पृष्ठ

रविवार, 23 मई 2010

उनींदा

दिन में आवाजों की ख़ामोशी 
करती है बेचैन. 
रात में ख़ामोशी की आवाजें 
सोने नहीं देती. 
उनींदा आदमी
खो चुका है अपनी आवाज, 
और ख़ामोशी भी.
काश, नींद आती,
जल्दी उठता. 
संजीदा सुबह की ख़ामोशी में 
गुम हो चुकी अपनी आवाज को 
खींच लाता, 
और चीख सन्नाटे को तोड़ता. 
फ़िर पक्षियों के कलरव सुनता. 
आवाजों में उलझी ख़ामोशी  को अलग कर 
उसके साथ कुछ गुनगुनाता. 

- नीरज कुमार झा 

5 टिप्‍पणियां:

  1. pehli do panktiyan hi sab kuch baya kar gayi bahut khoob...

    उत्तर देंहटाएं
  2. Neeraj ji, ab to aadat daal hi lijiye, jaise-taise sone ki.

    उत्तर देंहटाएं
  3. उम्दा रचना.....ये कविता चर्चा मंच पर है

    http://charchamanch.blogspot.com/2010/05/163.html

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज की ज़िन्दगी पर बहुत सुन्दर रचना ...बधाई !

    उत्तर देंहटाएं