, अपनी क्षमताओं की परख और वृद्धि के लिए प्रयास वैसे ही होना चाहिए जैसा कि युद्ध के लिए होता है। यह युद्ध ही है और अपरिहार्य है। यहाँ तटस्थता नाम की नीति पराजय की स्वीकार्यता है। विकल्प मात्र यही हैं; जीतो और दुनिया पर राज करो अथवा हारो और दुनिया की चाकरी करो। इस युद्ध में जय उन देशों की होती है जिसके नागरिक शिक्षित, सजग, सक्रिय और निष्ठावान होते हैं, और प्रत्येक घटक उद्देश्यपरक, कुशल, और सक्षम। उक्त विषय सभी के लिए और विशेष कर बुद्धिवृत्तिकों के लिए उनके समस्त सरोकारों में सर्वोपरि होना चाहिए लेकिन उनमें से अपवादों को छोड़कर सभी शुतुरमुर्ग बने हुए हैं।
नीरज कुमार झा
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नीरज कुमार झा,
बुद्धिवृत्तिक,
राष्टीय हित
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